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महाराष्ट्र के सियासी इतिहास में नया अध्याय, पहली बार शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस एक साथ
Tue, 26 Nov 2019 04:51 PM IST
अमित कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: अमित कुमार
Updated Tue, 26 Nov 2019 04:51 PM IST
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उद्धव ठाकरे-शरद पवार-सोनिया गांधी
- फोटो : PTI
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राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है। सरकार बनाने के लिए दो अलग-अलग विचारधारा की पार्टी भी हाथ मिला सकती हैं। कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता। यह बात एक बार फिर से साबित हो गई है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर अड़े दो दोस्त आमने-सामने आ खड़े हुए और विवाद इतना बढ़ा कि भाजपा-शिवसेना की 30 साल पुरानी दोस्ती टूट गई।
पुराने दोस्तों ने जैसे ही एक-दूसरे से मुंह मोड़ा, राज्य के राजनीतिक गठबंधन के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने का रास्ता साफ हो गया। शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने पहली बार गठबंधन करने का फैसला कर लिया। शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी की राहें शुरुआत से ही जुदा रहीं। शिवसेना ने जहां हिंदुत्व पर बात की, वहीं एनसीपी ने अपनी पूर्व पार्टी कांग्रेस की तरह ही सेक्युलरिज्म को तवज्जो दी।
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मगर 2019 में हमें एक ऐसा नया मोड़ देखने को मिला, जिसकी कुछ समय पहले तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक तरह से धुर विरोधी दलों ने मिलकर सरकार बनाने का फैसला कर लिया। यह पहला मौका है जब एनसीपी, कांग्रेस ने शिवसेना से किसी भी तरह का गठबंधन किया है। कांग्रेस-एनसीपी ने महाराष्ट्र चुनाव मिलकर ही लड़ा था।
शरद पवार ने 1999 में कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी का गठन किया था। जबकि शिवसेना की स्थापना बाल ठाकरे ने 1966 में की। मगर कभी भी इनकी राहें एक सी नहीं रही। शरद पवार जब कांग्रेस में थे तब भी और एनसीपी के गठन के बाद भी।
एनसीपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में 2003 से 2014 तक सरकार चलाई जबकि भाजपा-शिवेसना ने 1995 में पहली बार गठबंधन कर सरकार बनाई। इस दौरान शिवसेना का मुख्यमंत्री बना। 2014 में भी ना-नुकुर के दोनों ने मिलकर सरकार बनाई।
2019 में दोनों दलों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और स्पष्ट बहुमत हासिल किया। सीएम पद को लेकर दोनों दलों में तकरार इस कदर बढ़ी कि शिवसेना ने कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला कर फिर से साबित कर दिया कि राजनीति में कोई स्थाई दुश्मन नहीं होता।
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पुराने दोस्तों ने जैसे ही एक-दूसरे से मुंह मोड़ा, राज्य के राजनीतिक गठबंधन के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने का रास्ता साफ हो गया। शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने पहली बार गठबंधन करने का फैसला कर लिया। शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी की राहें शुरुआत से ही जुदा रहीं। शिवसेना ने जहां हिंदुत्व पर बात की, वहीं एनसीपी ने अपनी पूर्व पार्टी कांग्रेस की तरह ही सेक्युलरिज्म को तवज्जो दी।
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मगर 2019 में हमें एक ऐसा नया मोड़ देखने को मिला, जिसकी कुछ समय पहले तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक तरह से धुर विरोधी दलों ने मिलकर सरकार बनाने का फैसला कर लिया। यह पहला मौका है जब एनसीपी, कांग्रेस ने शिवसेना से किसी भी तरह का गठबंधन किया है। कांग्रेस-एनसीपी ने महाराष्ट्र चुनाव मिलकर ही लड़ा था।
शरद पवार ने 1999 में कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी का गठन किया था। जबकि शिवसेना की स्थापना बाल ठाकरे ने 1966 में की। मगर कभी भी इनकी राहें एक सी नहीं रही। शरद पवार जब कांग्रेस में थे तब भी और एनसीपी के गठन के बाद भी।
एनसीपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में 2003 से 2014 तक सरकार चलाई जबकि भाजपा-शिवेसना ने 1995 में पहली बार गठबंधन कर सरकार बनाई। इस दौरान शिवसेना का मुख्यमंत्री बना। 2014 में भी ना-नुकुर के दोनों ने मिलकर सरकार बनाई।
2019 में दोनों दलों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा और स्पष्ट बहुमत हासिल किया। सीएम पद को लेकर दोनों दलों में तकरार इस कदर बढ़ी कि शिवसेना ने कांग्रेस-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला कर फिर से साबित कर दिया कि राजनीति में कोई स्थाई दुश्मन नहीं होता।