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Hindi News ›   India News ›   Madhya Pradesh Now free from list of Backward state

बीमारू राज्य के ठप्पे से मुक्ति: कुछ साल पहले तक मध्यप्रदेश की गिनती इनमें की जाती थी

Mon, 14 Dec 2020 07:40 AM IST
Prahlad Sabnani प्रहलाद सबनानी
Updated Mon, 14 Dec 2020 07:40 AM IST
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Madhya Pradesh Now free from list of Backward state
Madhya Pradesh CM Shivraj Singh Chouhan - फोटो : ANI

कुछ साल पहले तक भी मध्यप्रदेश की गिनती बिहार, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश के साथ बीमारू राज्यों में की जाती थी। इन्हें बीमारू राज्य का दर्जा इसलिए दिया गया, क्योंकि इन राज्यों में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर तथा प्रति व्यक्ति औसत आय बहुत कम होने से गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक थी। इस कारण इन राज्यों में अशिक्षा की दर अधिक थी, ग्रामों में चिकित्सा सहित अन्य सुविधाओं का नितांत अभाव था तथा जनसंख्या वृद्धि दर भी तुलनात्मक रूप से अधिक थी।

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पर निरंतर कोशिशों तथा बेहतर नीतियों के सहारे मध्यप्रदेश अब बीमारू की संज्ञा से बाहर निकल आया है। मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। प्रदेश की करीब दो तिहाई आबादी गांवों में रहती है एवं लगभग 54 प्रतिशत आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। वर्ष 2005-06 से 2014-15 के दौरान मध्यप्रदेश ने कृषि क्षेत्र में औसतन 9.7 प्रतिशत की वृद्धि दर अर्जित की है। इसके बाद के पांच वर्षों के दौरान तो कृषि क्षेत्र में इसकी औसत विकास दर बढ़कर 14.2 प्रतिशत सालाना रही है, जो पूरे देश में सर्वाधिक है। आज यह राज्य चना, तिलहन, अरहर, चना, उड़द जैसी दालें, सोयाबीन, लहसुन, टमाटर और संतरा के उत्पादन में पूरे देश में अव्वल है।
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इसी प्रकार गेहूं, प्याज, हरी मटर, अमरूद एवं मक्का के उत्पादन में यह राज्य देश में द्वितीय स्थान पर, तो धनिया, लाल मिर्च, सरसों एवं दूध के उत्पादन में तीसरे स्थान पर है। खाद्य पदार्थों के उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद यह दूसरे स्थान पर है। मध्यप्रदेश ने दरअसल इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में कई प्रकार की सुविधाएं किसानों को उपलब्ध कराई हैं। सबसे पहले तो सिंचाई सुविधाओं को वृहद स्तर पर गांवों में उपलब्ध कराया गया है। वर्ष 2000-01 में राज्य में सिंचाई सुविधाओं का औसत 24 प्रतिशत था, जो 41.2 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से बहुत ही कम था।
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पर इस दिशा में तेजी से काम करने के कारण 2014-15 में सिंचाई सुविधाओं का औसत बढ़कर 42.8 प्रतिशत हो गया, जो 47.8 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत के काफी करीब पहुंच गया। आज राज्य के अधिकतर गांवों में लगभग 24 घंटे बिजली उपलब्ध है। साथ ही, राज्य के सारे गावों को सभी मौसमों में 24 घंटे उपलब्ध सड़कों से जोड़ दिया गया है। गेहूं उत्पादन में मध्यप्रदेश दूसरे स्थान पर है, तो इसकी वजह है किसानों को गेहूं की खरीद पर प्रदेश सरकार द्वारा विशेष बोनस उपलब्ध कराया जाना। कृषि उत्पादों की भंडारण क्षमता में भी सूबे ने अभूतपूर्व प्रगति की है, जिस कारण इन उत्पादों के नुकसान में कमी देखने में आई है। विभिन्न कृषि उत्पादों की पैदावार बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य में जिला स्तर पर उत्पाद विशेष के समूह विकसित किए गए, जैसे, मंदसौर, नीमच, राजगढ़, शाजापुर, देवास, सिहोर आदि जिलों में संतरे की खेती को प्रोत्साहन दिया गया।

अमरूद की खेती बढ़ाने के लिए मुरैना, श्योपुर, रतलाम, उज्जैन, शाजापुर, सिहोर, सागर, विदिशा आदि जिलों में समूह विकसित किए गए। ऐसे ही केला के उत्पादन के लिए बुरहानपुर, खरगोन, बड़वाह, खंडवा, हरदा, धार, आलू उत्पादन हेतु मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, राजगढ़, शाजापुर, उज्जैन, इंदौर, देवास तथा हरी मटर का उत्पादन बढ़ने के लिए ग्वालियर, दतिया, सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, सिवनी, छिंदवाड़ा में समूह विकसित किए गए।


मुख्यतः पश्चिमी राष्ट्रों ने सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर तेज करने के लिए औद्योगिक विकास का सहारा लिया है। पर मध्य प्रदेश ने पिछले पांच साल के दौरान कृषि क्षेत्र में 14 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज कर सकल घरेलू उत्पाद में तेज वृद्धि दर्ज करने में सफलता पाई है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय भी अब बढ़कर 1,324 अमेरिकी डॉलर हो गई है। जबकि अक्तूबर, 2019 से जून, 2020 के बीच 17.29 करोड़ डॉलर का विदेशी निवेश हुआ है। सौर ऊर्जा के उत्पादन के क्षेत्र में भी मध्यप्रदेश अनुकरणीय कार्य करता दिख रहा है। प्रधानमंत्री ने हाल ही में रीवा में एशिया के सबसे बड़े 750 मेगावाट की क्षमता की सौर ऊर्जा परियोजना का उद्घाटन किया है।

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