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लोकसभा चुनाव 2019: दो-दो तीन-तीन बार सीएम बने दिग्गज संतानों के लिए नाप रहे गलियां

Sun, 28 Apr 2019 03:12 AM IST
गौरव द्विवेदी समीर शर्मा, अमर उजाला, जोधपुर/झालावाड़
समीर शर्मा, अमर उजाला, जोधपुर/झालावाड़ Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sun, 28 Apr 2019 03:12 AM IST
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LS Election 2019: Legendary leaders like Gehlot and Vasundhara doing hard work for their children
वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत (फाइल फोटो)

तीसरी बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत और दो बार सीएम रहीं वसुंधरा राजे के 'लाड़लों' की अलग-अलग क्षेेत्रों में चुुनावी लड़ाई ने राजस्थान के रण को रोचक बना दिया है। पहले केवल वसुंधरा राजे को ही अपने बेटे के लिए वोट मांगते देखा जाता रहा है, इस बार उनके साथ अशोक गहलोत भी अपने बेटे के लिए प्रचार में जुटे हैं और घर-घर व गली-गली घूमते हुए वैभव के लिए वोट मांग रहे हैं। गहलोत के बेटे वैभव गहलोत कांग्रेस के टिकट पर जोधपुर से पहली बार कोई चुनाव लड़ रहे हैं, तो झालावाड़-बारां सीट से जीत की हैट्रिक लगा चुके वसुंधरा राजे के बेटे सांसद दुष्यंत सिंह चौथी बार मैदान में हैं। 

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भाजपा सांसद दुष्यंत ने मां की विरासत को सुरिक्षत रखा है, लेकिन वैभव पहली बार इस चुनाव में पिता का गढ़ बचाने की जिम्मेदारी उठाएंगे। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस में पक्ष में आए आंकड़े वैभव के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद जगा रहे हैं। जोधपुर की 8 विधानसभा सीट में से कांग्रेस ने छह जीती।
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मतदाताओं के जहन में वैभव व दुष्यंत नहीं, बल्कि गहलोत और वसुंधरा ही हैं। इन जिगर के टुकड़ों की जीत-हार पिता व मां की साख से सीधी जुड़ी हुई है, ये जीते तो श्रेय मिलेगा व हारे तो आलोचना। यह चुनाव खुलासा कर देगा कि किसकी रणनीति अधिक कामयाब रही।
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राजस्थान में मैं पिछले 15 वर्षों से कांग्रेस पार्टी के लिए काम कर रहा हूं और पार्टी ने इसी आधार पर मुझे टिकट दिया है। कार्यकर्ता रहने के कारण मेरे पिता की विरासत मुझ पर लागू नहीं होती। मैं वर्ष 2003 से यूथ कांग्रेस के जरिए पूरे समर्पण भाव से पार्टी की सेवा कर रहा हूं। केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों ने जोधपुर की उपेक्षा की है। -वैभव गहलोत

कोई चुनाव आसान नहीं होता। यहां आमजन को तय करना है कि क्षेत्र का विकास किसने किया। किसान-जवान कांग्रेस के झूठे वादों से सावधान रहें। जनता मुझे अपने परिवार का सदस्य मानकर जिताती है। काफी अपनापन मिलता है। 15 वर्षों की राजनीति में मैने हमेशा से ही जन समस्याओं को दूर करने के लिए ईमानदार प्रयास किए हैं। -दुष्यंत सिंह
 

बेटों को विरासत में मिले लोकसभा क्षेत्र

दुष्यंत भले ही तीसरी बार सांसद हैं, लेकिन क्षेत्र में वे अपनी मां के प्रभाव से ऊपर नहीं उठ पाए और लोग भी राजे को ही नेता मानकर उनके पक्ष में मतदान करते हैं। यही बात वैभव गहलोत पर लागू हो रही है। झालावाड़-बारां सीट से वसुंधरा राजे पांच बार सांसद रहीं, 2003 में झालरापाटन से विधानसभा गईं। वहीं, जोधपुर सीट से अशोक गहलोत पांच बार सांसद रहने के बाद इसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सरदारपुरा सीट से लगातार पांचवी बार विधानसभा चुनाव जीते।

वैभव के सामने केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह  

वैभव का मुकाबला केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से है। अशोक गहलोत जानते हैं कि वैभव के लिए डगर काफी कठिन है। वैभव और वह अपने काम के आधार पर वोट मांग रहे हैं। इधर, शेखावत मोदी के हाथ मजबूत करने के लिए वोट मांग रहे हैं। गहलोत की सादगी के कारण लोग उन्हें 'मारवाड़ का गांधी' भी पुकारते हैं। वहीं, गजेंद्र छात्र राजनीति  से आरएसएस व स्वदेशी जागरण मंच से भी जुड़े रहे। उन्हें व्यवहार कुशल व जमीन से जुड़ा नेता माना जाता है। 

बेटों के लिए पहुंच रहे अपने-अपने गढ़

गहलोत और वसुंधरा प्रदेशभर में जनसभाओं, आलाकमान की रैलियों में उपस्थित रहने व बैठकों में शामिल होने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पर, मौका मिलते ही बेटों के लिए अपने-अपने गढ़ में पहुंच रहे हैं और जनसम्पर्क में जुट जाते हैं। हाल ही पीएम मोदी ने कहा था कि गहलोत अन्य उम्मीदवारों को भूलकर केवल जोधपुर में बेटे के लिए गली-गली घूम रहे हैं। अगले दिन गहलोत ने कहा था   कौन सा पिता अपने बेटे की सफलता के लिए दौड़-धूप नहीं करता।

जातियों की अंकगणित साधने में सभी जुटे

गहलोत यहां लोगों व स्थानीय नेताओं व सोसायटियों से व्यक्तिगत सम्पर्क में जुटे हुए हैं। वे एससी व एसटी के साथ जाट व विश्नोई समाज को भी साधने में लगे हैं। गहलोत जानते हैं कि अकेले माली समाज के वोटों से वैभव की नैया पार नहीं लग सकती। गजेंद्र का साथ यहां का सबसे बड़ा राजपूत वोट बैंक दे रहा है। करीब पांच लाख सवर्ण वोट से भी उन्हें उम्मीद है। वे राजपूतों के बराबर वोट वाले अन्य पिछड़ा वर्ग को अपने पाले में करने में भी जुटे हुए हैं।

वसुंधरा व दुष्यंत के अभेद्य गढ़ में कांग्रेस ने उतारा नया चेहरा

झालावाड़-बारां भाजपा, वसुंधरा राजे व दुष्यंत के लिए मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है। यहां चेहरा भले ही दुष्यंत हों, लेकिन वसुंधरा राजे को ध्यान में रखकर लोग भाजपा को वोट देते आए हैं। हर बार की तरह वसुंधरा ही दुष्यंत का चुनाव अभियान संभाल रही हैं। दुष्यंत तीन चुनाव जीते हैं और हर बार की तरह अपनी मां के साथ जमकर प्रचार कर रहे हैं, उनका गांव-गांव पहुंचने का प्रयास रहता है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भाजपा के इस किले में झालावाड़ के स्थानीय नए चेहरे प्रमोद शर्मा से चुनौती दिलवाई है, जो गत दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा से बगावत कर कांग्रेस में शामिल हुए थे। 

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मानवेंद्र सिंह का साथ देते हुए वसुंधरा राजे की मुखालफत करने का इनाम उन्हें लोकसभा में कांग्रेस के टिकट के रूप में मिला है। भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए मानवेंद्र सिंह ने झालरापाटन विधानसभा सीट से वसुंधरा राजे को चुनौती दी थी और हारे थे। कांग्रेस को भी यहां से खाता खुलने का इंतजार है। यहां लोगों का कहना है कि इस चुनाव में पलड़ा एक बार फिर दुष्यंत सिंह का भारी नजर आता है। बीते 30 सालों से इस सीट से भाजपा को कोई हिला नहीं पाया। कांग्रेस की न्याय योजना की चर्चा सुनाई नहीं देती, यहां मुद्दा राष्ट्रवाद, मोदी और वसुंधरा हैं।

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