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लोकसभा अध्यक्ष ने ही संविधान की प्रस्तावना से की आंखें बंद, बिना 'आत्मा' जारी हुआ कैलेंडर!

शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 24 Jan 2020 08:42 PM IST
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Calander 2020
Calander 2020 - फोटो : Amar Ujala
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संसद में लोकतांत्रिक परंपरा के पक्षधर लोकसभा अध्यक्ष ने संविधान की प्रस्तावना से अपनी आंख बंद कर ली है। लोकसभा सचिवालय ने 2020 के जिस कैलेंडर को स्वीकृति दी है, वह संविधान की खूबियों पर आधारित है। इस कैलेंडर के हर पन्ने पर संविधान के स्वर्णाक्षर वाले पन्नों की प्रतियां मौजूद हैं।
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जनवरी महीने के शुरूआत भाग-22 से हो रही है। इसमें संक्षिप्त नाम, प्रारंभ और निरसन का उल्लेख है। फरवरी का महीना संविधान में यूनियन और इसकी टेरिटरी की व्याख्या कर रहा है। मार्च का महीना भाग-3, मूल अधिकार को बता रहा है, लेकिन प्रस्तावना कहीं नहीं है।

हटा दिया गया संविधान की प्रस्तावना का पेज

सचिवालय के योजनाकारों ने संविधान की प्रस्तावना के पेज को कैलेंडर 2020 में शामिल किया था। बताते हैं, फाइल आगे बढ़ी, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया। सूचना है कि संविधान की प्रस्तावना से अधिकारियों ने आंखे मूंद ली। बताते हैं कैलेंडर फाइनल होने से पहले लोकसभा अध्यक्ष की तरफ से मंजूरी दी गई थी।

सूचना यहां तक है कि इस बार के कैलेंडर को संविधान केंद्रित तैयार कराए जाने को लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला बहुत उत्साहित थे। समझा जा रहा है कि जिस तरह से विपक्ष लगातार सरकार पर संविधान की धज्जियां उड़ाने का आरोप लगा रहा है, उसे ध्यान में रखकर इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन कैलेंडर में संविधान की आत्मा संविधान की प्रस्तावना न होना लोकतंत्र प्रेमियों को अखर रहा है।

क्यों जरूरी है संविधान की प्रस्तावना?

कैलेंडर में हर पेज पर भारतीय संविधान का लोगो मौजूद है, लेकिन प्रस्तावना नहीं है। संविधान की प्रस्तावना हमारे भारतीय संविधान की आत्मा मानी जाती है। इसमें भारतीय संविधान का सार, उद्देश्य, लक्ष्य, दर्शन और अपेक्षाएं प्रकट की गई हैं। प्रस्तावना घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे देश की जनता से प्राप्त करता है।

इसी कारण हम भारत के लोग...के उद्बोधन के साथ इसे आरंभ करते हैं। संविधान की प्रस्तावना का पहला वाक्य है कि...हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व, संपन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
 
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा...
 
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चति करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए...
 
दृढ़ संकल्प होकर अपने इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ई को एतद्वारा...
 
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
 
के.एम मुंशी ने संविधान की इस प्रस्तावना को राजनीतिक कुंडली का नाम दिया है। लेकिन अफसोस इस कुंडली के बिना लोकसभा सचिवालय ने संविधान का मान बढ़ाने वाला कैलेंडर जारी कर दिया है।

ज्वलंत है प्रस्तावना का मसला

लोकसभा सचिवालय के कुछ अधिकारी भी इसे गंभीर मसला मान रहे हैं, लेकिन अधिकांश की जुबान पर ताला लगा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि नागरिकता कानून समेत तमाम मुद्दों पर देश में विरोध हो रहा है। पंथ निरपेक्षता या धर्म निरपेक्षता भी बड़ा मुद्दा बनी हुई है। हो सकता है ऐसे संविधान की प्रस्तावना प्रकाशित करने में परहेज किया गया हो, लेकिन यह मेरी निजी राय है कि बिना संविधान की प्रस्तावना के इस तरह के कैलेंडर का कोई औचित्य नहीं है।
 
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