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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद को लड़नी पड़ेगी टेढ़ी लड़ाई 

Tue, 15 Jan 2019 09:02 PM IST
Nilesh Kumar शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: Nilesh Kumar Updated Tue, 15 Jan 2019 09:02 PM IST
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Lok sabha elections 2019 is not easy for congress leader Ghulam nabi azad in uttar pradesh
gulam nabi azad

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई थोड़ी टेढ़ी हो रही है। राज्य में वोट प्रतिशत के लिहाज से सिकुड़ी हुई कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी पूरे उत्साह में हैं। बनारस के राजेश मिश्रा की उम्मीदें बढ़ गई हैं। मुरादाबाद, सहारनपुर, कानपुर के कांग्रेसी कार्यकर्ता पार्टी के राज्य में अकेले जाने से खुश हैं, लेकिन कांग्रेस के यूपी के प्रभारी गुलाम नबी आजाद के माथे पर पसीने की बूंदे हैं। 

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव गुलाम नबी आजाद को यूपी में महागठबंधन की उम्मीद थी, लेकिन सपा-बसपा ने फिलहाल पानी फेर दिया है। ऐसे में पार्टी के नेता टिकट मिलने और चुनाव लडऩे के अवसर को देखकर उत्साहित हैं, जबकि पार्टी के रणनीतिकार फिलहाल बगलें झांक रहे हैं। 

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कुंडी न खटकाओ राजा, सीधे चले आओ राजा

कांग्रेस की स्थिति इस समय इस गीत के बोल जैसी हो गई है। मानो वह छोटे-छोटे गठबंधन की चाह रखने वाले दलों से कह रही हो कि कुंडी न खटकाओ(मशक्कत न करो) राजा, सीधे चले आओ। हालांकि पार्टी के कुछ केन्द्रीय मंत्रियों और रणनीतिकारों का मानना है कि कांग्रेस यूपी में अकेले लड़कर 15 से ऊपर सीटें लाएगी। इन नेताओं का यह तर्क पार्टी की चुनावी तैयारी में लगे नेताओं के गले नहीं उतर रहा है। 

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पार्टी के एक वरिष्ठ नेता से जब जानने की कोशिश हुई कि क्या पार्टी चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल, अपना दल, कृष्णा पटेल गुट, शिवपाल यादव की पार्टी से चुनाव गटबंधन करेंगी तो सूत्र का कहना है कि अभी समय दीजिए। हम कुछ तो करेंगे, लेकिन क्या करेंगे अभी नहीं कह सकते। 

यह पूछने पर क्या शिवपाल को साथ लेने पर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव चुनाव बाद के तालमेल की स्थिति आने पर नाराज नहीं होगे, तो उ.प्र. में कांग्रेस के राजनीति का चौसर बिछा रहे सूत्र का कहना था कि तब की तब देखेंगे।

दो भंवर में फंस गई है कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी को अगड़ी जाति, कुछ पिछड़ी जाति, अल्पसंख्यक वोटों से काफी उम्मीद थी। सपा और बसपा का साथ मिलने पर कांग्रेस को यूपी में सफलता मिलने की संभावना थी। इसका असर अन्य राज्यों की राजनीति पर पडऩा तय माना जा रहा था। कांग्रेस के नेताओं की माने तो पार्टी नेताओं का मोरॉल बढ़ जाता। इस मोर्चे पर झटका लगा है। 

दूसरा बड़ा झटका मोदी सरकार द्वारा अंतिम समय में लाए गए आर्थिक आधर के आरक्षण से हैं। कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि इससे अगड़ी जाति का वोट भाजपा से खिसकने में कुछ हद तक परहेज कर सकता है। यह कभी कांग्रेस का वोट हुआ करता था। इस स्थिति में यूपी की राजनीतिक लड़ाई सपा-बसपा गठबंधन और भाजपा के बीच में होने की पूरी उम्मीद है।

शतरंज की तरह टेढ़ी हुई लड़ाई

शतरंज के घोड़े की तरह कांग्रेस की राजनीतिक चाल अब ढाई कदम जैसी हो गई है। पार्टी को सीधा दिखाई दे रहा रास्ता राजनीतिक रुप से टेढ़ा नजर आ रहा है। तेजस्वी यादव के अखिलेश और मायावती से मिलकर आने के बाद कांग्रेस के नेता एक अज्ञात भय से गुजर रहे हैं। 



उन्हें लग रहा है कि कहीं बिहार में भी कांग्रेस मुक्त महागठबंधन का स्वरूप न बन जाए। फिलहाल अभी कांग्रेस की निगाह यूपी में राजनीति की जमीन को हरा बनाने में लगी है। पार्टी के आरपीएन सिंह, जतिन प्रसाद जैसे नेताओं को 2019 बहुत आसान नहीं लग रहा है।

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