बिहार की राजनीति हमेशा से दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरी रही है और इसका प्रभाव देश की राजनीति पर भी पड़ता है। लोकसभा चुनाव 2019 के लिए मतदान 11 अप्रैल से शुरू हो रहा है। इस बार एक-एक सीट का महत्व बढ़ गया है। साफतौर पर भाजपा और विपक्ष में कांटे की टक्कर नजर आ रही है। तमाम क्षेत्रीय दल भाजपा के खिलाफ एकजुट नजर आ रहे हैं। बिहार में भी कड़ा मुकाबला होने के आसार दिख रहे हैं। एक तरफ भाजपा-जदयू तो दूसरी तरफ राजद-कांग्रेस व अन्य दल गठजोड़ बनाकर चुनावी मैदान में उतरे हैं। लोकसभा चुनाव में दोनों गठबंधन एक-दूसरे को टक्कर देने के लिए तैयार बैठे हैं। सवाल है कि क्या इस बार यहां मोदी-नीतीश का जादू चलेगा या तेजस्वी यादव सियासत के आकाश में चमकेंगे। आइए जानते हैं बिहार में किस तरह की सियासी तस्वीर उभर रही है और कौन सा गठबंधन यहां भारी पड़ सकता है।
बिहार की जंग: क्या चलेगा मोदी-नीतीश का जादू या चमकेंगे तेजस्वी?
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बिहार में कुल 40 लोकसभा सीटें हैं। इस बार यहां की सियासी तस्वीर बता रही है कि 2019 की चुनावी जंग अब तक की सबसे बड़ी जंग होगी। एक तरफ भाजपा, नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइडेट (जदयू) और रामविलास पासवान की लोकतांत्रिक जनता पार्टी (लोजपा) है, तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और अन्य छोटे दल हैं। आपको दोनों गठबंधन की सीटों का गणित बताते हैं। एनडीए के फॉर्मूले के तरह भाजपा और जदयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। लोजपा को छह सीटें दी गई हैं। 2014 चुनाव में भाजपा ने 22 सीटों पर कब्जा जमाया था, वहीं जदयू को मात्र दो सीटें मिली थीं। 2009 में दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और 40 में से 31 सीटें जीती थीं।
एनडीए से मुकाबले के लिए इस बार विपक्षी दलों का महागठबंधन आकार ले चुका है। राजद की अगुवाई में बने महागठबंधन में कुल पांच पार्टियां शामिल हैं। ये हैं- राजद, कांग्रेस, जीतनराम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा, उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और विकासशील इंसान पार्टी। कुल 40 सीटों में से राजद सबसे ज्यादा 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, उसके कोटे से सीपीआई माले को एक सीट दी जाएगी। कांग्रेस को 9, रालोसपा को पांच, हम और वीआईपी को तीन-तीन सीटें दी गई हैं।
2014 लोकसभा चुनाव मेें बिहार में जबरदस्त मोदी लहर थी। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा था। भाजपा ने 40 में से 22 सीटों पर कब्जा जमाया था। लोजपा को छह और रालोसपा को तीन सीटें मिली थीं। राजद को चार, जदयू-कांग्रेस को दो-दो और एनसीपी को एक सीट मिली थी। भाजपा को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के बाद बिहार में सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं। लोकसभा चुनाव में मिली बुरी हार का ही नतीजा था कि 2015 विधानसभा चुनाव में राजद-जदयू को मिलकर चुनाव लड़ना पड़ा।
243 सीटों वाले बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू, आरजेडी और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। जदयू को 71, आरजेडी को 80 और कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने 58 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इन नतीजों ने उन सभी अनुमानों और सर्वे को ध्वस्त कर दिया था जो बता रहे थे कि यहां एनडीए की सरकार बन सकती है। लालू का पुराना जलवा नजर आया और राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।