Lok Sabha Election 2024: विपक्ष को मुद्दे नहीं, रणनीति बदलने की जरूरत, यहां से निकल सकता है जीत का रास्ता
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विस्तार
कर्नाटक जीत के बाद उत्साह से लबरेज कांग्रेस को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा है। इससे कांग्रेस के मनोबल पर असर पड़ा है। विपक्ष के वे सारे मुद्दे जिनके सहारे उसने इन चुनावों में भाजपा को घेरने की कोशिश की, बुरी तरह फ्लॉप साबित हुए। इसमें जातिगत जनगणना, जातिगत आरक्षण को बढ़ाना और पुरानी पेंशन योजना शामिल थी। चूंकि, कांग्रेस और विपक्ष इन्हीं मुद्दों के सहारे लोकसभा चुनावों में भी मोदी को घेरने की रणनीति बना रहा था, उसकी लोकसभा की उम्मीद भी कमजोर हुई है।
लेकिन यह इस मामले का एक पक्ष है। इस मामले का दूसरा पक्ष यह भी है कि इन्हीं मुद्दों के सहारे कांग्रेस ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपना वोट शेयर लगभग बरकरार रखा है। राजस्थान में उसे 39.53 फीसदी वोट मिला। पिछले चुनाव के मुकाबले यह 0.23 फीसदी ज्यादा है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस को 40.45 फीसदी मत मिले, जो पिछले चुनाव के मुकाबले 0.44 फीसदी कम है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 42.23 फीसदी मत मिले, जो उसके पिछले प्रदर्शन से 0.9 फीसदी कम है।
राजस्थान-छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने अपना वोट शेयर बरकरार रखने की सफलता ऐसे समय में पाई है, जब इन राज्यों में सरकार बदलने और एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का भी सामना पड़ा। इन राज्यों में इनके नेताओं को आपस की कलह से जूझते हुए भी यदि अपना वोट शेयर बरकरार रखने में सफलता मिली है, तो इसका बड़ा श्रेय इन योजनाओं को दिया जा सकता है। तेलंगाना में कांग्रेस को 39.40 फीसदी मत मिला है, जो उसके पिछले प्रदर्शन से 11 फीसदी ज्यादा है। इसके मूल में भी इन मुद्दों का असर माना जा सकता है।
यह अवश्य कहा जा सकता है कि इन मुद्दों ने कांग्रेस के खाते में नए मतदाता वर्ग को जोड़ने में सफलता नहीं पाई, लेकिन तमाम कारणों के बीच यदि कांग्रेस अपना मत प्रतिशत बरकरार रखने में भी सफल रही है, तो इसका कारण इन मुद्दों और उसके मतदाताओं की कांग्रेस के प्रति समर्पण को कारण माना जा सकता है।
ध्यान देने की बात है कि इन चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत अचानक पांच से छह प्रतिशत तक बढ़ गया है। छत्तीसगढ़ में भाजपा के मत प्रतिशत में 13.33 फीसदी, मध्यप्रदेश में 7.6 फीसदी और राजस्थान में 3.61 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। समझने की बात यह भी है कि जब इन राज्यों के सबसे बड़े दल कांग्रेस के मत प्रतिशत में ज्यादा कमी नहीं आई, तो भाजपा के मत प्रतिशत में यह उछाल कहां से आया।
भाजपा के मत प्रतिशत में यह उछाल समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आरएलपी और अन्य छोटे-छोटे दलों के मत प्रतिशत में भारी कमी के कारण आया। इस हाई प्रोफाइल चुनाव में भाजपा मतदाताओं को यह समझाने में कामयाब रही कि लोगों को इधर-उधर वोट करके अपना वोट खराब नहीं करना चाहिए। मतदाताओं ने सरकार बनाने में अग्रणी दल को अपना वोट देकर अपने मत को सार्थक करने का विकल्प अपनाया। भाजपा के लिए यह सोच वरदान बन गई। गुजरात चुनावों में भी मतदाताओं के बीच इसी तरह की सोच देखी गई थी।
कांग्रेस-विपक्ष को क्या करना चाहिए?
जनता दल यूनाइटेड नेता केसी त्यागी ने अमर उजाला से कहा कि जो मुद्दे जनता के आर्थिक-सामाजिक बदलाव से जुड़े होते हैं, वे मामले को हल किए बिना समाप्त नहीं होते। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि यूपी-बिहार सहित दक्षिण के तमाम राज्यों में वही राजनीतिक दल प्रमुख बने हुए हैं, जिन्होंने पिछड़े-दलित तबकों के सामाजिक कल्याण को आगे बढ़ाने का काम किया। यदि ये मुद्दे असरहीन होते, तो बिहार में जदयू-आरजेडी और दक्षिण में स्टालिन की पार्टी सरकार में न होती।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि उसने इंडिया गठबंधन को कम करके आंका। उसने सीट साझेदारी करना तो दूर, उन्हें प्रचार के लिए आमंत्रित तक नहीं किया। उलटे इनके नेताओं ने दूसरे दलों के नेताओं को अपमानित करने का काम किया। कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि अब उसके अकेले के शासन करने का दौर समाप्त हो चुका है।
भाजपा और नरेंद्र मोदी इसलिए सफल हैं क्योंकि वे सबको साथ लेकर चलने की रणनीति अपना रहे हैं। कोई राजनीतिक दल किसी छोटे जातीय समूह का भी प्रतिनिधित्व करता है, अमित शाह उसे अपने साथ लेने के लिए तैयार रहते हैं, जबकि राहुल गांधी और कांग्रेस ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की है। यदि कांग्रेस और विपक्ष को आज की मोदी और भाजपा से मुकाबला करना है, तो उसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ लेकर चलने की रणनीति अपनानी चाहिए।