35 साल बाद सुल्तानपुर लौटीं मेनका की राह में पति के दोस्त संजय सिंह हैं रोड़ा
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12 मई को होने वाले मतदान के लिए चुनाव का आखिरी दिन है। मेनका गांधी की टीम ने सांसद वरुण गांधी की विरासत को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। बड़ी संख्या में दूसरे क्षेत्रों से आए भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं ने भी कमान संभाल रखी है। लेकिन घर-घर दस्तक देकर मेनका को सांसद बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उनके पति संजय गांधी के दोस्त और कांग्रेस के उम्मीदवार संजय सिंह बने हैं। अमेठी के संजय सिंह सुल्तानपुर में अपनी एक पकड़ रखते हैं। अगड़ी जाति का वह बड़े पैमाने पर वोट काट रहे हैं और प्रियंका गांधी के प्रचार ने भी संजय को एक ताकत दे दी है।
मेनका और संजय के साथ मुकाबले में गठबंधन के प्रत्याशी चंद्रभद्र सिंह हैं। दबंग किस्म के चंद्रभद्र सिंह बसपा के विधायक रह चुके हैं। चंद्रभद्र सिंह के खाते में बसपा का कॉडर वोट, समाजवादी पार्टी के मतदाताओं की पूंजी है। हालांकि शिवपाल की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी(लोहिया) की प्रत्याशी कमला यादव उन्हें कुछ नुकसान पहुंचा रही हैं, लेकिन चंद्र भद्र के समर्थक अखिलेश सिंह का कहना है कि यादव समेत अन्य पिछड़ा वर्ग, मुसलमान और अनुसूचित जातियों का वोट चुनाव में जीत पाने का संख्याबल दे रहा है।
रितेश सिंह का कहना है कि सुल्तानपुर में अच्छी संख्या में ठाकुर मतदाता हैं। इनमें भी बंटवारा हो रहा है। कुछ हिस्सा संजय सिंह के साथ रहेगा, जो कट्टर भाजपाई हैं, वह कमल के साथ रहेंगे, लेकिन एक तिहाई से अधिक वोट चंद्रभद्र सिंह के खाते में आएगा। जबकि मेनका गांधी के पास गांधी परिवार की बहू, भाजपा की प्रत्याशी होने के अलावा क्या है।
35 साल बाद सुल्तानपुर लौटी हैं मेनका
मेनका गांधी पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अमेठी सीट पर चुनौती देने 80 के दशक में आई थीं, लेकिन चुनाव हार गई थीं। तब अमेठी सुल्तानपुर जिले की लोकसभा सीट थी। 35 साल बाद मेनका फिर लौटी हैं। 1984 में मेनका को संजय सिंह से मदद नहीं मिल पाई थी। संजय सिंह ने तब कांग्रेस का साथ दिया था। जबकि संजय सिंह कांग्रेस पार्टी के युवा नेता और भारतीय राजनीति में दबदबा रखने वाले संजय गांधी के मित्र थे।
संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मृत्यु होने के बाद मेनका ने राजनीति की अलग राह चुन ली और संजय सिंह कांग्रेस के साथ जुड़े रहे। अब वहीं संजय सिंह मेनका खिलाफ कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। संजय सिंह ब्राह्मण, पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति , अल्पसंख्यक वर्ग समेत सबमें थोड़ी-बहुत पकड़ रखते हैं। माना यह जा रहा है कि संजय के मैदान में होने से भाजपा को वोटों का नुकसान होने की संभावना अधिक है।
क्या है समीकरण
सुल्तानपुर में कोई 17 लाख, 72 हजार 251 मतदाता हैं। इनमें से 30-39 वर्ष के मतदाता करीब 5.5 लाख हैं। यह वर्ग राजनीति में खासी दिलचस्पी लेने वाला भी है और इस वर्ग में प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों की संख्या ठीकठाक है। मेनका गांधी के समर्थक इससे काफी राहत की सांस ले रहे हैं। 20-29 साल के मतदाताओं की संख्या भी कोई 4.17 लाख है। 3.60 लाख मतदाता 40-49 वर्ष के हैं।
भाजपा की जीत का चुनावी गणित जोड़ने वाले राम सुभग सिंह कहते हैं जिस जिले का आधे से अधिक मतदाता 20-39 आयु वर्ग का है, वहां भाजपा को चिंता करने की जरूरत नहीं है। हालांकि जातिगत राजनीतिक समीकरण की चर्चा छेड़ने पर राम सुभग सिंह इस पर कोई तर्क वितर्क नहीं करना चाहते। वह इस बारे में केवल इतना कहते हैं कि मेनका के पक्ष में वरुण गांधी की मशीनरी (प्रचार के लिए समर्थक) लगे हैं। वरुण गांधी ने सुल्तानपुर में ठीक-ठाक सोशल नेटवर्किंग कर रखी है और इसका भाजपा को फायदा मिलेगा। वैसे भी मेनका गांधी स्व. संजय गांधी की पत्नी भी हैं।
प्रियंका का प्रचार गठबंधन की जीत
सुल्तानपुर राजनीति में दबदबा रखने वाला जिला है। लोगों की राजनीति में दिलचस्पी और समझ गजब की है। ओंकार मिश्रा कहते हैं कि सुल्तानपुर में जातिगत समीकरण प्रभावी है। मध्य उ.प्र. से पूर्वांचल तक अब जाति ही चलेगी। ओंकार और चंचल का कहना है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी कांग्रेस के प्रत्याशी को भले न जिता पा रही हों, लेकिन भाजपा को तगड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं। अखंड प्रताप सिंह भी ओंकार और चंचल की बात का समर्थन करते हैं।
दीपक चौरसिया का कहना है कि प्रियंका के प्रचार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साख को तगड़ा बट्टा लग रहा है। वह किसानों, युवाओं, लोगों का जरूरी मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री की छवि को बेअसर करने में योगदान दे रही हैं। इसका सीधा फायदा गठबंधन के प्रत्याशी को मिल रहा है। कमलेश यादव इस पर तंज भी कसते हैं। कमलेश का कहना है कि कांग्रेस महासचिव ने अपनी पार्टी को वोट कटवा पार्टी बता रखा है।