नेता, चुनाव के दौरान ही सबसे ज्यादा विवादित बयान देते हैं। जनता के सामने वोट मांगने तो जाते हैं लेकिन कई बार जनता को धमका भी आते हैं। इसके कई उदाहरण हमें 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव प्रचार में देखने को मिल रहे हैं। आइए एक नजर भाजपा नेताओं की तरफ से दिए ऐसे ही कुछ बयानों पर डालते हैं जो चर्चाओं में रहे हैं।
नेताओं के वो 5 बयान जिनमें वोट मांगने के नाम पर जनता को सरेआम धमकी दी गई
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'संन्यासी हूं, वोट नहीं दिया तो श्राप दे दूंगा'
साक्षी महाराज के वोट नहीं दिया तो श्राप दे दूंगा वाले बयान ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थी। इस बयान के लिए साक्षी महाराज पर आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में केस भी दर्ज हुआ था। साक्षी महाराज ने कहा था, 'मैं संन्यासी हूं, आपके दरवाजे पर भीख मांगने आया हूं। अगर एक संन्यासी को मना किया तो आपकी गृहस्थी के पुण्य ले जाऊंगा। श्राप दे जाऊंगा।' साक्षी महाराज ने जनता से वोट मांगते हुए ये बातें कही थीं।
'जिस गांव से ज्यादा वोट मिलेगा, वहां काम पहले होगा'
सुल्तानपुर से भाजपा प्रत्याशी मेनका गांधी के इस बयान ने भी काफी सुर्खियां बटोरी। उन्होंने पीलीभीत में एक रैली के दौरान साफ कहा- जहां से ज्यादा वोट मिलेगा, वहां ज्यादा काम होगा। मेनका गांधी ने गांवों को ए, बी, सी और डी कैटिगिरी में बांटने की बात भी कही। उन्होंने कहा था कि जिस गांव से 80 फीसदी वोट मिलेंगे, वह 'ए' कैटेगरी में रहेगा, जिसमें 60 फीसदी वोट मिलेंगे वो 'बी' कैटेगरी में और जिस गांव से 50 फीसदी वोट मिलेेंगे वो 'सी' कैटेगरी में होगा। 50 फीसदी से कम वोट मिलेने वाला गांव 'डी' कैटिगिरी में आएगा।
'जितना वोट उतना पानी'
गुजरात सरकार में जल आपूर्ति मंत्री कुंवरजी बावलिया का पानी पर दिया बयान काफी चर्चाओं में रहा। वह पानी की समस्या पर स्थानीय लोगों से ही पूछ बैठे कि आपने मुझे वोट दिया था? सिर्फ 55 फीसदी ने ही मुझे वोट दिया था। जितना वोट दिया, उतना पानी दिया जा रहा है। उन्होंने यह बयान राजकोट के कनेसारा गांव में चुनाव प्रचार के दौरान दिया था।
'मुस्लिम वोट नहीं करेंगे तो काम भी नहीं करूंगी'
मेनका गांधी ने यह बयान 12 अप्रैल को दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर मुस्लिम वोट नहीं देंते तो वह भी उनके लिए काम नहीं करेंगी। मेनका गांधी के इस बयान पर चुनाव आयोग ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया था। मेनका गांधी ने कहा था, ‘लोगों की मदद और प्यार से मैं जीत तो रही हूं। लेकिन अगर मेरी जीत मुसलमानों के बिना होगी तो मुझे बहुत अच्छा नहीं लगेगा। फिर दिल खट्टा हो जाता है और जब मुसलमान किसी काम के लिए आते हैं तो फिर मैं सोचती हूं कि नहीं रहने ही दो, क्या फर्क पड़ता है, आखिर नौकरी एक सौदेबाजी ही होती है।’