टूलकिट मामला: अगर आप संबित पात्रा नहीं हैं तो साइबर अपराधों पर कितनी कार्रवाई करती है पुलिस?
पिछले डेढ़ साल में 3.17 लाख साइबर फ्राड्स होने का अनुमान, बेहद कम मामलों में ही कार्रवाई करती है पुलिस, आर्थिक साइबर अपराध में लोगों के पैसे नहीं मिलते वापस...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अगर आप संबित पात्रा या कोई अन्य प्रभावशाली व्यक्ति हैं, तो आपके साथ हुए किसी साइबर अपराध के मामले की जांच करने के लिए पुलिस कंपनियों के ऑफिस तक पहुंच जाती है। लेकिन अगर आप कोई सामान्य आदमी हैं तो आपके साथ हुए किसी साइबर अपराध के मामले में कार्रवाई होने की संभावना न के बराबर ही है। सामान्य स्थिति में तो ऐसे केस दर्ज ही नहीं किये जाते, अगर दर्ज भी हो जाते हैं तो इन पर कोई जांच नहीं हो पाती। आलम यह है कि लोगों के साथ आये दिन आर्थिक साइबर अपराध हो रहे हैं, अपनी गाढ़ी कमाई साइबर अपराधियों के हाथों लुटा रहे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
कितने अपराध
सरकारी आंकड़ों को ही आधार मानें, तो पिछले डेढ़ साल में देश में 3.17 लाख साइबर अपराध किये जा चुके हैं। इनमें ग्राहकों का डाटा बेचने से लेकर बैंकिंग फ्रॉड्स, महिलाओं से अभद्रता, उनकी सामाजिक छवि को नुकसान पहुंचाना और पैसे लेकर भी उचित सेवा प्रदान न करने के मामले शामिल हैं।
आंकड़ों के अनुसार हर तीन सेकंड में एक बड़े स्तर के साइबर अपराध को अंजाम दिया जा रहा है। हर तीन में से एक स्मार्ट फोन किसी न किसी तरह से साइबर धोखाधड़ी का शिकार हो रहा है। कई मामलों में तो अपराध के शिकार हो जाने के बाद भी लोगों को यहां तक पता नहीं चलता कि वे किसी साइबर फ्राड के शिकार हो चुके हैं। वहीं, जिन लोगों के साथ सीधे बैंकिंग फ्रौड्स हो जाते हैं, उन मामलों में भी कोई कार्रवाई नहीं हो पाती।
गाजियाबाद के रमेश राय एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। एक एप के डाउनलोड करने के मामले में उनसे 20 हजार की ठगी हो गई। इस घटना के लगभग एक साल बीत चुके हैं लेकिन अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे लाखों लोग हैं जिनके साथ हो रहे साइबर फ्राड्स में कोई कार्रवाई नहीं होती।
फर्जी पोस्ट करने वाले को मिल सकती है सजा
साइबर कानून विशेषज्ञ विराग गुप्ता ने अमर उजाला को बताया कि नए आईटी एक्ट के अनुसार सोशल मीडिया के मंच से कोई भी भड़काऊ सामग्री पोस्ट करने पर पोस्ट करने वाले के खिलाफ आईपीसी और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया जा सकता है। इन मामलों में अपराध की प्रकृति के आधार पर छह महीने से तीन साल तक की सजा भी दी जा सकती है।
दिशा रवि नाम की एक सामाजिक कार्यकर्ता को किसान आन्दोलन के दौरान एक टूलकिट तैयार करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन बाद में कोर्ट ने माना कि केवल टूलकिट तैयार करना अपराध नहीं है। इसी आधार पर दिशा रवि को जमानत भी दे दी गई थी।
लेकिन किसी भी फर्जी टूलकिट को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना, या इसे शेयर करके प्रसारित करना कानून की परिभाषा में अपराध है। ऐसे लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
जैसा कि कांग्रेस इस मामले में दावा कर रही है, अगर टूलकिट में किसी गलत इरादे से छेड़छाड़ की गई है और यह बात प्रमाणित हो जाती है तो इस मामले में आईपीसी-आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं में कार्रवाई की जा सकती है।
ट्विटर-फेसबुक कब जिम्मेदार?
विराग गुप्ता के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया के किसी प्लेटफोर्म पर कोई आपत्तिजनक सामग्री डालता है तो इसके लिए सोशल मीडिया कंपनी जिम्मेदार नहीं है। लेकिन जब ऐसे किसी आपराधिक मामले की शिकायत पुलिस या किसी कोर्ट द्वारा इन कंपनियों से की जाती है, और ऐसे पोस्ट को हटाने के लिए कहा जाता है, और वह कंपनी एक निश्चित समय सीमा में ऐसे पोस्ट को नहीं हटाती है तो उस पर कनूनी कार्रवाई की जा सकती है।
क्यों नहीं होती कार्रवाई
दिल्ली पुलिस के साइबर सेल के डीसीपी रैंक के एक अधिकारी के अनुसार साइबर अपराध के मामलों में इन कंपनियों की जवाबदेही की स्थिति बेहद खराब है। किसी अपराध के होने पर जब ईमेल लिखकर इन कंपनियों से जवाब मांगा जाता है तो ये कंपनियां जवाब नहीं देतीं। इससे कई बार संगीन मामले भी हल नहीं हो पाते।
सेक्सटोर्शन के मामलों में कई बार लिखित शिकायत के बाद भी आपत्तिजनक सामग्री सोशल मीडिया से नहीं हटाई जाती जिससे किसी महिला को बदनाम किया जाता है। अधिकारियों का कहना है कि कड़ी कानूनी जवाबदेही तय करने पर ही इस तरह के मामलों में समाधान मिल सकता है।
आर्थिक अपराध के मामले कई बार पाकिस्तान, नेपाल या अन्य देशों में बैठकर अंजाम दिए जाते हैं। रकम कम होने के मामलों में बिहार-झारखंड जाकर जांच कर पाना संभव नहीं होता, जिसके कारण ऐसे अपराध दिन-रात फल-फूल रहे हैं।