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अनदेखी: देश के 71% बिजली संयंत्र उत्सर्जन मानकों पर खरे नहीं, प्रदूषण का दायरा संयंत्रों से कहीं आगे फैला

Tue, 29 Apr 2025 06:16 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 29 Apr 2025 06:16 AM IST
सार

सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की आरे से हाल ही में जारी एक विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि देश में मौजूद 537 बिजली संयंत्रों (यूनिट्स) में से 380, यानी लगभग 71 फीसदी, सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन के तय मानकों को लांघ रहे हैं। इनमें से कुछ संयंत्रों का उत्सर्जन स्तर मान्य सीमा से 10 गुना अधिक पाया गया है।

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large number of coal-based power plants in India not complying with environmental emission standards
कोयला बिजली संयंत्र (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

भारत में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों की एक बड़ी संख्या पर्यावरणीय उत्सर्जन मानकों का पालन नहीं कर रही है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की आरे से हाल ही में जारी एक विश्लेषण से खुलासा हुआ है कि देश में मौजूद 537 बिजली संयंत्रों (यूनिट्स) में से 380, यानी लगभग 71 फीसदी, सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन के तय मानकों को लांघ रहे हैं। इनमें से कुछ संयंत्रों का उत्सर्जन स्तर मान्य सीमा से 10 गुना अधिक पाया गया है।

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विश्लेषण के मुताबिक फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन ( एफजीडी) तकनीक, जो कोयला जलाने से बनने वाले सल्फर डाइऑक्साइड को कम करने में कारगर है, को देशभर में साल 2015 से अनिवार्य किया गया था। बावजूद इसके, 2024-25 तक केवल 44 संयंत्रों (8%) में ही यह सिस्टम स्थापित किया गया। शेष 493 संयंत्रों में यह तकनीक अब तक नहीं लगाई गई है। इससे पता चलता है कि नीतियों की घोषणा और जमीनी क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई है। विश्लेषण में कहा गया है कि इस दिशा में केंद्र की नीति-निर्माण प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। 2015 में बनाए गए नियमों को 2017 तक लागू किया जाना था, लेकिन कार्यान्वयन की धीमी गति को देखते हुए समयसीमा को अब तक चार बार टाला जा चुका है। हालिया निर्णय के अनुसार अब एफजीडी स्थापना की अंतिम समयसीमा 2029 कर दी गई है, जिससे नियमों के प्रति सरकारी गंभीरता पर सवाल उठते हैं।
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प्रदूषण का दायरा संयंत्रों से कहीं आगे फैला
सीआरईए के अनुसार उत्सर्जित प्रदूषकों का 16 फीसदी हिस्सा संयंत्र स्थल से काफी दूर तक फैलता है, जिससे दूरस्थ और अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। इसका सीधा अर्थ है कि इस समस्या का असर केवल स्थानीय न रहकर व्यापक हो रहा है।

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हवा में प्राइमरी पीएम 2.5 की बजाय सेकेंडरी पीएम 2.5 की अधिकता
आईआईटी दिल्ली और आईआईटी बॉम्बे के हालिया अध्ययनों के अनुसार भारत की हवा में प्राइमरी (प्रत्यक्ष) पीएम 2.5 की बजाय सेकेंडरी (रासायनिक प्रतिक्रिया से बनने वाले) पीएम 2.5 की अधिकता है। इसमें सल्फर डाइऑक्साइड की प्रमुख भूमिका होती है। अध्ययन यह भी बताते हैं कि बिजली संयंत्र देश के पीएम 2.5 प्रदूषण में लगभग 11 फीसदी की हिस्सेदारी रखते हैं, जो वाहनों से होने वाले उत्सर्जन के बराबर है।

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