कुरुक्षेत्र: नए अध्यादेशों के बाद अब साफ हो सकता है संविदा और कॉरपोरेट खेती का रास्ता
- नहीं बचे हैं जनाधार वाले किसान नेता जो सरकार को चुनौती दे सकें
- अगला कदम भूमि हदबंदी कानून (लैंड सीलिंग एक्ट) में बदलाव का भी हो सकता है
- नए कानून से 1939 में बना मंडी अधिनियम हुआ निरर्थक
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विस्तार
मोदी सरकार ने कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए जो तीन नए कानून बनाए हैं उनसे भारतीय खेती की पूरी तस्वीर बदल जाएगी। कृषि विशेषज्ञों का यहां तक कहना है कि इन तीनों कानूनों के जरिए केंद्र सरकार ने संविदा खेती के साथ-साथ कॉरपोरेट खेती की तरफ भी कदम बढ़ा दिए हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक जाने-माने कृषि विशेषज्ञ जिनका केंद्र सरकार में भी खासा रसूख है, ने बताया कि कृषि सुधारों की दिशा में सरकार का अगला कदम और भी अहम होगा। वह यह कि भूमि हदबंदी कानून (लैंड सीलिंग एक्ट) में बदलाव का भी हो सकता है, जिससे कॉरपोरेट खेती का रास्ता साफ हो सके। अगर एसा हुआ तो भारत में ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था का पूरा ढांचा ही बदल जाएगा।
केंद्र सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए जो तीन नए कानून बनाए हैं, वह इसी साल अप्रैल से ही अध्यादेश के रूप में लागू हो चुके थे। अब उन्हें सिर्फ संसद की मंजूरी मिली है जो संवैधानिक बाध्यता है। लेकिन इन तीनों कानूनों को लेकर विरोधियों और समर्थकों के बीच देश बंट गया है। पूरा विपक्ष और अनेक किसान संगठन इन कानूनों को देश के किसानों के लिए मौत का परवाना कहते हुए सरकार पर हमलावर हैं। किसान संगठनों ने देशव्यापी आंदोलन की घोषणा कर दी है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात आदि राज्यों से किसान असंतोष की खबरें आ रही हैं। यहां तक कि लंबे समय से भाजपा के भरोसेमंद सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने केंद्र सरकार से अपनी मंत्री हरसिमरत कौर का इस्तीफा भी करवा दिया। हरियाणा में भाजपा के सहयोगी दल जजपा और राज्य के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला पर भी दबाव बढ़ गया है।
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे किसानों की आजादी का दस्तावेज बताया और कहा है कि अब किसान अपनी उपज का ज्यादा से ज्यादा और लाभकारी मूल्य लेने के लिए देश में कहीं भी उसे बेच सकेगा। उनके सारे मंत्री इन कानूनों के बचाव में खुलकर सामने आ गए हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि वो खुद किसान हैं और किसानों के हक पर कभी भी आंच नहीं आने देंगे। न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि उपज खरीदने वाली सरकारी मंडियों को लेकर विरोधियों की शंकाओं के जवाब में प्रधानमंत्री और सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और मंडियों की व्यवस्था पहले की तरह ही जारी रहेगी और किसान को यह आजादी होगी कि वह जहां भी उसे अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिले, उसी जगह अधिकतम मूल्य पर अपनी फसल बेचे।
उधर इसके विरोध में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि इन नए कानून से न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि उत्पाद मंडी समितियां अप्रासंगिक हो जाएंगी। विरोधियों का तर्क है कि कानून में जिस तरह के प्रावधान हैं उससे कृषि बाजार पर बड़े कॉरपोरेट घरानों का कब्जा हो जाएगा और मंडियां खत्म हो जाएंगी। किसान से मनमानी कीमत पर उसकी फसल खरीदी जाएगी जबकि अभी किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी सरकार देती है। खुद किसान परिवार से आने वाले और कृषि मामलों के विशेषज्ञ अजय जाखड़ कहते हैं कि नए कानून से 1939 में बना मंडी अधिनियम, जिसे किसान नेता सर छोटूराम के अथक प्रयासों से बनवाया गया था, अब निरर्थक हो गया है। अब फिर देश का किसान उसी पुरानी व्यवस्था में पहुंच गया है।
जबकि किसान पृष्ठभूमि वाले जनता दल (य़ू) के महासचिव के.सी.त्यागी कहते हैं कि मंडियों में कुछ चंद व्यापारी और आढ़ती मिलकर किसान की उपज का भाव तय करके उसे अपने मनमाफिक भाव पर फसल बेचने को मजबूर करते हैं और किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलता है। अब नए कानून से किसान इन व्यापारियों के चंगुल से मुक्त होकर अपनी उपज उसे बेचेगा जो उसे ज्यादा से ज्यादा मूल्य देगा।
किसान नेता वीएम सिंह कहते हैं यह कहना गलत है कि किसानों को अपनी उपज बाहर ले जाने की आजादी पहले नहीं थी। काफी पहले से किसान को कहीं भी अपनी फसल ले जाकर बेचने की आजादी रही है। सिंह जो लगातार गन्ना किसानों के बकाए भुगतान की कानूनी लड़ाई अदालतों में लड़ते रहे हैं कहते हैं कि इन कानूनों से किसान पूरी तरह बड़े कॉरपोरेट घरानों के बंधक बन जाएंगे और उन्हें उसी तरह अपनी पाई-पाई के भुगतान के लिए लड़ना पड़ेगा जैसे अभी गन्ना किसानों को लड़ना पड़ता है।
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौ.पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि सरकार ने खीर तो बना दी, लेकिन शक्कर डालना भूल गई। सिंह कहते हैं कि अगर कानून में एमएसपी की गारंटी को भी जोड़ दिया जाए तो फिर कोई मुद्दा ही नहीं रहेगा। भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष डा. कृष्णवीर सिंह चौधरी ने इन कानूनों का स्वागत करते हुए इन्हें कृषि सुधारों की दिशा में सबसे अहम कदम बताया है।
भाजपा के किसान नेता नरेश सिरोही ने भी इन सुधारों को किसानों की आमदनी बढ़ाने और उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने की दिशा में बड़े फैसले बताते हुए कहा है कि विपक्ष सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहा है, जबकि देशभर के किसान इससे खुश हैं। लेकिन पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुनील जाखड़ का आरोप है कि मोदी सरकार किसानों की मुक्ति का नाम लेकर कृषि बाजार को सरकार के नियंत्रण से मुक्त करके उसे बड़े उद्योगपतियों की झोली में डाल रही है। इन नए कानूनों ने सर छोटूराम के जमाने में बने मंडी अधिनियम से लेकर अब तक किसानों के संरक्षण के लिए जितने भी कानून बने हैं उन सबको बेअसर कर दिया है।
जाखड़ कहते हैं कि यह सरकार छोटे और मझोले किसानों को बड़े पूंजीपतियों की दया पर छोड़ देगी और सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम से तमाम आवश्यक और जीवनोपयोगी खाद्यान्नों और अन्य कृषि उपजों को बाहर करके बड़े स्तर पर जमाखोरी का रास्ता खोल दिया है। जाने-माने कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा भी इन तीनों कानूनों को किसानों के हितों के खिलाफ और पूंजीपतियों के पक्ष में बताते हैं। लेकिन सरकार के मंत्री और भाजपा नेता इन एतराजों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहते हैं कि इन तीनों कानूनों के बाद देश की कृषि एक लाभकारी उद्यम में बदल जाएगी और किसानों को उनकी फसल का सही और लाभकारी मूल्य मिल सकेगा।
केंद्र सरकार के कृषि सुधारों से जुड़े तीन कानूनों पर विपक्ष के विरोध और कई किसान संगठनों के देशव्यापी आंदोलन की घोषणाओं के बावजूद निश्चिंत है, क्योंकि अब सरकार को चुनौती देने वाले किसान नेता न तो राजनीतिक दलों में हैं न ही स्वतंत्र किसान संगठनों में और आम किसान इन कानूनों को लेकर भ्रमित है। जबकि अखबारों में लेख और टीवी चैनलों पर बहस करने वाले किसान विशेषज्ञों को मुद्दों की समझ तो है, लेकिन उनका जनाधार शून्य है। आजादी के आंदोलन के दौरान ही उत्तर भारत में स्वामी सहजानंद सरस्वती, बाबा रामचंदर और सर छोटूराम जैसे किसान नेता थे जिन्होंने किसानों के हकों के लिए तत्कालीन अंग्रेज सरकार की नाक में दम कर दिया था। इनमें स्वामी सहजानंद सरस्वती और बाबा रामचंदर जैसे किसान नेता तो अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के वाहक भी बन गए थे।
आजादी के बाद कांग्रेस और वामपंथी दलों में किसानों की आवाज माने जाने वाले कई कद्दावर नेता थे। इसके बाद एक समय चौधरी चरण सिंह पूरे उत्तर भारत के किसानों के एकछत्र नेता थे और उनकी आवाज पूरे देश में सुनी जाती थी। चरण सिंह की अगुआई में हुई किसान राजनीति में देवीलाल, कुंभाराम आर्य, दौलतराम सारण, वीरेंद्र वर्मा, सत्यपाल मलिक, के.सी त्यागी, त्रिलोक त्यागी, चौ.नरेंद्र सिंह, मुलायम सिंह यादव, रशीद मसूद तो कांग्रेस में के.कामराज, यशवंत राव चव्हाण, बंसीलाल, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, बलराम जाखड़, राजेश पायलट, वसंतदादा पाटिल, शरद पवार, रामलखन सिंह यादव, श्यामलाल यादव, बलराम सिंह यादव, रामचंद्र विकल, चौ.यशपाल सिंह जैसे कई नेता थे, जो किसान और ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे।
इसी तरह समाजवादियों में भी अर्जुन सिंह भदौरिया, रामसेवक यादव, महादेव वर्मा, कर्पूरी ठाकुर, जैसे ज्यादातर नेता ग्रामीण और किसान पृष्ठभूमि वाले थे। आजादी के 45-50 वर्षों तक देश की राजनीति में किसानों की आवाज सबसे दमदार मानी जाती थी और हर दल की किसान शाखाएं और किसान नेता विधानसभाओं और संसद में किसानों के हकों की न सिर्फ आवाज उठाते थे, बल्कि किसानों को राहत देने वाली नीतियां भी बनवाते थे।
1980 के दशक में देश में राजनीतिक दलों के किसान नेताओं की पुरानी पीढ़ी लुप्त होने लगी थी और नई पीढ़ी के किसान नेताओं में वह चमक नहीं थी जिसमें देश के किसान अपना अक्स देख सकें। इस दौर में स्वतंत्र जनाधाऱ वाले किसान संगठनों और किसान नेताओं की एक बड़ी जमात समाने आई। उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत, महाराष्ट्र में शरद जोशी, विजय जावंधिया, कर्नाटक में डा. नंजदुम्मा स्वामी, गुजरात में विपिन भाई देसाई, पंजाब में अजमेर सिंह लाखोंवाल, भूपेंद्र सिंह मान, हरियाणा में घासीराम नैन, प्रेम सिंह दहिया, जैसे किसान नेता उभरकर सामने आए जो अपनी आवाज पर 50 हजार से एक लाख किसान जब चाहे तब सड़कों पर उतार सकते थे। टिकैत, जोशी और स्वामी की क्षमता तो इससे भी ज्यादा थी। इनके आंदोलनों को उस समय देश ने कई बार देखा और दिल्ली तक इन्होंने कई बार दस्तक दी।
लेकिन 1991 के बाद देश में शुरू हुए उदारीकरण के दौर ने धीरे-धीरे राजनीतिक दलों के किसान नेताओं को हाशिए पर डालना शुरू किया और फिर स्वतंत्र जनाधार वाले किसान नेता भी थकते और चुकते गए। किसानों के पास न अपना स्वतंत्र नेतृत्व रहा और न ही राजनीतिक दलों में उनकी अपनी कोई लॉबी बची। आज किसानों के मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर कुछ आंदोलन और प्रदर्शन जरूर होते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र तक उनकी मजबूत आवाज पहुंचाने वाला कोई नहीं है। किसान नेताओं की जगह अखबारों में लिखने वाले और टीवी चैनलों पर बहस करने वाले किसान औऱ कृषि विशेषज्ञों ने ले ली है। जिन्हें मुद्दों और विषय की समझ तो खूब है लेकिन जनाधार के नाम पर उनके पीछे पांच सौ किसान भी नहीं हैं। राजनीतिक दलों में किसान शाखाएं हैं, लेकिन उनके नेता अपनी पार्टी लाईन से अलग जाकर न सोच सकते हैं और न बोल सकते हैं।
वैसे भी भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों की किसान शाखाओं की जिम्मेदारी सिर्फ पार्टी की रैलियों में पगड़ी पहने किसानों की भीड़ जुटाने भर की रह गई है। इसलिए जब केंद्र सरकार कृषि सुधारों के नाम पर तीन ऐसे अध्यादेश लाती है, जो किसानों और खेती की पूरी तस्वीर बदल देंगे तब कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है और जब इन अध्यादेशों को संसद से कानून बनवाती है तो विपक्षी राजनीतिक दल संसद और टीवी चैनलों पर तो खूब गरजते हैं, लेकिन पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। वजह साफ है कि अब किसानों की आवाज बनकर सड़क से संसद को हिला देने वाले किसान नेता देश में बचे ही नहीं हैं, जो इन कानूनों के गुण दोषों को किसानों के बीच ले जाकर पक्ष विपक्ष में उनकी राय बनवा सकें।
अधिसंख्य राज्यों के किसान भ्रमित हैं। सरकार अपने प्रचार माध्यमों से इन कानूनों को किसान और खेती की मुक्ति सुनिश्चित करने वाला कदम बता रही है तो विपक्ष इन्हें किसानों और खेती को बर्बाद करने वाला कह रहा है।आम किसान भ्रमित है और इसलिए कहीं वह विरोध में सड़कों पर है तो कहीं खामोश है।