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कुरुक्षेत्रः इतिहास दोहराने की राह पर मुलायम और कांशीराम के वारिस

विनोद अग्निहोत्री, नई दिल्ली Updated Mon, 14 Jan 2019 12:24 PM IST
Kurukshetra
Kurukshetra - फोटो : Amar Ujala Graphics
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर इतिहास अपने को दोहरा रहा है। एक तरफ 2014 में पूर्ण बहुमत के साथ आई भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अपने चुनावी वादों और पांच साल के कामकाज को लेकर चार महीने बाद जनता के बीच जाने वाली है तो दूसरी तरफ करीब 25 सालों बाद सामाजिक न्याय के सियासी एजेंडे की वारिस रहे दो दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एक बार फिर हाथ मिला लिए हैं।
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1993 में जब इन दलों के संस्थापक नेताओं मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने हाथ मिलाया था, तब दोनों ही दल अपने सियासी बचपन के दौर से गुजर रहे थे और एक दशक से संघ परिवार के अयोध्या आंदोलन, लाल कृष्ण आडवाणी की रथयात्राओं, कारसेवकों पर पुलिस की गोली और अंतत छह दिसंबर 1992 के बाबरी विध्वंस से पैदा हुआ हिंदुत्व के ज्वार और सांप्रदायिक उन्माद अपने चरम पर था। बावजूद इसके तब सपा बसपा गठबंधन ने 1993 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को हराकर उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार बनाई थी। अब ढाई दशक बाद इन दोनों नेताओं के वारिसों ने फिर भाजपा की नींद उड़ाने वाला गठबंधन कर लिया है।

सवाल है कि तब और अब में क्या कुछ बदल गया है। 1993 में जब सपा बसपा गठबंधन हुआ तो उसके पहले का परिदृश्य कुछ एसा था कि पूरे उत्तर भारत में मंडल और कमंड़ल की राजनीति उफान पर थी। विश्व हिंदू परिषद के आक्रामक मंदिर आंदोलन और उसे धार देती लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्राओं से माहौल बेहद गर्म था। विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंडल कार्ड ने अगड़ी जातियों को बेहद नाराज कर दिया था और वो भाजपा के पीछे गोलबंद हो रही थीं, तो दूसरी तरफ संघ परिवार के हिंदुत्व के नाम पर पिछड़ी और दलित जातियों को भी मंदिर आंदोलन के जरिए भाजपा से जोडने में जुटा था। 

अपने झगड़ों के बोझ से जनता दल के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार के पतन के साथ ही सामाजिक न्याय की कथित ताकतें बिखर रही थीं और राजीव गांधी की मौत ने केंद्र की सत्ता के बावजूद कांग्रेस को लगभग नेतृत्व विहीन कर दिया था। 1990 में बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बाबरी मस्जिद की हिफाजत के लिए उग्र कारसेवकों पर गोली चलवाकर खुद को हिंदुओं में खलनायक बना लिया था और उसके फौरन बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिराकर चंद्रशेखर के साथ जाने से मुसलमान भी उनसे खुथ नजर नहीं आ रहे थे। इसीका नतीजा था कि 1991 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में चंद्रशेखर और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी जनता पार्टी की बुरी तरह हार हुई थी।
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