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कुरुक्षेत्र: केशव मौर्य हो सकते हैं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तो योगी के सामने आचार्य को उतार सकती है कांग्रेस

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Tue, 25 May 2021 01:38 PM IST
सार

अगले साल पहले होने वाले चार राज्यों और उसके बाद दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में पंजाब को छोड़कर पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात व हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और कोरोना काल की विपत्ति से जूझते माहौल में भाजपा के सामने इन पांचों राज्यों को बचाने की चुनौती है...

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Kurukshetra: before upcoming UP election Deputy CM Keshav Maurya can be the state BJP president, Congress can field acharya pramod krishnam in front of Yogi
केशव प्रसाद मौर्य और आचार्य प्रमोद कृष्णम - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

कोरोना के दूसरे आक्रमण से जूझते देश में अब भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी चिंता उत्तर प्रदेश को लेकर है। रविवार को भाजपा नेतृत्व की शीर्ष स्तर की लंबी बैठक के बाद बनी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में सत्ताकेंद्र को विकेंद्रित करने, संगठन को सरकार के समानांतर शक्ति संपन्न बनाने का फैसला किया गया है। यह जानकारी देने वाले सूत्रों का कहना है कि उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को एक बार फिर प्रदेश संगठन का अध्यक्ष बनाया जा सकता है और गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर अधिकार संपन्न किया जा सकता है। लेकिन इन दोनों मामलों में अंतिम फैसला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य से चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।

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उधर कांग्रेस के भीतर भी प्रदेश में किसी ऐसे चेहरे को आगे करने का दबाव बढ़ता जा रहा है, जो भाजपा के हिंदुत्व के ध्रुवीकरण को रोक सके और राजनीतिक विमर्श (नैरेटिव) बदल सके। इसके लिए पार्टी के कुछ बड़े नेताओं ने पिछले लोकसभा चुनाव में लखनऊ से राजनाथ सिंह के खिलाफ कांग्रेस उम्मीदवार रहे कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम को प्रदेश संगठन या चुनाव प्रचार अभियान की कमान सौंपने का सुझाव पार्टी नेतृत्व को दिया है।

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अगले साल पहले होने वाले चार राज्यों और उसके बाद दो राज्यों के विधानसभा चुनावों में पंजाब को छोड़कर पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और गुजरात व हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं और कोरोना काल की विपत्ति से जूझते माहौल में भाजपा के सामने इन पांचों राज्यों को बचाने की चुनौती है। वहीं भाजपा विरोधी दल इस महामारी से उत्पन्न आपदा को राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश में जुट गए हैं। क्योंकि गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव वर्ष 2022 के आखिर में नवंबर-दिसंबर में होने हैं, इसलिए ज्यादा सरगर्मी अभी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा को लेकर है।

कांग्रेस की कोशिश उत्तराखंड, गोवा में सरकार बनाने और पंजाब में अपनी सरकार दोबारा लाने की है, उत्तर प्रदेश में भी पार्टी यह अवसर देख रही है कि वह अपनी पिछली सात सीटों को कम से कम सत्तर या उससे ज्यादा तक पहुंचा सके तो प्रदेश में भविष्य में उसकी वापसी की उम्मीद बन सके और 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी अपने बलबूते कुछ सीटें जीत सके। वहीं समाजवादी पार्टी भी उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में वापसी की राह देख रही है। सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को लगता है कि भाजपा का मुकाबला सीधा सपा-रालोद गठबंधन से होगा, जिसमें कोरोना से हुई तबाही की नाराजगी का लाभ सपा को ही मिलेगा। क्योंकि बसपा और कांग्रेस, सपा के मुकाबले भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं।

पहले बात भाजपा की। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को पश्चिम बंगाल की हार के बाद उत्तर प्रदेश की सर्वाधिक चिंता है। हाल ही में उत्तर प्रदेश को लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की एक बैठक हुई और इसके बाद नड्डा और शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ देर रात तक बैठक की। बैठक में प्रदेश संगठन में फेरबदल करने और राज्य की नौकरशाही के साथ तालमेल बढ़ाने के लिए विधान परिषद सदस्य अरविंद शर्मा को मंत्रिमंडल में लेकर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने पर भी सहमति बनी। शर्मा ने जिस तरह प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में कोरोना संकट को नियंत्रित किया है, उसे लेकर भी केंद्रीय नेतृत्व उनका उपयोग अब राज्य स्तर पर करना चाहता है।

बताया जाता है कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के कामकाज पर भी चर्चा हुई। माना जा रहा है कि मौजूदा स्थितियों में उनके कामकाज को लेकर केंद्रीय नेतृत्व को लगता है कि जिस तरह पार्टी कार्यकर्ताओं में लगातार असंतोष बढ़ रहा है उसे देखते हुए प्रदेश संगठन में बदलाव की जरूरत है। इसलिए मौजूदा उप-मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्य को फिर से संगठन की कमान देकर पार्टी कार्यकर्ताओं विधायकों सांसदों के असंतोष को खत्म किया जा सकता है।

इसके कुछ दिन पहले पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उत्तर प्रदेश के सांसदों के साथ बातचीत की और उन्हें कोरोना पीड़ितों की मदद करने और लोगों के बीच जाकर कोरोना से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वार उठाए जा रहे कदमों की जानकारी देने का निर्देश दिया। पार्टी सूत्रों ने यह जानकारी देते हुए बताया कि भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि यह वक्त घर बैठने का नहीं लोगों के बीच काम करने का है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब महज आठ महीने का वक्त बचा है और अगर पार्टी को 2024 का लोकसभा चुनाव जीतना है तो पहले उत्तर प्रदेश जीतना सबसे ज्यादा जरूरी है।

बैठक में मौजूद एक सांसद के मुताबिक नड्डा ने सांसदों से प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कामकाज का भी ब्यौरा लिया। बैठक में कुछ सांसदों ने राज्य सरकार में नौकरशाही के हावी होने और विधायकों-सांसदों की सुनवाई न होने की शिकायत भी की। इस पर पार्टी अध्यक्ष ने नसीहत दी कि यह वक्त आपसी मनमुटाव का नहीं मिलजुल कर काम करने का है। उन्होंने कहा कि हमें सेवा भावना से जुटना होगा और कोरोना की वजह से जो मुश्किल हालात बने हैं उसमें अगर हम जनता के बीच सेवा भावना से काम करेंगे तो लोगों की नाराजगी दूर होगी और भाजपा को फिर आम जनता का पहले जैसा समर्थन मिलेगा। भाजपा अध्यक्ष ने सांसदों से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और छवि का फायदा भाजपा को जरूर मिलेगा क्योंकि इनके टक्कर का कोई नेता विपक्ष के पास न देश में है न प्रदेश में।

इधर कांग्रेस में भी खासी हलचल है। पश्चिम बंगाल में सफाए और असम, केरल और पुद्दुचेरी में हार से पार्टी नेतृत्व बेहद असहज है। क्योंकि केरल से खुद राहुल गांधी सासंद हैं और उन्होंने प्रियंका गांधी के साथ केरल, असम और तमिलनाडु चुनावों में खासी मेहनत की थी। अब क्योंकि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव हैं और उनके ऊपर ही राज्य में पार्टी को चुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी है, इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी विशेषरूप से चिंतित हैं। क्योंकि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कुछ बेहतर नहीं कर पाई तो उसका सीधा असर प्रियंका की छवि और लोकप्रियता पर पड़ेगा। राज्य में अब तक हुए विधानसभा उपचुनावों और पंचायत चुनावों के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू मेहनती और संघर्षशील कार्यकर्ता होने के बावजूद पूरे प्रदेश में पार्टी का चेहरा नहीं बन सके हैं। उनकी संगठन पर वैसी पकड़ भी नहीं है जैसी कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री, सलमान खुर्शीद और राजबब्बर की थी।

प्रियंका गांधी को लगातार यह फीडबैक भी मिल रहा है कि अगर पार्टी अजय लल्लू के नेतृत्व में चुनाव में गई तो मौजूदा सात सीटें भी बचेंगी या नहीं यह कहना मुश्किल है, क्योंकि तब मुकाबला सीधा भाजपा बनाम सपा-रालोद गठबंधन के बीच हो जाएगा। इसे लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी तीनों ही चिंतित हैं। इसलिए एक सुझाव जल्दी से जल्दी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने का भी है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने के तीन विकल्प हैं। पहला विकल्प है समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके उसके द्वारा दी जाने वाली बमुश्किल तीस से 40 सीटों पर संतोष कर लेना। दूसरा विकल्प है येन केन प्रकारेण किसी तरह बसपा से गठबंधन करके इतनी या इससे कुछ ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ना। तीसरा विकल्प है जैसी भी ही हालत हो सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ना या जयंत चौधरी के राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन करके सौ सीटें रालोद को देकर खुद तीन सौ पर मैदान में उतरना। अब पहले विकल्प की संभावना इसलिए बेहद कम हो जाती है कि पिछला चुनाव कांग्रेस-सपा ने मिलकर लड़ा था और सपा को 47 व कांग्रेस को सात सीटें ही मिली थीं। क्योंकि दोनों का ही वोट एक-दूसरे को स्थानांतरित नहीं हुआ और अभी भी हो पाएगा इसकी कोई संभावना नहीं है। क्योंकि सपा-कांग्रेस का समान जनाधार मुस्लिम तो एक दूसरे के उम्मीदवार को मिल जाता है, लेकिन सपा का यादव और कांग्रेस का सवर्ण जनाधार एक-दूसरे के उम्मीदवार को न मिलकर अपने दल के उम्मीदवार की गैर-मौजूदगी में भाजपा को चला जाता है और भाजपा को इसका अतिरिक्त लाभ मिल जाता है जिससे उसकी उन सीटों पर जीत सुनिश्चित हो जाती है।

वैसे भी अखिलेश इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए बहुत उत्सुक नहीं हैं। दूसरा विकल्प कांग्रेस बसपा गठबंधन का है। यह प्रयोग 1996 में हो चुका है और तब बसपा ने तीन सौ सीटें लड़कर सिर्फ 67 सीटें और कांग्रेस ने 125 सीटें लड़कर महज 33 सीटें जीती थीं। वैसे भी मायावती घोषणा कर चुकी हैं कि इस बार वह किसी दल के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ेंगी, इसलिए यह संभावना न के बराबर है। तीसरा विकल्प कांग्रेस और रालोद गठबंधन का है, लेकिन रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव मिलकर चौधऱी चरण सिंह की सियासी विरासत को फिर से सहेजने में जुटे हैं और पंचायत चुनावों में दोनों ने मिलकर भाजपा को पछाड़ा है। ऐसे में रालोद कांग्रेस के साथ समझौता करेगा इसकी संभावना फिलहाल न के बराबर है।

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अब कांग्रेस के पास सभी 403 सीटों पर अकेले या कुछ छोटे-छोटे दलों को मिलाकर चुनाव लड़ने का है। लेकिन क्या उसके पास आज के हालात में सभी सीटों पर ऐसे मजबूत उम्मीदवार हैं जो कम से कम चुनावी टक्कर दे सकें। अभी तो हाल यह है कि पार्टी ने 2017 में जो सात सीटें जीती थीं, उनमें से एक रायबरेली की विधायक अदिति सिंह भाजपा के साथ हैं और दो सीटें जिनमें एक रामपुर खास जहां से आराधना मिश्रा यानी मोना जो प्रमोद तिवारी की बेटी हैं, वह विधायक हैं और दूसरी सीट देवरिया से प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू विधायक हैं। चूंकि प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं और पूरा चुनाव अभियान उनके जिम्मे है। लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों, उपचुनावों और पंचायत चुनावों में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी नेतृत्व प्रियंका गांधी को चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाने का जोखिम नहीं उठाएगा और अजय लल्लू अभी तक पूरे प्रदेश का चेहरा नहीं बन सके हैं। तब अगर कांग्रेस बिना किसी नेता को आगे किए लड़ेगी तो कितने वोट और कितनी सीट पाएगी यह कहने में भी संकोच होता है।

लेकिन कोविड काल में राज्य सरकार की विफलता गंगा में तैरती और किनारों पर दफन लाशों, श्मशानों और कब्रिस्तानों पर लंबी कतारें, अस्पतालों में इलाज और ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ते मरीजों और बेड के इंतजार में अस्पतालों के बाहर एंबुलेंसों की लाइनों में तड़पते मरीज और उनके परिजनों की भीड़, दवाई के लिए भटकते लोगों से ही साबित हो चुकी है। कांग्रेस को इसमें अपनी वापसी का अवसर दिख तो रहा है लेकिन संगठन और प्रदेश नेतृत्व की मौजूदा हालत की वजह से उसके कार्यकर्ताओं में मनोबल और विश्वास की कमी है। ऐसे में कांग्रेस को अगर उत्तर प्रदेश में कुछ भी कमाल करके प्रियंका गांधी की साख और राजनीतिक भविष्य बचाना है तो कुछ न कुछ करना होगा। इसके लिए सबसे जरूरी है उत्तर प्रदेश कांग्रेस का चेहरा बदलना और ऐसे नेता को आगे लाना जो न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं और बचे-खुचे जनाधार का मनोबल बढ़ा सके, उनमें जीत का विश्वास पैदा कर सके बल्कि चुनाव का समीकरण, व्याकरण और गणित भी बदल सके। भाजपा के नारों और विमर्श का जवाब देकर अपने पक्ष में नया विमर्श जिसे सियासी भाषा में नैरेटिव कहा जाता है, वो बना सके।

उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण के लिहाज से कांग्रेस के पास सिर्फ कुछ मुस्लिम और कुछ समर्पित पुराने कांग्रेसियों का वोट ही बचा है और जहां कोई मजबूत उम्मीदवार कुछ अतिरिक्त वोट जुटा लेता है वह मुकाबले में आ जाता है। क्योंकि कांग्रेस का मूल जनाधार सर्वण, दलित, मुस्लिम भाजपा-बसपा और सपा में बंट चुका है। अब कांग्रेस की वापसी तभी संभव है जब वह भाजपा से सवर्ण विशेषकर ब्राह्मण, सपा से मुस्लिम और बसपा से दलितों को वापस ले। इसके लिए कांग्रेस पिछले तीस सालों में कई प्रयोग करके देख चुकी है। लेकिन उसका ग्राफ गिरता गया है। जितेंद्र प्रसाद, सलमान खुर्शीद, अरुण सिंह मुन्ना, जगदंबिका पाल, श्रीप्रकाश जायसवाल, निर्मल खत्री और राजबब्बर जैसे दिग्गजों को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के बावजूद पार्टी उत्तर प्रदेश में न तो अपना खोया जनाधार पा सकी और न ही अपनी सीटों की संख्या तीन दर्जन से आगे कर सकी।

अब 2022 विधानसभा चुनावों में एक बार फिर कांग्रेस के लिए देश के सबसे बड़े राज्य में कुछ कर दिखाने का मौका है। बशर्ते कि कांग्रेस अपने पत्ते सही खेले। उत्तर प्रदेश में भाजपा इन दिनों जबर्दस्त भीतरी खींचतान और जातीय संघर्ष से जूझ रही है। चुनावों से पहले केशव प्रसाद मौर्य प्रदेश अध्यक्ष थे और बिना उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाए भी भाजपा ने पिछड़ों को यह संदेश दे दिया था कि सरकार बनने पर मौर्य ही मुख्यमंत्री होंगे, जबकि सवर्णों में दिनेश शर्मा, महेंद्र नाथ पांडे, मनोज सिन्हा जैसे नाम चलाए गए। लेकिन जब पार्टी को 325 सीटों का जबरदस्त बहुमत मिला तो अचानक योगी आदित्यनाथ को कमान दे दी गई। केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा को उप मुख्यमंत्री बनाकर पिछड़ों और ब्राह्रणों को संतुष्ट करने की कोशिश की गई। लेकिन अब चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं भाजपा के भीतर जातीय आधार पर खेमेबंदी तेज होती जा रही है। योगी सरकार पर एक जाति विशेष को विशेष संरक्षण देने के आरोप न सिर्फ विपक्षी दल बल्कि भाजपा के भीतर भी दबी जुबान से लगाए जाते हैं।

भाजपा की इस अंदरूनी खींचतान को कांग्रेस के कुछ नेता पार्टी के लिए अवसर मानते हैं। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के मुताबिक यह सही वक्त है जब किसी ब्राह्मण चेहरे को आगे करके पार्टी राज्य में ब्राह्मणों को अपनी ओर खींच सकती है। कभी कांग्रेस के युवा चेहरों में शुमार रहे इस कांग्रेस नेता का कहना है कि अगर कांग्रेस आक्रामक तरीके से ब्राह्मण कार्ड खेले तो सिर्फ संघ के शाखाधारी ब्राह्मणों को छोडकर ज्यादातर ब्राह्मण अपनी पुरानी पार्टी के साथ आ जाएंगे। क्योंकि उनके परिवारों ने पीढ़ियों से कांग्रेस का ही साथ दिया है और अगर ब्राह्मण कांग्रेस में वापस होते हैं तो मुसलमानों की बड़ी तादाद और अन्य जातियों का भी एक बड़ा हिस्सा वापस कांग्रेस की तरफ लौट सकता है। ऐसा होने पर आज सात सीटों वाली कांग्रेस 2022 में सौ सीटों के आसपास पहुंच सकती है, जो 2024 में लोकसभा की कम से कम 20 से 25 सीटें जीतने की जमीन तैयार कर सकती है जैसा कि 2009 में हुआ था।

अब सवाल है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास ऐसे कौन से चेहरे हैं, जिनमें से किसी एक को आगे करके राज्य के 12 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचने का दांव पार्टी चल सके। पिछली बार प्रशांत किशोर ने शीला दीक्षित को बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करवाया था और इससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में कुछ जान भी आई थी, लेकिन बाद में सर्जिकल स्ट्राइक और सपा के साथ गठबंधन ने सारी रणनीति पर पानी फेर दिया था। इस बार कांग्रेस में ब्राह्मण नेताओं के नाम पर पूर्व मंत्री प्रमोद तिवारी, पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद, पूर्व सांसद राजेश मिश्रा, दिग्गज नेता पं.कमलापति त्रिपाठी के प्रपौत्र ललितेश त्रिपाठी, पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी जैसे कुछ नाम हैं। जबकि एक समय के दिग्गज ब्राह्मण नेता सत्यदेव त्रिपाठी, भूधर नारायण मिश्र, नेकचंद पांडे जैसों को कांग्रेस ने बाहर का रास्ता दिखाया हुआ है।

इनके अलावा एक और चर्चित नाम कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम का है। प्रमोद कृष्णम जो साधु बनने से पहले कांग्रेस में ही थे और युवक कांग्रेस से लेकर कांग्रेस संगठन में कई पदों पर रह चुके हैं, उन गिने चुने साधुओं में हैं जो खुलकर कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार के लिए मीडिया में डटकर बोलते हैं। पार्टी उन्हें दो बार अपनी टिकट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा चुकी है। 2014 में वह संभल से और 2019 में लखनऊ में राजनाथ सिंह के खिलाफ वह चुनाव लड़ चुके हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत कई विधानसभा चुनावों में कांग्रेस उन्हें बतौर स्टार प्रचारक चुनाव प्रचार के लिए भेज चुकी है।

पिछले काफी समय से आचार्य प्रमोद कृष्णम उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर ब्राह्मणों की उपेक्षा उत्पीड़न और उन पर अत्याचार का आरोप लगाते हुए काफी हमले कर रहे हैं। कानपुर के विकास दुबे कांड में विकास और उसके साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को लेकर भी प्रमोद कृष्णम मीडिया में बहुत आक्रामक रहे हैं। ब्राह्मणों के मुद्दे पर कई बार उन्होंने कांग्रेस पार्टी की नीतियों की सीमा भी लांघी है। ब्राह्मणों के मुद्दे पर आचार्य के बाद जितिन प्रसाद भी खासे मुखर रहे हैं। पार्टी द्वारा पश्चिम बंगाल का चुनाव प्रभारी बनाए जाने से पहले उन्होंने पूरे प्रदेश में ब्राह्मणों का एक पूरा नेटवर्क सोशल मीडिया के जरिए बनाकर जहां भी किसी ब्राह्मण की हत्या या कोई और घटना हुई, जितिन प्रसाद ने उसका संज्ञान लेकर पूरी सूची जारी की और राज्य सरकार से पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा और सुरक्षा देने की मांग करके इस मुद्दे को गरम किया।

अब सवाल है कि क्या कांग्रेस इनमें से किसी को उत्तर प्रदेश में चेहरा बनाएगी। प्रमोद तिवारी जिनकी उत्तर प्रदेश में गाजियाबद से गोरखपुर तक पार्टी संगठन पर पकड़ भी है और पहचान भी, कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं में सबसे बड़ा नाम हैं। लेकिन कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक उनकी दिलचस्पी खुद प्रदेश अध्यक्ष या चेहरा न बन कर अपनी बेटी आराधना यानी मोना मिश्रा को आगे करने में है। जबकि राजेश मिश्रा उस वाराणसी से हैं जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद हैं। इसलिए मोदी के मुकाबले उनका व्यक्तित्व कहीं नहीं ठहरता और उनका असर भी पूर्वांचल के वाराणसी के आसपास के जिलों तक ही सीमित है। बड़ी पारिवारिक विरासत के बावजूद यही स्थिति ललितेश त्रिपाठी की भी है।

जबकि जितिन प्रसाद को पार्टी ने पहले प्रदेश अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन तब केंद्र में मंत्री बने रहने और राष्ट्रीय राजनीति में ही बने रहने में उनकी ज्यादा दिलचस्पी थी। हालांकि अब उन्हें अगर प्रदेश संगठन की कमान दी जाती है तो उन्हें बहुत कड़ी मेहनत करनी होगी। इसी तरह बुंदेलखंड के पूर्व विधायक विनोद चतुर्वेदी का प्रभाव भी महज बुंदेलखंड तक ही सीमित है। पूर्वांचल, मध्यप्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी कोई खास पहचान नहीं है।

अब बात आचार्य प्रमोद कृष्णम की। लगातार मीडिया में कांग्रेस और नेहरू गांधी परिवार का बेहद मजबूती और आक्रामक तरीके बचाव करने के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में उनकी खासी लोकप्रियता हो गई है। ब्राह्मणों के मुद्दे पर उनकी अत्याधिक मुखरता और साधुवेश ने उन्हें प्रदेश में कांग्रेस का एक आक्रामक ब्राह्मण नेता बना दिया है। कल्कि पीठाधीश्वर होने के कारण उन्हें आगे करके कांग्रेस चुनावों को हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से बचा सकती है। साथ ही योगी बनाम आचार्य का मुकाबला बेहद दिलचस्प इसलिए भी हो जाएगा कि देश-प्रदेश के साधु समाज में भी खासा विभाजन हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े संत जहां भाजपा और योगी आदित्यनाथ के साथ खड़े दिखाई देंगे तो वहीं इनके दायरे से बाहर के साधु संत आचार्य प्रमोद कृष्णम के साथ आ सकते हैं। 2018 के मध्यप्रदेश चुनाव में आचार्य यह करिश्मा कर चुके हैं, जब कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में हजारों साधुओं ने कांग्रेस के पक्ष में जबलपुर में जुलूस निकालकर अपना समर्थन दिया था। भाजपा के हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस का यह हिंदू कार्ड मुसलमानों को भी इसलिए परेशान नहीं करेगा क्योंकि आचार्य प्रमोद कृष्णम की मुसलमानों में भी अच्छी खासी लोकप्रियता है और देश-प्रदेश के नामी गिरामी मुस्लिम धर्मगुरु उनके साथ आ सकते हैं।

लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की समस्या ये है कि उसे फैसला और वह भी सही फैसला लेने में इतना वक्त लग जाता है कि तब तक उस फैसले का कोई मतलब नहीं रह जाता। इसलिए उत्तर प्रदेश में जहां अब एक-एक दिन अहम है, कांग्रेस अभी इसी उहापोह में है कि वह प्रदेश में अपना नेतृत्व और चेहरा बदले या जैसा चल रहा है वैसा ही चलने दे। और प्रताप सिंह कैरो की कार से कुचलने वाले खरगोश की चर्चित कहानी कि खरगोश इसलिए मरा कि वह तय नहीं कर सका कि उसे आगे जाना है या पीछे जाना है। कांग्रेस पिछले लंबे समय से इसी दौर से गुजर रही है।

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