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कारसेवकों पर फायरिंग से सरकार की बर्खास्तगी तक, राम मंदिर विवाद की पूरी कहानी

Thu, 23 Mar 2017 11:53 AM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल Updated Thu, 23 Mar 2017 11:53 AM IST
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Know about Ram temple issue in Ayodhya, When what happened
- फोटो : babri mosque

अयोध्या के राम मंदिर विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने बेहद गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि यह धर्म और आस्‍था का विषय है और इस मुद्दे को दोनों पक्षों को आपस में मिल बैठकर ही सुलझा लेना चाहिए। सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस की पीठ ने ये भी कहा कि अगर ऐसा संभव ना हो तो जज भी इस मामले में मध्यस्‍थता करने को तैयार हैं।

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ऐसे में फिर सवाल खड़ा हो गया है कि क्या केवल बातचीत से देश के इस सबसे संवेदनशील मुद्दे का हल निकाला जा सकता है। आखिर यही तो वह मुद्दा है जिसने देश में हिंदू और मुस्लिमों को दो अलग अलग पालों में खड़ा करने का काम किया।
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राम मंदिर मुद्दे ने ही देश में भाजपा जैसे भगवा दल को स्‍थापित करने में मदद की तो मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी भी इस मुद्दे के बाद लंबे समय तक मुसलमानों की चहेती बनी रही। राम मंदिर के मुद्दे ने सामाजिक के साथ साथ राजनीतिक विभाजन की रूपरेखा भी खींची। आइए डालते हैं इस संवेदनशील मुद्दे पर एक निगाह कहां से शुरू हुआ इसका विवाद कहां तक पहुंचा। 

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बाबर काल से माना जाता है झगड़ा

Know about Ram temple issue in Ayodhya, When what happened

1853: बाबरी मस्जिद को लेकर पहला विवाद इसी साल हुआ, जब कुछ हिंदुओं ने आरोप लगाया कि हिंदू मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया गया था। बताया जाता है कि इसी साल इस मुद्दे को लेकर हिंदू मुस्लिमों में झगड़ा भी हुआ और लोगों ने क्षेत्र में पहला दंगा देखा।   
1885: इस साल यह मामला पहली बार अदालत में पहुंचा और महंत रघुबर दास ने यहां मंदिर निर्माण के लिए अदालत में याचिका दायर की।
1949: आजादी के बाद हिंदूओं ने यहां भगवान राम की मूर्ति रखकर पूजा पाठ शुरू किया। इसी के साथ ही विवाद चरम पर पहुंच गया।
1950: महंत रामचंद्र दास ने बाबरी मस्जिद की जगह राममूर्ति रखने के लिए कोर्ट में मुकदमा दायर किया। इसी साल पहली बार कोर्ट में मस्जिद को 'ढांचा' कहा गया।
1959: नागा साधुओं ने भी इस मुद्दे पर मोर्चा खोला और विवादित स्‍थल पर मंदिर निर्माण की मांग की। अखाड़ा परिषद इस मुद्दे पर कोर्ट पहुंची।
1961: इस मुद्दे पर पहली बार सुन्नी वक्फ बोर्ड भी सामने आया और बाबरी मस्जिद पर अपना हक जताते हुए कोर्ट में विवाद दायर किया। 
1986: को फैजाबाद के जिला जज ने विवादित स्‍थल पर हिंदूओं को ताले खुलवाकर पूजा की इजाजत दी, इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी का गठन किया गया। 
1989: इस मुद्दे पर भाजपा और वीएचपी खुलकर सामने आ गई। दोनों ने इसके लिए आंदोलन की घोषणा कर दी। भाजपा ने तो इसे चुनावी मुद्दा बना लिया और पार्टी नेता लालकृष्‍ण आडवाणी ने इसके समर्थन में देशभर में रथयात्रा निकालने की घोषणा की। 
1990: भाजपा अध्यक्ष आडवाणी ने मंदिर के समर्थन में सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथ यात्रा की शुरूआत की। 
1990: आडवाणी की रथयात्रा बिहार पहुंची तो तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने समस्तीपुर में उसे रुकवाकर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इसके
बाद भाजपा समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा। भाजपा ने इसके विरोध में केंद्र में वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापिस लिया। 

जब मुलायम ने कार सेवकों पर चलवाई गोली

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30 अक्टूबर 1990: मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने आक्रोशित कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें 16 लोगों की जान चली गई। इस घटना के बाद मुलायम सिंह की सरकार चली गई। 
1991: इस साल चुनाव आए तो यूपी में पहली बार कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी।
1991: उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार ने विवादित ढांचे के आसपास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने कब्जे में ले लिया। जिसका मुस्लिमों ने जबरदस्त विरोध किया। 
1992: भाजपा नेताओं ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की घोषणा कर दी। बताया जाता है इसके लिए विवादित ढांचे को ढहाने की प्लानिंग बनी। भाजपा नेता विनय कटियार के घर पर यह योजना तैयार हुई। 6 दिसंबर 1992: इसी दिन राम मंदिर विवाद की चिंगारी शोला बन गई। हजारों की संख्या में अयोध्या पहुंचे कार सेवकों ने विहिप और भाजपा नेताओं के नेतृत्व में विवादित ढांचे को ढहा दिया। इस मामले की जांच के लिए केंद्र सरकार ने लिब्रहान आयोग का गठन किया। 
1992: विवादित ढांचे के ध्वंस के बाद केंद्र सरकार ने विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यूपी की कल्याण सिंह सहित कई भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया। 
2002: आयोध्या का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट पहुंचा और लखनऊ बेंच में तीन जजों की पीठ ने इसकी सुनवाई शुरू हुई। 
2009: लिब्राहन आयोग ने 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
2010: सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाइकोर्ट को इस मुद्दे पर फैसला देने से रोकने वाली याचिका को खारिज किया। जिसके बाद इस पर फैसले का मार्ग प्रशस्त हुआ।
2010: हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एतिहासिक फैसला सुनाया, कोर्ट ने जमीन के तीन हिस्से मानते हुए एक हिस्सा राम मंदिर को, दूसरा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड को बांटने का फैसला सुनाया। 
2011: मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।

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