लाहौर की महारानी और बेटे दिलीप का बेमिसाल प्रेम, भावुक कर देगा
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सिख साम्राज्य के महाराजा रणजीत सिंह की खूबसूरत पत्नी महारानी जिन्द कौर को 'विद्रोही रानी,' 'द मिसालिना ऑफ पंजाब' और 'द क्वीन मदर' जैसे नामों से याद किया जाता है। 'उन्हें रानी जिन्दां' भी कहा जाता है। वह सिखों के शासनकाल में पंजाब के लाहौर की अंतिम रानी थीं। कुत्तों के रखवाले की बेटी से उत्तर भारत की सबसे शक्तिशाली महारानी बनने वाली जिन्द कौर की कहानी भारतीय लोक कथाओं का हिस्सा रही है।
इतिहासकारों ने जिन्द कौर को 'साहसी महिला' करार दिया है जो 1846 में सिखों और अंग्रेजों के बीच पहली लड़ाई में सिखों की हार के बाद ब्रिटिश कैद से एक नौकरानी का वेश धरकर फरार हो गई थीं।
जिन्द कौर ने भागने के बाद संभवत नेपाल में शरण ली जो उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन नहीं था।
हालांकि वह अपने नौ वर्षीय बेटे दिलीप सिंह को साथ नहीं ले जा पाई थीं, जो अंग्रेजों के हाथ आ गए। नौ साल की उम्र में दिलीप सिंह को क्वीन विक्टोरिया के पास रहने के लिए भेज दिया गया थ, जहां वे ईसाई हो गए और 'ब्लैक प्रिंस' के नाम से मशहूर हुए। प्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता माइकल सिंह ने महारानी जिन्दां पर 'विद्रोही रानी' नाम से फिल्म बनाई है। उनका कहना है कि जिन्द कौर ने अपने बेटे की सुरक्षा के लिए जो कुछ संभव था वह किया।
सिंहासन पाने के लिए एक शेरनी की तरह लड़ीं
माइकल सिंह बताते हैं, "महाराजा रंजीत सिंह की मौत के बाद भड़की खूनी घटनाओं के बीच सिंहासन के वारिस दिलीप सिंह वहां से बच निकलने में कामयाब हुए तो उसमें महारानी जिन्दां की अहम भूमिका थी।" "महारानी जिन्दां ने अपने पुत्र दिलीप सिंह को न केवल जीवित रखने बल्कि पंजाब के सिंहासन प्राप्त करने के लिए एक शेरनी की तरह लड़ीं।"
प्यार भरे पत्र
ब्रिटिश लाइब्रेरी में महारानी जिन्दां और दिलीप सिंह के बीच लिखे गए दो पत्र हैं जो दिल को छू लेते हैं। पहला पत्र महाराजा दिलीप सिंह ने लिखा है जिसमें वे अपनी माता जिन्द कौर को 'बीबीजी' कहकर संबोधित करते हैं।
पहला पत्र
"बीबीजी,
मैंने आज अटॉर्नी की वो कॉपी देखी है, जो आपने राज्यपाल मोहन टैगोर को दी थी और मुझे लगता है कि गंगा के किनारे आपके आवास के लिए अनुमति प्राप्त करने के योग्य हो जाऊँगा।
मैं आपसे मिलने और भारत आने के लिए लंबे अरसे से व्याकुल हूं, लेकिन अस्थिरता के चलते ऐसा नहीं हो सका। इसलिए मैंने भारत आने के लिए परमिट प्राप्त करने को आगामी सर्दियों तक टाल दिया है। मुझे उम्मीद है कि आप भी इंग्लैंड और भारत के बीच तनाव को देखते हुए इंग्लैंड आने का विचार छोड़ देंगी। मैं उम्मीद करता हूं कि आप ठीक होंगी और आपकी आंख की वो मुश्किल परेशान नहीं कर रही होगी जो मेरे लाहौर रहते हुए थी। '
भरोसा रखें।
मेरी प्यारी मां
आपका सबसे प्यारा बेटा
दिलीप सिंह।
महारानी जिन्दां के पत्र में भावनाओं के सैलाब जैसा है
दिलीप सिंह ने यह पत्र 22 साल की उम्र में अपनी माँ को लिखा था जब रानी जिन्दां 43 साल की थीं। 11 साल से दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं स्थापित हो पाया था। प्रिया अटवाल ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में महारानी जिन्दां पर पीएचडी कर रही हैं। उनका कहना है कि दिलीप सिंह के पत्र में चिंता जाहिर होती है जबकि महारानी जिन्दां के पत्र में भावनाओं के सैलाब जैसा है।
हालांकि अटवाल का मानना है कि जो पत्र मां-बेटे ने एक-दूसरे को लिखे थे, मूल रूप में वो पत्र ये नहीं हैं। उनके दावे के मुताबिक ये उनकी नकल कॉपी हैं जिन्हें ब्रिटिश निगरानी दल ने सरकार के रिकॉर्ड में जमा कराए होंगे। दरअसल, ब्रिटिश सरकार माँ-बेटे के बीच संबंधों पर नजर रखती थी क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि जिन्द कौर दिलीप सिंह की राजनीतिक सोच समझ को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
महाराजा दिलीप सिंह पर काफी गहरी जानकारी और समझ रखने वाले पीटर बैंस का कहना है, "महारानी जिन्दां अपने बेटे दिलीप सिंह से अलग होने की वजह से बहुत उदास थीं और वह किसी भी कीमत पर अपने बेटे के साथ रहना चाहती थीं। वह ब्रिटिश सरकार को लिखे जाने वाले पत्र में कहती हैं कि दिलीप सिंह को उनसे अलग कर दिया जिन्हें उन्होंने नौ महीने अपनी कोख में रखा था।" जिन्द कौर ने नेपाल में 11 साल तक निर्वासित जीवन बिताया और इस दौरान उनका अपने बेटे के साथ कोई संपर्क नहीं था।
ऐसे में बेटे की ओर से अचानक मिलने वाले पत्र पर अपनी भावनाओं को संभाल पाना उनके लिए वास्तव में कठिन रहा होगा, लेकिन जिन्द कौर ने ये काम बखूबी कर लिया। कभी 'विद्रोही रानी' कहलाने वाली जिन्द कौर अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी थीं, उनका स्वास्थ्य खराब रह रहा था। अपने इकलौते बेटे की एक झलक देखने की इच्छा मन में लिए उन्होंने अपने इ बेटे को 'दूल्हा जी' कहकर पुकारा है।
'मां दी सूरत, रब दी मूरत
दूसरा पत्र
"दूल्हा जी,
चार अक्टूबर 1859 को अंग्रेजी में लिखा और गुरमुखी में हस्ताक्षरित तुम्हारा पत्र मुझे 19 जनवरी 1860 को नेपाल के एक मंत्री की मध्यस्थता से मिला। पत्र को सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई। एक मरा व्यक्ति, जीवन का अंकुरण हासिल कर नया जीवन प्राप्त करके प्रसन्न हो जाता है। मैं तुम्हारा पत्र पाकर बहुत प्रसन्न हूँ।
दूल्हा जी , मैं तुम्हारे पत्र का जवाब लिख रही हूँ। दो-तीन सौ विधवाएं (मेरी तरह) ही तुम्हें देखने के लिए व्याकुल-चिंतित हैं। मैं तुम्हारे लिए रात-दिन रोती रही हूँ, लेकिन अब तुम्हारा पत्र पाकर मेरा दिल गुलाब की तरह खिल उठा है। तुमने मेरी आँखों की तकलीफ के बारे में पूछा है तो मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ कि तुम्हारा पत्र देखने के बाद वह पूरी तरह से ठीक हो गई हैं।
अभी मैं नेपाल के काठमांडू में रह रही हूँ और यहां के दरबार में मेरा बड़ा सम्मान है। मेरा इरादा अब तुम्हारा चेहरा देखने का है और उसके बाद ब्रिटिश सरकार की अनुमति से गंगा के किनारे किसी पवित्र स्थान पर जाना है जहां आराम से रह सकूं और भगवान से प्रार्थना करती रहूं कि मेरे जीवन का अंत हो जाए। लेकिन इस पर तमु जो भी सुझाव दोगे उस पर अमल करने के लिए तैयार हूँ।
भरोसा रखो
मेरे प्यारे बेटे
तुम्हारी प्यारी माँ
महारानी जिन्दां हस्ताक्षरित
माँ और बेटे ने बहुत कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया, लेकिन उनका संबंध अटूट रहा। जिन्द कौर और दिलीप सिंह की मुलाकात 1861 में हुई और इसके बाद जिन्द कौर ने दो साल अपने बेटे के साथ ब्रिटेन में बिताए। अमेरिका के कॉल्बी कॉलेज प्रोफेसर निकी गुनिंदर कौर सिंह का कहना है,"महाराजा दिलीप सिंह और महारानी जिन्दां के बीच महीनों तक चले और महाद्वीप के पार तक हुए पत्राचार वास्तव में अमूल्य संपत्ति हैं।" उनका कहना है कि बेटे के पत्र ने मां के जीवन को सुख से परिपूर्ण कर दिया था।
निकी गुनिंदर सिंह कौर के मुताबिक 19वीं सदी में हुए ये पत्राचार जीवन में खुशी भर देते हैं और जब हम 14 मई, 2017 को मदर डे मना रहे हैं तो ये हमारे रिश्तों भी नया आयाम भरेंगे। इस मौके पर पंजाबी भाषा की यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है, 'मां दी सूरत, रब दी मूरत।'