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नजर नहीं आ रहा समाधान, बात जारी रखने को किसान करेंगे बात
Mon, 04 Jan 2021 09:25 PM IST
सुरेंद्र जोशी
अमित शर्मा, नई दिल्ली
अमित शर्मा, नई दिल्ली
Published by: सुरेंद्र जोशी
Updated Mon, 04 Jan 2021 09:25 PM IST
सार
सारः-
- बार-बार की मिल रही तारीख से निराश हैं किसान नेता
- अगले दौर की वार्ता में हल निकलने के प्रति अभी से आशंका
- कानून वापसी से कम किसी विकल्प पर विचार नहीं करेंगे किसान
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बरसते पानी में सोमवार को सिंघु बॉर्डर पर किसानों ने इस तरह किया प्रदर्शन
- फोटो : pti
विस्तार
किसान आंदोलन को 4 जनवरी को 40 दिन हो गए। लाखों किसान दिल्ली से लेकर पंजाब-हरियाणा बॉर्डर तक सरकारी हनक की तपिश और बारिश की गलन लगातार महसूस कर रहे हैं, लेकिन 40 किसान संगठनों और दो केंद्रीय मंत्रियों के बीच सातवें दौर की वार्ता में आज भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
दोनों पक्ष अपने रुख पर बरकरार
अब तक हो चुकी 40 से ज्यादा किसानों की शहादत पर शोक प्रकट करने के बाद शुरू हुई वार्ता में दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर बरकरार रहे। अंततः किसान नेता एक बार फिर एक और तारीख लेकर वापस दिल्ली बॉर्डर पर अपने टेंट्स में लौट आए। दोनों पक्ष अब आठवें दौर की बैठक के लिए 8 जनवरी को मिलेंगे।
निराश होकर बोले, ठोस हल की उम्मीद कम
बार-बार की वार्ता के बाद भी कुछ 'ठोस' न निकलने से निराश देख एक किसान नेता ने कहा कि आज के रुख को देखकर अगले दौर की वार्ता में भी कुछ ठोस निकलने की उम्मीद हम नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन केंद्र से उनकी बातचीत जरूर जारी रहेगी क्योंकि बातचीत जारी रखने के अलावा उन दोनों के ही पास कोई विकल्प नहीं है। यानी बात करने के लिए अगले दौर में भी बातचीत जारी रहेगी।
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मंत्रियों ने लिया आठ जनवरी तक समय
महाराष्ट्र-गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले संगठन लोक संघर्ष मोर्चा की नेता प्रतिभा शिंदे ने 'अमर उजाला' को बताया कि वार्ता के पहले भाग में केंद्रीय मंत्रियों ने एक बार फिर कानून के 'क्लाज बाई क्लाज' चर्चा का प्रस्ताव रखा जिसे वे पहले दौर की वार्ता से रखते चले आ रहे हैं, लेकिन हम इसे पहले ही अस्वीकार कर चुके हैं और इस बार भी इसे अस्वीकार कर दिया गया। हमने तीनों कानूनों के वापसी की प्रक्रिया या 'म़ॉडैलिटीज' पर चर्चा करने की बात कही। मंत्रियों ने इसमें स्वयं को असक्षम बताते हुए अपने वरिष्ठों से अधिक वार्ता की जरूरत बताई। इसके लिए उन्होंने आठ जनवरी तक का समय लिया।
समर्थन मूल्य पर ही हो खरीदी, कोई भी खरीदे
मंत्रियों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर वर्तमान नीतियों को जारी रखने की बात कही, लेकिन किसान इसे लिखित कानूनी अधिकार बनाए जाने की बात कह रहे हैं। किसान नेता ने कहा कि इस बारे में कुछ लोगों को गलतफहमियां हैं, इसे दूर कर लिया जाना चाहिए। किसान यह नहीं कह रहे हैं कि उनकी पूरी खरीद सरकार ही करे। किसान केवल यह चाहते हैं कि फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही हो, चाहे इसे सरकारी मशीनरी करे या प्राइवेट सेक्टर।
क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू होने पर कम क्ववालिटी की फसलों की खरीद भी हो सकेगी? प्राइवेट सेक्टर कम गुणवत्ता वाली फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का भुगतान क्यों करेगा। इस सवाल पर किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने कहा कि इस समय भी एपीएमसी मंडियों में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बहुत कम ही फसलें बिकती हैं।
फसलों की गुणवत्ता का सवााल उठाकर इस समय भी उसे कम भुगतान किया जाता है। अगर सरकार एमएसपी पर कोई कानून बनाती है तो फसलों की गुणवत्ता के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की कई श्रेणियां तय की जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए एक कमेटी का गठन होना चाहिए जिसमें सरकार और किसान दोनों के प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए। सरकार इसके लिए अब तक तैयार नहींं हुई है।
अब दोनों पक्ष आठ जनवरी शुक्रवार को एक बार फिर बातचीत के लिए विज्ञान भवन में आमने-सामने होंगे।
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दोनों पक्ष अपने रुख पर बरकरार
अब तक हो चुकी 40 से ज्यादा किसानों की शहादत पर शोक प्रकट करने के बाद शुरू हुई वार्ता में दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर बरकरार रहे। अंततः किसान नेता एक बार फिर एक और तारीख लेकर वापस दिल्ली बॉर्डर पर अपने टेंट्स में लौट आए। दोनों पक्ष अब आठवें दौर की बैठक के लिए 8 जनवरी को मिलेंगे।
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निराश होकर बोले, ठोस हल की उम्मीद कम
बार-बार की वार्ता के बाद भी कुछ 'ठोस' न निकलने से निराश देख एक किसान नेता ने कहा कि आज के रुख को देखकर अगले दौर की वार्ता में भी कुछ ठोस निकलने की उम्मीद हम नहीं कर पा रहे हैं। लेकिन केंद्र से उनकी बातचीत जरूर जारी रहेगी क्योंकि बातचीत जारी रखने के अलावा उन दोनों के ही पास कोई विकल्प नहीं है। यानी बात करने के लिए अगले दौर में भी बातचीत जारी रहेगी।
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मंत्रियों ने लिया आठ जनवरी तक समय
महाराष्ट्र-गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले संगठन लोक संघर्ष मोर्चा की नेता प्रतिभा शिंदे ने 'अमर उजाला' को बताया कि वार्ता के पहले भाग में केंद्रीय मंत्रियों ने एक बार फिर कानून के 'क्लाज बाई क्लाज' चर्चा का प्रस्ताव रखा जिसे वे पहले दौर की वार्ता से रखते चले आ रहे हैं, लेकिन हम इसे पहले ही अस्वीकार कर चुके हैं और इस बार भी इसे अस्वीकार कर दिया गया। हमने तीनों कानूनों के वापसी की प्रक्रिया या 'म़ॉडैलिटीज' पर चर्चा करने की बात कही। मंत्रियों ने इसमें स्वयं को असक्षम बताते हुए अपने वरिष्ठों से अधिक वार्ता की जरूरत बताई। इसके लिए उन्होंने आठ जनवरी तक का समय लिया।
समर्थन मूल्य पर ही हो खरीदी, कोई भी खरीदे
मंत्रियों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर वर्तमान नीतियों को जारी रखने की बात कही, लेकिन किसान इसे लिखित कानूनी अधिकार बनाए जाने की बात कह रहे हैं। किसान नेता ने कहा कि इस बारे में कुछ लोगों को गलतफहमियां हैं, इसे दूर कर लिया जाना चाहिए। किसान यह नहीं कह रहे हैं कि उनकी पूरी खरीद सरकार ही करे। किसान केवल यह चाहते हैं कि फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही हो, चाहे इसे सरकारी मशीनरी करे या प्राइवेट सेक्टर।
क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू होने पर कम क्ववालिटी की फसलों की खरीद भी हो सकेगी? प्राइवेट सेक्टर कम गुणवत्ता वाली फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का भुगतान क्यों करेगा। इस सवाल पर किसान नेता प्रतिभा शिंदे ने कहा कि इस समय भी एपीएमसी मंडियों में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बहुत कम ही फसलें बिकती हैं।
फसलों की गुणवत्ता का सवााल उठाकर इस समय भी उसे कम भुगतान किया जाता है। अगर सरकार एमएसपी पर कोई कानून बनाती है तो फसलों की गुणवत्ता के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की कई श्रेणियां तय की जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए एक कमेटी का गठन होना चाहिए जिसमें सरकार और किसान दोनों के प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए। सरकार इसके लिए अब तक तैयार नहींं हुई है।
अब दोनों पक्ष आठ जनवरी शुक्रवार को एक बार फिर बातचीत के लिए विज्ञान भवन में आमने-सामने होंगे।