Khabron Ke Khiladi: हाथरस हादसे में क्यों नहीं आया बाबा सूरजपाल का नाम, इतनी बड़ी त्रासदी का जिम्मेदार कौन?
हाथरस में सत्संग के दौरान मची भगदड़ में 121 लोगों की मौत के बाद पुलिस ने इस मामले में हुई गिरफ्तारियों को लेकर अहम जानकारी दी है। इस बीच अमर उजाला के खास कार्यक्रम 'खबरों के खिलाड़ी' के इस अंक इसी मामले को लेकर चर्चा हुई।
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उत्तर प्रदेश के हाथरस में सत्संग के दौरान मची भगदड़ में 100 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। आखिर इतने बड़े हादसे का जिम्मेदार कौन है? क्या सिर्फ कानून व्यवस्था की खामी इसकी जिम्मेदार है? बाबा सूरजपाल का नाम एफआईआर में क्यों नहीं आया? इतने बड़े आयोजन की व्यवस्था क्या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं थी? इन सभी सवालों पर इस हफ्ते के खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, समीर चौगांवकार, सुनील शुक्ल, अवधेश कुमार और पूर्णिमा त्रिपाठी मौजूद रहे।
समीर चौगांवकर: मुझे लगता है कि सूरजपाल इस हादसे के जिम्मेदार हैं। लेकिन प्रशासन यह मानने के लिए तैयार नहीं है। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, वो भी सूरजपाल का नाम सीधे तौर पर नहीं ले रहे हैं। केवल मायवाती एक अपवाद हैं, जिन्होंने कहा है कि सूजरपाल की गिरफ्तारी हो। हमारे देश में नेताओं और बाबाओं के बीच के गठजोड़ का यह भी एक उदाहरण है। इस तरह के मामलों में जांच गंभीरता से होनी चाहिए। प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वो इस तरह के आयोजन को व्यवस्थित तरीके से सम्पन्न कराए।
सुनील शुक्ल: अगर प्रशासन के पास 80 हजार लोगों की अनुमति ली गई थी तो 80 हजार लोग आ रहे हैं या उससे ज्यादा इसकी जिम्मेदारी किसकी थी? अगर आप इस तरह के धर्म उपदेशकों खिलाफ कार्रवाई नहीं करेंगे तो इस तरह की चीजें बढ़ेंगी। सवाल यह है कि इतनी भीड़ इकट्ठा होने पर क्या व्यवस्थाएं थीं। राजनीतिक दलों को केवल अपने वोट की चिंता है। समाज की चिंता किसी को नहीं है। अगर सरकार जिम्मेदारी लेगी तो ही अंधविश्वास पनपने से रोका जा सकता है।
अवधेश कुमार: इतने बड़े आयोजन में पर्याप्त एंबुलेंस नहीं होना, दमकल नहीं होना आश्चर्य का विषय है। हाथरस में हुई मौतें प्रशासन की नाकामी है। अगर 80 हजार लोगों की ही अनुमति ली गई थी, क्या उसके मुताबिक भी व्यवस्थाएं की गई थीं। यह भी देखना होगा। हमारे संविधान में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की बात है, लेकिन किसी ने भी इस दिशा में काम नहीं किया। यह घटना पूरी तरह से प्रशासनिक नाकामी की वजह से हुई है। इस हादसे के बाद हमें यह तय करना होगा कि जो आयोजक हैं, उन्हें आयोजन को संभालने के लिए सरकारों को ट्रेनिंग देनी होगी।
पूर्णिमा त्रिपाठी: हमें यह सोचकर अफसोस करना चाहिए कि देश में आज भी लोग खुद को इतना पीड़ित, लाचार महसूस करते हैं कि इस तरह के बाबाओं पर निर्भर हैं। योगी जी कि छवि है सख्त संदेश देने की, इस हादसे के बाद बाबा के खिलाफ कार्रवाई करके यह संदेश दिया जा सकता था। बाबा के खिलाफ अगर एक वक्तव्य भी आ जाता तो भी संदेश जाता। धर्म को अलग करके आपको लोगों के साथ खड़े हुए दिखना होगा।
रामकृपाल सिंह: मुझे तकलीफ इस बात की है कि जब करीब 124-125 लोगों की जान चली गई है, तब हम इस तरह के बाबाओं की बात कर रहे हैं। यह अपराधियों का संयुक्त परिवार है। अगर कोई पुल गिरता तो तुरंत कहा जाता कि प्रधानमंत्री इस्तीफा दें, मुख्यमंत्री इस्तीफा दें, डीएम इस्तीफा दें। बाबा के मामले में एक नेता ने नहीं कहा कि बाबा इसके जिम्मेदार हैं। यह राजनेताओं, ब्यूरोक्रेसी और बाबाओं का एक बहुत बड़ा नेक्सस है। पूरी दुनिया में धर्म जहां भी है, सब धर्मों का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है। हर धर्म में यही स्थिति है।
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