फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   khabron ke khiladi opposition unity strategy fight BJP political analysis in loksabha and karnataka election

खबरों के खिलाड़ीः नीतीश या राहुल? विपक्षी एकता के लड्डू के लिए कौन बनेगा चाशनी? जानिए विश्लेषकों की राय

Sat, 15 Apr 2023 08:06 AM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 15 Apr 2023 08:06 AM IST
सार

Khabron Ke Khiladi Episode 8: नीतीश कुमार और राहुल गांधी की दिल्ली में हुई मुलाकात और विपक्षी एकता को लेकर बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन क्या 2024 में ये विपक्षी एकता परवान चढ़ पाएगी? कर्नाटक के नतीजों पर भी विपक्षी एकता का काफी दारोमदार होगा। आइए खबरों के खिलाड़ी की इस नई कड़ी में ऐसे ही अहम सवालों के संभावित जवाब जानने की कोशिश करते हैं।

विज्ञापन
khabron ke khiladi opposition unity strategy fight BJP political analysis in loksabha and karnataka election
खबरों के खिलाड़ी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमर उजाला की खास पेशकश खबरों के खिलाड़ी की आठवीं कड़ी में एक बार फिर हम आपके सामने प्रस्तुत हैं। इस शो को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बेहद पसंद किया जा रहा है, उसके लिए सभी पाठकों का बहुत आभार। इस साप्ताहिक कार्यक्रम में हम हफ्ते की बड़ी खबरों और राजनीतिक घटनाक्रम का सधा हुआ विश्लेषण करते हैं। यह दिलचस्प चुनावी चर्चा अमर उजाला के यूट्यूब चैनल पर लाइव हो चुकी है, इसे रविवार सुबह नौ बजे भी देखा जा सकता है।  

विज्ञापन


इस हफ्ते नीतीश कुमार की राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे से हुई मुलाकात को ऐतिहासिक बताया जा रहा है और विपक्षी एकता को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। साथ ही कर्नाटक में टिकटों को लेकर काफी सिर फुटौव्वल देखने को मिल रही है। वहीं, कांग्रेस का कर्नाटक में पलड़ा भारी बताया जा रहा है। ऐसे ही अहम मुद्दों पर चर्चा के लिए इस बार हमारे साथ अशोक वानखेड़े, सुमित अवस्थी, अवधेश कुमार और प्रेम कुमार जैसे वरिष्ठ विश्लेषक मौजूद थे। यहां पढ़िए चर्चा के कुछ अहम अंश....

विज्ञापन

सुमित अवस्थी
'नीतीश कुमार, राहुल गांधी की मुलाकात की राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा है। इसके बाद विपक्षी एकता को लेकर बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ शरद पवार का यह कहना विपक्षी एकता पर सवालिया निशान भी लगा रहा है कि अदाणी मामले पर जेपीसी की मांग जायज नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सब एक मंच पर आ पाएंगे? क्या नीतीश कुमार वो चेहरा हो सकते हैं, जिसके पीछे सभी विपक्षी नेता खड़े हो सकें? सवाल यह भी है कि जिस पार्टी का बिहार में वजूद हिल रहा है, उसका नेता विपक्षी एकता की कोशिशों में जुटा है, लेकिन इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस को संभालनी चाहिए क्योंकि कांग्रेस की स्वीकार्यता ज्यादा है।'

'कांग्रेस को अहमद पटेल का जाना बहुत खल रहा होगा क्योंकि विभिन्न दलों को साधने में अहमद पटेल का कोई सानी नहीं था। अहमद पटेल के जाने के बाद कांग्रेस के लिए गुलाम नबी आजाद ऐसे वक्त में अहम साबित हो सकते थे, क्योंकि उनकी भी विभिन्न दलों में स्वीकार्यता है। ऐसे में अब कांग्रेस को गुलाम नबी आजाद की कमी यकीनन खल रही होगी। कर्नाटक की बात करें तो वहां यह सवाल उठ रहा है कि क्या कर्नाटक में पार्टी की बगावत भाजपा को नुकसान पहुंचाएगी? हालांकि कांग्रेस में भी डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच सब सही नहीं है। राहुल गांधी संसद सदस्यता जाने के बाद वायनाड का दौरा करके आए हैं, लेकिन कर्नाटक नहीं गए हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी राहुल गांधी चुनाव प्रचार नहीं करने गए थे। इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।' 
 

अशोक वानखेड़े
'आज का समय परसेप्शन का समय है, भारत में जब चीते आते हैं तो वो भी ऐतिहासिक पल हो जाता है। ऐसे में भले कहा जा रहा है कि राहुल गांधी और नीतीश कुमार की मुलाकात कितनी ऐतिहासिक रही, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन इसकी अहमियत जरूर है। विपक्षी एकता के इतर जाकर शरद पवार के बयान की चर्चा है, लेकिन पवार की हमेशा से उद्योगपतियों के साथ अच्छी दोस्ती रही है। वे बात किसानों की करते हैं, लेकिन काम उद्योगपतियों के करते हैं। इसलिए अदाणी मामले पर शरद पवार का बयान हैरान करने वाला नहीं है। शरद पवार ने यह भी कहा कि अगर विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ता है तो वो भी उसका समर्थन करेंगे। इसका मतलब है कि वे उद्योगपतियों से अपने रिश्तों और अपनी राजनीति का संतुलन बनाकर चलने की कोशिश कर रहे हैं।' 

'अहमद पटेल के जाने के बाद कांग्रेस में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो विभिन्न दलों के साथ संतुलन बना सके। ऐसे में अगर नीतीश कुमार संवाद की कोशिश कर रहे हैं, उससे जनता में एक संदेश तो जाएगा ही। नीतीश की पार्टी जदयू बिहार के अलावा किसी अन्य राज्य में मजबूत नहीं है, ऐसे में कह सकते हैं कि उनकी किसी पार्टी के साथ लड़ाई नहीं है, जिसके चलते नीतीश कुमार, विपक्षी दलों को एक साथ जोड़ने का काम कर सकते हैं। राहुल गांधी सावरकर को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पुराना इतिहास आज के समय में खंगालने का कोई मतलब नहीं है। कर्नाटक चुनाव में नरेशन गढ़ने की कोशिश हो रही है। भाजपा भी ऐसा करती है। कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाने के बाद पार्टी को स्थानीय निकाय चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। यही वजह है कि भाजपा को फिर से येदियुरप्पा को सक्रिय करना पड़ा।'
 

विज्ञापन

अवधेश कुमार
'मेरे लिए नीतीश कुमार का राहुल गांधी से मिलना गंभीर मुद्दा नहीं है। भारत में अगर मोदी से लड़ना है तो एकता तो करनी ही पड़ेगी। राज्यों में तो भाजपा को टक्कर दी जा सकती है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को अभी कोई टक्कर देने वाला नहीं है। पीएम मोदी की स्वीकार्यता उत्तर से लेकर दक्षिण तक है। नीतीश कुमार विपक्षी एकता कराने में जुटे हैं, लेकिन एक तरह से नीतीश खुद अपने आप को राजनीतिक परिदृश्य में बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। नीतीश कुमार की नजरें दिल्ली पर हैं।' 

'हालांकि, यहां यह बात ध्यान रखने वाली है कि बाहरी विरोधी का सामना करने के लिए पहले खुद के घर को संभालना जरूरी है लेकिन क्या नीतीश कुमार अपनी ही पार्टी में सवालों के घेरे में नहीं हैं? नीतीश ने हाल के वर्षों में जो अपना चेहरा दिखाया है, उसे कोई स्थायी नहीं मान सकता। नीतीश कुमार की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है। कर्नाटक का भाजपा नेतृत्व उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। बोम्मई का नेतृत्व भी छाप नहीं छोड़ सका। गुजरात में जैसे भाजपा ने चुनाव से पहले अपनी पूरी कैबिनेट बदल दी थी, वैसा करना कर्नाटक में संभव नहीं है। ऐसे मामलों में बहुत खतरा रहता है। नरेंद्र मोदी, येदियुरप्पा भाजपा के लिए बड़ा फैक्टर हैं, लेकिन अभी दिख रहा है कि भाजपा से अपना घर नहीं संभल रहा।'
 

प्रेम कुमार
'नीतीश का राहुल गांधी से मिलना ऐतिहासिक है या नहीं, इसका फैसला इस मुलाकात के नतीजे करेंगे। यह विपक्षी एकता की कोशिश में प्रयास होने की शुरुआत है। विपक्षी एकता के लिए संतुलन बनाने का काम बेहद अहम होगा। जिस तरह मोतीचूर के लड्डू में कई तरह की बूंदी होती हैं, लेकिन इन बूंदियों को एक साथ बांधने के लिए चाशनी अहम होती है। ये भी अहम है कि चाशनी अगर बहुत ज्यादा गाढ़ी होगी तो भी लड्डू नहीं बनेगा और चाशनी अगर ज्यादा पतली होगी तो भी परेशानी होगी। ऐसे में कह सकते हैं कि नीतीश वो चाशनी बनने की कोशिश कर रहे हैं। नीतीश के विपक्ष का नेतृत्व करने की काबिलियत से इनकार नहीं किया जा सकता। खुद भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी जी ने नीतीश को पीएम मटेरियल बताया था। पीएम का चेहरा सामने रखकर ही चुनाव लड़ना भी जरूरी नहीं है।'

'नीतीश की बजाय कांग्रेस को विपक्षी एकता की पहल करनी चाहिए। हालांकि, कर्नाटक के चुनाव नतीजों के बाद विपक्षी एकता का परिदृश्य थोड़ा साफ होगा। राहुल गांधी सावरकर का मुद्दा उठा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने ही इस पर आपत्ति जताई है। विपक्षी एकता के लिए ये भी अहम होगा कि किन मुद्दों को नहीं उठाना और किन्हें उठाना है। कर्नाटक चुनाव में कांग्रेस को नतीजों में वो मार्जिन लाना होगा कि ऑपरेशन लोटस की आशंका ही खत्म हो जाए।'

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed