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Khabron ke khiladi: हरियाणा के नतीजे का महाराष्ट्र के चुनावी समीकरण पर कितना असर? बता रहे हैं खबरों के खिलाड़ी
Sat, 12 Oct 2024 03:13 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 12 Oct 2024 03:13 PM IST
सार
हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और नतीजों ने कई लोगों को चौंकाया है। सत्ता में भाजपा ने जिस तरह से वापसी की है, उसके राजनीतिक निहितार्थ गहरे हैं और हरियाणा चुनाव के नतीजों का महाराष्ट्र और झारखंड के आगामी चुनाव पर कितना असर होगा, जानिए अमर उजाला के खास कार्यक्रम खबरों के खिलाड़ी में विशेषज्ञों ने क्या बताया।
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खबरों के खिलाड़ी
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा बहुत जल्द हो सकती है। इससे पहले राज्य में सियासी हलचल तेज है। राज्य में चुनावी मौसम के बीच आए हरियाणा चुनाव के नतीजों ने महाराष्ट्र में भी हलचल को बढ़ा दिया है। अलग-अलग दल और गठबंधन के नेता इन नतीजों को लेकर टिप्पणी कर रहे हैं। आखिर इन सियासी बयानों के क्या मायने हैं? महाराष्ट्र में हरियाणा और जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनाव नतीजों का क्या असर होगा? इस हफ्ते के 'खबरों के खिलाड़ी' में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार राखी बख्शी और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।
राखी बख्शी: हरियाणा और जम्मू कश्मीर के नतीजों का असर महाराष्ट्र के चुनाव पर जरूर होगा। इन दोनों राज्यों के नतीजों के बाद कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आ रही है। महाराष्ट्र में भी अब तक कांग्रेस और उसके गठबंधन की बढ़त दिखाई दे रही थी, लेकिन स्थितियां बदलेंगी। कांग्रेस पर महाराष्ट्र ही नहीं, हर तरफ से सहयोगी दबाव डालने लगे हैं। शिवसेना यूबीटी महाराष्ट्र में हावी होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र की डगर अब आसान नहीं है।
अवधेश कुमार: भाजपा और कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से चुनावी समझौता करती हैं, वो जरूर करें, लेकिन क्षेत्रीय दलों को भी अपनी स्थिति के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। महाराष्ट्र में कांग्रेस का प्रदर्शन अपने सहयोगियों से बेहतर था। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व गलतफहमी का शिकार हो चुका है। जब तक पार्टी अपने मूल के हिसाब से व्यवहार नहीं करती, उसके लिए बहुत मुश्किल होगी। कांग्रेस को नए सिरे से विचार, व्यवहार और रणनीति निर्धारित करनी होगी।
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विनोद अग्निहोत्री: कर्नाटक चुनाव जीतने पर कांग्रेस के लोग फूलकर कुप्पा हो गए। उसके बाद क्या हुआ? मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार गए। इसके बाद उनके सहयोगी फूलकर कुप्पा हो गए कि अब मौका है। भाजपा भी फूलकर कुप्पा हो गई कि अब तो हवा चलेगी 400 पार की। दोनों स्थितियों में जनता ने इन पार्टियों को समझा दिया। इसके बाद भी 99 सीटें आने पर कांग्रेस को लगने लगा कि अब तो हरियाणा भी जीतेंगे, महाराष्ट्र भी जीतेंगे, फिर झारखंड भी जीतेंगे। अब हरियाणा की जनता ने फूलकर कुप्पा होने वालों को समझा दिया। राजनीति में ये उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। हरियाणा के नतीजों के बाद भाजपा का मनोबल बढ़ा है और इसका असर महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव पर पड़ेगा।
समीर चौगांवकर: 2019 के नतीजों को देखें तो महाराष्ट्र में भाजपा मजबूत स्थिति में है। आज भी गठबंधन में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे हैं, इसके बाद भी भाजपा मजबूत स्थिति में है। हालांकि, लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा की उम्मीद के मुताबिक नहीं आए। भाजपा को सिर्फ उद्धव ठाकरे, शरद पवार और कांग्रेस से नहीं लड़ना है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी दिक्कत एकनाथ शिंदे भी हैं। शिंदे किसी भी स्थिति में नहीं चाहेंगे कि भाजपा इतनी सीटें जीतकर आ जाए कि देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बन जाएं। सीटों का बंटवारा भी एकनाथ शिंदे की वजह से नहीं हो पा रहा है। भाजपा को अपनी ताकत को पहचानना होगा।
राकेश शुक्ल: हरियाणा चुनाव के नतीजे से कांग्रेस के बारे में एक चीज स्पष्ट हुई है कि वो बिना बैसाखी के नहीं चल सकती। इसलिए विपक्षी गठबंधन के सभी दल दबाव की राजनीति पर आ गए हैं। महाराष्ट्र में राजनीतिक तौर पर दो-तीन तरह की कवायद चल रही है। एक तरफ उद्धव ठाकरे दोनों तरफ चलने का रास्ता तलाश रहे हैं। दूसरी तरफ वहां तीसरे मोर्चे की भी चल रही है।
रामकृपाल सिंह: देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियां अगर मजबूत होना चाहती हैं तो वो क्षेत्रीय दलों को अपना सहयोगी बनाएं, लेकिन उनकी सहयोगी नहीं बनें। उद्धव ठाकरे को अगर भाजपा फिर से अपने साथ लेती है तो इससे ज्यादा उनकी छवि कभी खराब नहीं हो सकती है। भाजपा को महाराष्ट्र में अपने बूते पर लड़ाई लड़नी चाहिए।
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राखी बख्शी: हरियाणा और जम्मू कश्मीर के नतीजों का असर महाराष्ट्र के चुनाव पर जरूर होगा। इन दोनों राज्यों के नतीजों के बाद कांग्रेस की स्थिति कमजोर नजर आ रही है। महाराष्ट्र में भी अब तक कांग्रेस और उसके गठबंधन की बढ़त दिखाई दे रही थी, लेकिन स्थितियां बदलेंगी। कांग्रेस पर महाराष्ट्र ही नहीं, हर तरफ से सहयोगी दबाव डालने लगे हैं। शिवसेना यूबीटी महाराष्ट्र में हावी होती दिखाई दे रही है। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र की डगर अब आसान नहीं है।
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अवधेश कुमार: भाजपा और कांग्रेस क्षेत्रीय दलों से चुनावी समझौता करती हैं, वो जरूर करें, लेकिन क्षेत्रीय दलों को भी अपनी स्थिति के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। महाराष्ट्र में कांग्रेस का प्रदर्शन अपने सहयोगियों से बेहतर था। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व गलतफहमी का शिकार हो चुका है। जब तक पार्टी अपने मूल के हिसाब से व्यवहार नहीं करती, उसके लिए बहुत मुश्किल होगी। कांग्रेस को नए सिरे से विचार, व्यवहार और रणनीति निर्धारित करनी होगी।
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विनोद अग्निहोत्री: कर्नाटक चुनाव जीतने पर कांग्रेस के लोग फूलकर कुप्पा हो गए। उसके बाद क्या हुआ? मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हार गए। इसके बाद उनके सहयोगी फूलकर कुप्पा हो गए कि अब मौका है। भाजपा भी फूलकर कुप्पा हो गई कि अब तो हवा चलेगी 400 पार की। दोनों स्थितियों में जनता ने इन पार्टियों को समझा दिया। इसके बाद भी 99 सीटें आने पर कांग्रेस को लगने लगा कि अब तो हरियाणा भी जीतेंगे, महाराष्ट्र भी जीतेंगे, फिर झारखंड भी जीतेंगे। अब हरियाणा की जनता ने फूलकर कुप्पा होने वालों को समझा दिया। राजनीति में ये उतार-चढ़ाव आते रहेंगे। हरियाणा के नतीजों के बाद भाजपा का मनोबल बढ़ा है और इसका असर महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव पर पड़ेगा।
समीर चौगांवकर: 2019 के नतीजों को देखें तो महाराष्ट्र में भाजपा मजबूत स्थिति में है। आज भी गठबंधन में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे हैं, इसके बाद भी भाजपा मजबूत स्थिति में है। हालांकि, लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा की उम्मीद के मुताबिक नहीं आए। भाजपा को सिर्फ उद्धव ठाकरे, शरद पवार और कांग्रेस से नहीं लड़ना है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी दिक्कत एकनाथ शिंदे भी हैं। शिंदे किसी भी स्थिति में नहीं चाहेंगे कि भाजपा इतनी सीटें जीतकर आ जाए कि देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बन जाएं। सीटों का बंटवारा भी एकनाथ शिंदे की वजह से नहीं हो पा रहा है। भाजपा को अपनी ताकत को पहचानना होगा।
राकेश शुक्ल: हरियाणा चुनाव के नतीजे से कांग्रेस के बारे में एक चीज स्पष्ट हुई है कि वो बिना बैसाखी के नहीं चल सकती। इसलिए विपक्षी गठबंधन के सभी दल दबाव की राजनीति पर आ गए हैं। महाराष्ट्र में राजनीतिक तौर पर दो-तीन तरह की कवायद चल रही है। एक तरफ उद्धव ठाकरे दोनों तरफ चलने का रास्ता तलाश रहे हैं। दूसरी तरफ वहां तीसरे मोर्चे की भी चल रही है।
रामकृपाल सिंह: देश की दोनों राष्ट्रीय पार्टियां अगर मजबूत होना चाहती हैं तो वो क्षेत्रीय दलों को अपना सहयोगी बनाएं, लेकिन उनकी सहयोगी नहीं बनें। उद्धव ठाकरे को अगर भाजपा फिर से अपने साथ लेती है तो इससे ज्यादा उनकी छवि कभी खराब नहीं हो सकती है। भाजपा को महाराष्ट्र में अपने बूते पर लड़ाई लड़नी चाहिए।