Khabaron Ke Khiladi: क्या प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में चुनाव के एलान से पहले एक रैली के जरिए बदल दिए समीकरण
Delhi Assembly Elections 2025: दिल्ली के चुनाव इस बार ज्यादा दिलचस्प हैं। आम आदमी पार्टी के खिलाफ भाजपा मुखर है। कांग्रेस भी इस बार पीछे नहीं है। चुनाव की घोषणा से पहले पलड़ा किसका भारी नजर आ रहा है, आइए जानते हैं...
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दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले ही राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पिछले दिनों में भाजपा और आम आदमी पार्टी में खूब वार-पलटवार हुआ। पहले यह माना जा रहा था कि दिल्ली में इस बार मुकाबला आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच होगा, क्योंकि भाजपा ने न तो उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी, न ही भाजपा की बड़ी रैलियां हुई थीं। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के बाद मुकाबला पूरी तरह से त्रिकोणीय नजर आ रहा है। उन्होंने इस जनसभा के जरिए आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल पर जमकर निशाना साधा। बाद में केजरीवाल ने भी बयान दिए। इसी पर चर्चा करने के लिए इस बार 'खबरों के खिलाड़ी' में रामकृपाल सिंह, राजकिशोर, पूर्णिमा त्रिपाठी, समीर चौगांवकर और अवधेश कुमार मौजूद थे।
दिल्ली में इस बार मुख्य मुकाबला किसके बीच नजर आ रहा है?
पूर्णिमा त्रिपाठी: कांग्रेस मैदान में है, लेकिन प्रधानमंत्री के 'आपदा' वाले बयान के बाद अब लड़ाई भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच नजर आ रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने सीधे केजरीवाल पर निशाना साधा है। आम आदमी पार्टी किन मुद्दों पर चुनाव लड़ेगी, यह काफी स्पष्ट है। जैसे- स्कूली शिक्षा, सम्मान राशि से जुड़ी योजनाएं और मुफ्त बिजली-पानी। हालांकि, आम आदमी पार्टी के लिए इस बार मुकाबला उतना आसान नहीं है, जितना पिछले दो चुनाव में था। कांग्रेस से छिटककर जो वोट बैंक आप के पास गया था, वो इस चुनाव में कहां जाएगा, यह देखना होगा।
रामकृपाल सिंह: चुनावी पहल तो अरविंद केजरीवाल ने की थी। चुनाव का मंच उन्होंने ही सजाया। हालांकि, उनके सजाए मंच पर प्रधानमंत्री मोदी भाषण दे आए। अभी तो ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री ने बाजी मार ली। केजरीवाल के सामने इस बार संकट है। केजरीवाल ने कहा था कि अगर मुझे जेल से बाहर देखना चाहते हो तो लोकसभा में सातों सीटें हमें दे देना। राजनीति में कभी अपने नेतृत्व के लिए जनमत संग्रह नहीं करना चाहिए। अपनी प्रतिष्ठा को जनमत संग्रह का विषय नहीं बनाना चाहिए। जनता सब कुछ भूलती नहीं है। अन्ना हजारे का आंदोलन शीला दीक्षित को हटाने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि लोकपाल और वैकल्पिक राजनीति के लिए हुआ था। बीते 10 वर्ष में क्या हमने यह दो शब्द आम आदमी पार्टी के मुंह से सुने? कांग्रेस भी इस बार उतनी कमजोर नहीं है, जितनी वह पिछले दो चुनाव में थी। इस चुनाव में कांग्रेस को खारिज नहीं कर सकते। भाजपा की एक रणनीति सफल रही है कि उनका मुख्यमंत्री पद का दावेदार नकाब में रहता है। 26 साल से दिल्ली में भाजपा सत्ता में नहीं है। इतना सारा विकास कार्य करने और तीन बार सरकार बनाने के बाद कांग्रेस भी शून्य हो गई थी। केजरीवाल को यही डर है। हिंदुत्व के रंग में तो इतनी भाजपा भी नजर नहीं आ रही, जितनी अब आम आदमी पार्टी नजर आ रही है।
राजकिशोर: अगर मोदी बनाम केजरीवाल चुनाव हो रहा है तो प्रधानमंत्री मोदी इस मामले में बाजी मारते दिख रहे हैं। केजरीवाल की पूरी सियासत उन्होंने दूसरों पर पत्थर फेंकने में बिताई, लेकिन तब उनका घर शीशे का नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने सीधे यह कहा कि दिल्ली के लोगों को आम आदमी पार्टी के कार्यकाल में क्या नहीं मिल सका? वहीं, कांग्रेस यह भी बता रही है कि दिल्ली की जनता को यह सब क्यों नहीं मिल सका? संदीप दीक्षित आधा काम कर चुके हैं। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि जब शीला दीक्षित और केंद्र सरकार मिलकर काम करते थे तो दिल्ली में विकास होता था।
अवधेश कुमार: अरविंद केजरीवाल भले ही मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन चेहरा वही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने एक शब्द दे दिया- आपदा सरकार। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि केंद्र सरकार तो काम करना चाहती है, लेकिन उसमें आम आदमी पार्टी की सरकार बाधा पैदा करती है। उधर, केजरीवाल ने हिंदू वोटों की काट के प्रयत्न शुरू कर दिए हैं। उन्होंने पुजारियों के लिए सम्मान राशि का एलान कर दिया। इस तरह उन्होंने भाजपा के पुजारी प्रकोष्ठ का जवाब दे दिया। कांग्रेस 49 दिन के समर्थन की भरपाई करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस इस बार 12 से 15 सीटों पर टक्कर देने की स्थिति में है।
अरविंद केजरीवाल भाजपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती हैं?
समीर चौगांवकर: प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले दो चुनाव में भाजपा के प्रचार का नेतृत्व किया था, लेकिन दोनों बार जीत केजरीवाल की हुई। अब भाजपा के सामने बड़ी चुनौती यह है कि दिल्ली में अपमानजनक हार से कैसे बचा जाए? उधर, अरविंद केजरीवाल जिन मुद्दों के साथ दिल्ली की राजनीति में उतरे थे, उससे वह 10 साल बाद कोसों दूर हैं। इस बार कांग्रेस भी गंभीरता से चुनाव लड़ती दिख रही है। कांग्रेस के सक्रिय हो जाने से नुकसान आम आदमी पार्टी को ही होगा।