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Khabaron Ke Khiladi: टकराव, सुरक्षा पर सवाल और नैरेटिव की जंग, बजट सत्र के हंगामे पर विशेषज्ञों ने कैसे देखा?

Sat, 07 Feb 2026 09:03 PM IST
संध्या न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Sat, 07 Feb 2026 09:03 PM IST
सार

संसद का बजट सत्र टकराव का केंद्र बना। राहुल गांधी द्वारा एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब के जिक्र से हंगामा हुआ। सत्ता-विपक्ष ने राजनीतिक फायदा उठाया, जिस पर ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई।

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Khabaron Ke Khiladi Conflict, security concerns and the battle of narratives in budget session
खबरों के खिलाड़ी में चर्चा - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

संसद का मौजूदा बजट सत्र टकराव और नैरेटिव गढ़ने की जंग का मैदान बन गया है। राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा पूर्व सेना अध्यक्ष एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का जिक्र करने से सदन में भारी हंगामा हुआ। गतिरोध पूरे हफ्ते चलता रहा। सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अपने-अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से पूरे मुद्दे को भुनाने की कोशिश की। इस हफ्ते 'खबरों के खिलाड़ी' के मंच पर इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार राम कृपाल सिंह, राकेश शुक्ल अनुराग वर्मा, बिलाल सब्जवारी और पीयूष पंत मौजूद रहे।  

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अनुराग वर्मा: जब नाम के साथ गांधी सरनेम जुड़ जाता है तो उस नाम की एोगेंस का लेवल डिफरेंट हो जाता है। हर संसद सत्र में वो एक मुद्दा दे देते हैं। वो पत्रकारों को विषय देते हैं और सरकार को भी व्यस्त रखते हैं। खबरों में बने रहने का जो इनकी नई कला है वह लेफ्ट से आई है। कांग्रेस अब 'सेंटर' की अपनी ताकत खो चुकी है और राहुल गांधी के नेतृत्व में केवल हेडलाइंस बनाने के लिए लेफ्ट की वैचारिक जमीन पर खड़ी है।

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बिलाल सब्जवारी: संसद एक ऐसा प्लेटफार्म है जहां पर पूरे देश के अंदर संदेश दे सकते हैं और राजनीति चलती ही नैरेटिव पे है। अगर कोई मुद्दा राहुल गांधी उठाते हैं तो उसे सुना तो जाना चाहिए। राहुल के मुद्दे सत्ता पक्ष को एक डिफेंसिव ग्राउंड पर ले जाते हैं। राहुल जिस तरह की राजनीति करते हैं वो जिस तरह के मुद्दे उठाते हैं उस पर विवाद होते रहते हैं। जहां तक नियम का सवाल रहा तो ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां राहुल को नियमों के होते हुए भी रोक दिया जाता है। ये सही है कि राहुल को नियम के तहत ही मुद्दों को उठाना चाहिए। राहुल गांधी एक नरेटिव गढ़ने को कोशिश कर रहे हैं, राहुल पॉलिटिक्स के अंदर कमबैक करने की कोशिश कर रहे हैं... वो अपनी बात को सीधे-सीधे व्यक्त करने की कोशिश करते हैं, जिसमें लाग-लपेट नहीं होती।

पीयूष पंत: संसदीय बहस में हमें यह तय करना होगा कि काउंटर करने का स्तर क्या हो। राहुल ने अपनी तरफ से कुछ नहीं गढ़ा। उन्होंने वही पढ़ा जो पब्लिकेशन में था। सत्ता ये सोचती है कि वो ऑल पावरफुल है... जब आप यह मानने लगते हैं कि आप ही सही हैं, वहां समस्या आती है। निशिकांत दुबे काउंटर करने के लिए व्यक्तिगत जीवन को लेकर आए। व्यक्तिगत आक्षेप नहीं होने चाहिए। संसद एक ऐसा फोरम है जहां आप एग्जिक्यूटिव की आलोचना कर सकते हैं। संविधान में ये चीजें इसीलिए बनाई गई। संसद को भी आप नहीं चाहते कि संसद भी संसद की तरह रहे और अपोजिशन वहां सवाल करे। अगर इस बात को सत्ता पक्ष सुनता और उसका जवाब देता तो ये आया गया हो जाता।

राम कृपाल सिंह: लोकसभा अध्यक्ष ने जो भी किया होगा वो नियम के तहत किया होगा। जो सार्वजनिक जीवन में है उसे पता है उसमें क्या लिखा है। मुझे लगता है कि सरकार इतना तगड़ा स्टैंड न लेती तो बेहतर होता। राहुल जब से नेता प्रतिपक्ष बने हैं उनका रिकॉर्ड देख लीजिए। कांग्रेस तीन बार की हार के बाद इस मानसिकता में आ गई है कि वह जनता की अदालत में नहीं जीत सकती, इसलिए कम से कम संसद में जीत का भ्रम पैदा करना चाहती है। जब तक आप व्यक्तिगत द्वेष से ऊपर नहीं उठेंगे तब तक आप बार-बार पराजित होंगे। 

राकेश शुक्ल:  नरवड़े जी की किताब से वही सुविधाजनक तथ्य उठाए हैं जिससे उनका यह तर्क मजबूत हो सके कि भारत सरकार सुरक्षा के मामले में कमजोर है। जहां तक एलओपी की बात आती है तो 1962 के भारत चीन युद्ध को लेकर हेंडरसन ने भी किताब लिखी थी। भारत सरकार ने आज तक उस किताब को मंजूरी नहीं दी है। डिफेंस मिनिस्ट्री ने 35 में से 34 किताबों को मंजूरी दी, लेकिन यदि एक को रोका गया तो उसके पीछे सुरक्षा का कुछ तो कारण होगा। भारत की सुरक्षा के लिए देश के नेता प्रतिपक्ष की तरफ से इस तरह का हथकंडा अपनाना राष्ट्रहित में उचित नहीं है। नरेंद्र मोदी जी के अंदर यह समझ है कि कब दो कदम पीछे जाना है और कब दो कदम आगे चलना है, इसलिए वो जनता के साथ सीधे कनेक्ट करते हैं।

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