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बांधों ने बर्बाद किया ‘भगवान का घर’, कई राज्यों में बन रहे खतरा
हरेन्द्र, नई दिल्ली
Updated Thu, 23 Aug 2018 07:15 PM IST
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बांध
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‘भगवान के घर’ केरल में बाढ़ से मची विभिषिका के लिए बांधों को जिम्मेदार माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि केरल के 80 बांधों में से 36 बाधों के दरवाजे बिना किसी पूर्व चेतावनी के अचानक ही खोल दिए गए, जिससे राज्य में तबाही मची। इनमें से 13 बांध अकेले केरल की जीवनदायनी पेरियार नदी पर ही हैं। वहीं उड़ीसा के खातीगुड़ा के बांध के दरवाजे खोलने से छत्तीसगढ़ के बस्तर, बीजापुर और सुकमा जिलों में बाढ़ का खतरा पैदा हो गया। पिछले दिनों हरियाणा में हथिनीकुंड बांध के दरवाजे खोलने से दिल्ली में यमुना का स्तर बढ़ गया था, और बाढ़ के हालात पैदा हो गए थे।
20वीं सदी में बांध ला रहे त्रासदी
साल 1986 में बांध सुरक्षा प्रणालियों पर केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें बताया गया था कि 20वीं सदी में पूरी दुनिया में 200 से ज्यादा अहम जलाशयों की विफलता के चलते आठ हजार से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई। 1979 में गुजरात के राजकोट जिले में स्थित मच्छू-2 बांध की विफलता के चलते दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए।
वहीं 2012 में आई गाडगिल रिपोर्ट में पूरी पश्चिम घाट को इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन घोषित करने की सिफारिश की गई थी। रिपोर्ट में पश्चिमी घाट को तीन इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन में बांटने की सिफारिश की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन में बड़ी स्टोरेज वाला कोई भी नया बांध नहीं बनाया जाना चाहिए। वहीं थ्रिसूर में अथिराप्पिल्ली और गुंडिया हाइडल प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण मंजूरी नहीं देने की सिफारिश की गई थी।
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देश में बांधों के ऑपरेशन पर नहीं है कोई नीति
प्रसिद्ध पर्यावरणविद और दक्षिण भारत की नदियों पर बांध के नेटवर्क के विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर कहते हैं कि बांध की स्टोरेज क्षमता मुख्य समस्या है, जिसका प्रबंधन किया जाना जरूरी है। अगर उसे ठीक से ऑपरेट किया जाता तो यह समस्या नहीं होती। वह कहते हैं कि हमारे देश में बांधों के ऑपरेशन पर कोई नीति नहीं हैं। प्रबंधन की कोई जिम्मेदारी न होने के चलते पानी छोड़ दिया जाता है, जिससे अक्सर बाढ़ की समस्या पैदा होती है। वह बताते हैं कि 31 जुलाई से 8 अगस्त के बीच बारिश कम थी, बावजूद इसके केरल के बांधों में स्टोरेज भरपूर था, लेकिन जैसे ही ज्यादा बारिश शुरू हुई तो अचानक ही पानी छोड़ने का फैसला कर दिया गया, जिससे कई जानें गई और वहां जनजीवन तबाह हो गया।
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20वीं सदी में बांध ला रहे त्रासदी
साल 1986 में बांध सुरक्षा प्रणालियों पर केंद्रीय जल आयोग की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें बताया गया था कि 20वीं सदी में पूरी दुनिया में 200 से ज्यादा अहम जलाशयों की विफलता के चलते आठ हजार से ज्यादा लोगों ने जान गंवाई। 1979 में गुजरात के राजकोट जिले में स्थित मच्छू-2 बांध की विफलता के चलते दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए।
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वहीं 2012 में आई गाडगिल रिपोर्ट में पूरी पश्चिम घाट को इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन घोषित करने की सिफारिश की गई थी। रिपोर्ट में पश्चिमी घाट को तीन इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन में बांटने की सिफारिश की गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि इकोलॉजिकल सेंसिटिव जोन में बड़ी स्टोरेज वाला कोई भी नया बांध नहीं बनाया जाना चाहिए। वहीं थ्रिसूर में अथिराप्पिल्ली और गुंडिया हाइडल प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण मंजूरी नहीं देने की सिफारिश की गई थी।
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देश में बांधों के ऑपरेशन पर नहीं है कोई नीति
प्रसिद्ध पर्यावरणविद और दक्षिण भारत की नदियों पर बांध के नेटवर्क के विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर कहते हैं कि बांध की स्टोरेज क्षमता मुख्य समस्या है, जिसका प्रबंधन किया जाना जरूरी है। अगर उसे ठीक से ऑपरेट किया जाता तो यह समस्या नहीं होती। वह कहते हैं कि हमारे देश में बांधों के ऑपरेशन पर कोई नीति नहीं हैं। प्रबंधन की कोई जिम्मेदारी न होने के चलते पानी छोड़ दिया जाता है, जिससे अक्सर बाढ़ की समस्या पैदा होती है। वह बताते हैं कि 31 जुलाई से 8 अगस्त के बीच बारिश कम थी, बावजूद इसके केरल के बांधों में स्टोरेज भरपूर था, लेकिन जैसे ही ज्यादा बारिश शुरू हुई तो अचानक ही पानी छोड़ने का फैसला कर दिया गया, जिससे कई जानें गई और वहां जनजीवन तबाह हो गया।
केंद्रीय जल आयोग जिम्मेदार
माही डैम, बांसवाड़ा
बांधों का उद्देश्य स्टोरेज या पानी छोड़ना
वहीं यमुना जिये अभियान के संयोजक मनोज मिश्रा कहते हैं कि बांध देश के लिए बर्बादी का कारण हैं। बांधों से नदियां बर्बाद होती हैं, जो आमजन की बर्बादी कारण बनती हैं। वह कहते हैं कि बांधों के चलते लगातार बाढ़ें बढ़ रही हैं और यह आगे भी होता रहेगा। उन्होंने बांधों को बनाने के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि बनाते वक्त तमाम फायदे जैसे बिजली बनाने, सिंचाई, और पानी स्टोरेज जैसे गिनाए जाते हैं। लेकिन बांधों को बनाने के पीछे असल मकसद है पानी को रोकना। जब बांध का उद्देश्य पानी को रोकना था, तो केरल में पानी क्यों छोड़ा गया।
केंद्रीय जल आयोग जिम्मेदार
मिश्रा के मुताबिक बांध से ज्यादा मात्रा में पानी छोड़ने के बाद नीचे की नदी का स्वरूप बदल जाता है, जिसका स्वरूप प्राकृतिक बाढ़ से अलग होता है। वह कहते हैं कि केंद्रीय जल आयोग भी इसके लिए जिम्मेदार है। उनकी मौसम के पूर्वानुमान की जिम्मेदारी थी, जो उन्होंने वक्त रहते नहीं निभाई। वह कहते हैं तमिलनाडु के मुल्लापेरियार बांध का गलत ऑपरेशन भी केरल में बाढ़ की वजह बना।
वहीं यमुना जिये अभियान के संयोजक मनोज मिश्रा कहते हैं कि बांध देश के लिए बर्बादी का कारण हैं। बांधों से नदियां बर्बाद होती हैं, जो आमजन की बर्बादी कारण बनती हैं। वह कहते हैं कि बांधों के चलते लगातार बाढ़ें बढ़ रही हैं और यह आगे भी होता रहेगा। उन्होंने बांधों को बनाने के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि बनाते वक्त तमाम फायदे जैसे बिजली बनाने, सिंचाई, और पानी स्टोरेज जैसे गिनाए जाते हैं। लेकिन बांधों को बनाने के पीछे असल मकसद है पानी को रोकना। जब बांध का उद्देश्य पानी को रोकना था, तो केरल में पानी क्यों छोड़ा गया।
केंद्रीय जल आयोग जिम्मेदार
मिश्रा के मुताबिक बांध से ज्यादा मात्रा में पानी छोड़ने के बाद नीचे की नदी का स्वरूप बदल जाता है, जिसका स्वरूप प्राकृतिक बाढ़ से अलग होता है। वह कहते हैं कि केंद्रीय जल आयोग भी इसके लिए जिम्मेदार है। उनकी मौसम के पूर्वानुमान की जिम्मेदारी थी, जो उन्होंने वक्त रहते नहीं निभाई। वह कहते हैं तमिलनाडु के मुल्लापेरियार बांध का गलत ऑपरेशन भी केरल में बाढ़ की वजह बना।
बांध से कई राज्यों पर मंडरा रहा खतरा
भीमताल डैम
कई राज्यों में खतरा बन रहे बांध
मिश्रा के मुताबिक उड़ीसा में महानदी के संबलपुर स्थित हीराकुंड बांध के गेट खोलने से हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है, वहीं छत्तीसगढ़ में महानदी पर बने कलमा बांध के 66 दरवाजे खोलने से हर साल ओडिशा के कई जिलों में बाढ़ का खतरा मंडराया रहता है। वह कहते हैं कि बांध के स्ट्रक्चर बचाने के लिए पानी अचानक ही छोड़ दिया जाता है। यही विरोधाभास केरल में बाढ़ की वजह बना है। वह कहते हैं कि बारिश से पहले ही बांध के दरवाजे क्यों नहीं खोले गए, क्योंकि सरकार को बिजली बनाने की चिंता थी।
मिश्रा के मुताबिक उड़ीसा में महानदी के संबलपुर स्थित हीराकुंड बांध के गेट खोलने से हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है, वहीं छत्तीसगढ़ में महानदी पर बने कलमा बांध के 66 दरवाजे खोलने से हर साल ओडिशा के कई जिलों में बाढ़ का खतरा मंडराया रहता है। वह कहते हैं कि बांध के स्ट्रक्चर बचाने के लिए पानी अचानक ही छोड़ दिया जाता है। यही विरोधाभास केरल में बाढ़ की वजह बना है। वह कहते हैं कि बारिश से पहले ही बांध के दरवाजे क्यों नहीं खोले गए, क्योंकि सरकार को बिजली बनाने की चिंता थी।
कमजोर हो रहे हैं बांध
भाखड़ा डैम
गाद से कमजोर हो रहे बांध
ठक्कर भी मानते हैं कि बांधों में गाद जमने से उनकी स्टोरेज क्षमता प्रभावित हो रही है, जो अंत में बाढ़ की मुख्य वजह बनता है। वहीं मनोज मिश्रा भी इस बात से सरोकार रखते हैं। उनके मुताबिक गाद से बांध की उम्र कम होती है। जब बांध से पानी छोड़ा जाता है, तो वह बिना गाद का होता है। पानी का पहला धर्म है मिट्टी भरा पानी समुद्र तक पहुंचाना। बिना मिट्टी के पानी से खेतों की उर्वरा क्षमता प्रभावित होती है। साथ ही इससे ग्राउंड वाटर रिचार्ज में भी मदद मिलती है।
बांध बनने से यह प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे भूमिगत जलस्तर लगातार कम हो रहा है। वह कहते हैं कि इस बात के रिकार्ड नहीं है कि केरल के 80 से अधिक डैम की आखिरी बार सफाई कब हुई थी। केरल सरकार को बाकायदा पब्लिक के सामने यह रिपोर्ट रखनी चाहिए कि किस डैम के गाद की सफाई कब हुई थी।
ठक्कर भी मानते हैं कि बांधों में गाद जमने से उनकी स्टोरेज क्षमता प्रभावित हो रही है, जो अंत में बाढ़ की मुख्य वजह बनता है। वहीं मनोज मिश्रा भी इस बात से सरोकार रखते हैं। उनके मुताबिक गाद से बांध की उम्र कम होती है। जब बांध से पानी छोड़ा जाता है, तो वह बिना गाद का होता है। पानी का पहला धर्म है मिट्टी भरा पानी समुद्र तक पहुंचाना। बिना मिट्टी के पानी से खेतों की उर्वरा क्षमता प्रभावित होती है। साथ ही इससे ग्राउंड वाटर रिचार्ज में भी मदद मिलती है।
बांध बनने से यह प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे भूमिगत जलस्तर लगातार कम हो रहा है। वह कहते हैं कि इस बात के रिकार्ड नहीं है कि केरल के 80 से अधिक डैम की आखिरी बार सफाई कब हुई थी। केरल सरकार को बाकायदा पब्लिक के सामने यह रिपोर्ट रखनी चाहिए कि किस डैम के गाद की सफाई कब हुई थी।
अमेरिका ने हटाए 2000 से ज्यादा बांध
बांध
अमेरिका हटा रहा बांध
मिश्रा बताते हैं कि बांध बनाने की जरूरत ही क्या है। सरकार का बांध बनाने का उद्देश्य बिजली पैदा करना है, वहीं आज कम लागत में सोलर से ज्यादा बिजली बनाई जा सकती है। जबकि बांध बनाने की लागत कहीं ज्यादा है। वहीं उत्तराखंड और हिमाचल में कई जगहों पर बांधों का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा है और बेकार घोषित किए जा चुके हैं। मिश्रा कहते हैं कि देश के हर बांध का समीक्षा की जानी चाहिए। वह सवाल उठाते हैं कि अकेले अमेरिका ने दो हजार से ज्यादा बांध हटा दिए, जबकि यूरोप में यह प्रक्रिया जारी है।
मिश्रा बताते हैं कि बांध बनाने की जरूरत ही क्या है। सरकार का बांध बनाने का उद्देश्य बिजली पैदा करना है, वहीं आज कम लागत में सोलर से ज्यादा बिजली बनाई जा सकती है। जबकि बांध बनाने की लागत कहीं ज्यादा है। वहीं उत्तराखंड और हिमाचल में कई जगहों पर बांधों का इस्तेमाल ही नहीं हो रहा है और बेकार घोषित किए जा चुके हैं। मिश्रा कहते हैं कि देश के हर बांध का समीक्षा की जानी चाहिए। वह सवाल उठाते हैं कि अकेले अमेरिका ने दो हजार से ज्यादा बांध हटा दिए, जबकि यूरोप में यह प्रक्रिया जारी है।