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Kerala Election: केरल में समुद्र भी पलट सकता है सत्ता की नाव; कुल 40 सीटों पर भारी पड़ेगा मछुआरों का आक्रोश
Sat, 04 Apr 2026 07:19 AM IST
Pavan
आशुतोष भाटिया, अमर उजाला, नई दिल्ली
आशुतोष भाटिया, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Sat, 04 Apr 2026 07:19 AM IST
सार
केरल में अमर उजाला ने मछुआरा समाज की तमाम बस्तियों में जाकर हकीकत की पड़ताल की। अब वे केवल मुफ्त राशन या सब्सिडी पर नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तटीय क्षरण और भूमि अधिकारों जैसे ठोस मुद्दों पर मतदान करेंगे। वे साफ कहते हैं कि राजनीतिक दल सामान्य घोषणाओं से आगे बढ़ स्पष्ट नीतियां पेश करें। देखिए कोल्लम से ग्राउंड रिपोर्ट
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला प्रिन्ट/एजेंसी
विस्तार
केरल की 140 विधानसभा सीटों में से लगभग 40 सीटें समुद्र तट से सटी हुई हैं। राज्य में 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले मछुआरा समुदाय का मिजाज इस बार बदला हुआ है। यह समाज सरकार की कुछ बुनियादी नीतियों और भूमि विवादों से इतना खफा है कि तटीय क्षेत्रों के चुनावी समीकरण पलट सकते हैं।
अमर उजाला ने मछुआरा समाज की तमाम बस्तियों में जाकर हकीकत की पड़ताल की। अब मछुआरे केवल मुफ्त राशन या सब्सिडी पर नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तटीय क्षरण और भूमि अधिकारों जैसे ठोस मुद्दों पर मतदान करेंगे। वे साफ कहते हैं कि राजनीतिक दल सामान्य घोषणाओं से आगे बढ़ स्पष्ट नीतियां पेश करें। उनकी मांग है कि तटीय क्षेत्रों से जुड़े नीतिगत फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
यह भी पढ़ें - भवानीपुर चुनाव से पहले विवाद: TMC ने रिटर्निंग ऑफिसर को हटाने की मांग की, शुभेंदु अधिकारी से नजदीकी का आरोप
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पुनर्गेहम पहल
सरकार ने समुद्र के बढ़ते जलस्तर और कटाव से मछुआरों को राहत देने के लिए पुनर्गेहम नाम की महत्वाकांक्षी पुनर्वास योजना शुरू की है। इसके तहत समुद्र तट से 50 मीटर के दायरे में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर फ्लैट या घर दिए जा रहे हैं। सुनने में यह योजना भले कल्याणकारी लगे, लेकिन कुछ मछुआरे पुनर्वास योजना के तहत नए फ्लैटों को समुद्र से दूर बता रहे हैं और उन्हें यह चिंता है कि इससे उनकी मछली पकड़ने के काम पर असर पड़ सकता है। हालांकि जमीनी शिकायतों के विपरीत सरकार का दावा है कि उसने मछुआरों के लिए रिकॉर्ड मुआवजा दिया है।
विझिंजम बंदरगाह
तिरुवनंतपुरम के विझिंजम में अंतरराष्ट्रीय डीप वॉटर पोर्ट का स्थानीय मछुआरे विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि पोर्ट निर्माण के कारण समुद्री कटाव बढ़ने से तटीय गांवों में घरों और आजीविका पर संकट आया है। इसके अलावा, पुनर्वास, मुआवजा और सुरक्षा उपायों को लेकर भी असंतोष बना हुआ है। उधर सरकार इस परियोजना को राज्य के विकास और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अहम बता रही है। मछुआरों की मांग है कि बंदरगाह से होने वाली आय का एक हिस्सा तटीय समुदायों के विकास और सुरक्षा पर खर्च किया जाए।
मुनंबम भूमि विवाद
एर्नाकुलम के मुनंबम क्षेत्र में रहने वाले करीब 600 मछुआरा परिवार अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। साल 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने मछुआरों की जमीन पर दावा ठोकते हुए इसको बतौर वक्फ संपत्ति पंजीकृत कर लिया। इसके बाद इन परिवारों पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। मछुआरों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन खरीदी थी, जबकि वक्फ बोर्ड का दावा है कि यह दान की गई धार्मिक संपत्ति है जिसे बेचा नहीं जा सकता था। मछुआरे इसे अपनी पुश्तैनी कमाई पर डाका मान रहे हैं। कैथोलिक चर्च और मछुआरा संगठन एकजुट होकर सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा केरल में धार्मिक ध्रुवीकरण और भूमि अधिकार की बहस को जन्म दे रहा है।
यह भी पढ़ें - बंगाल: बागदा में सोमा ठाकुर व मधुपर्णा ठाकुर के बीच रोचक मुकाबला; ननद-भाभी की लड़ाई में मतुआ वोट बना निर्णायक
किसे लगेगा झटका?
यह सभी मुद्दे मौजूदा एलडीएफ सरकार के कार्यकाल की नीतियों से जुड़े हैं, लिहाजा सत्ता-विरोधी लहर का सबसे ज्यादा असर वामपंथी गठबंधन पर पड़ सकता है। मछुआरों का पारंपरिक गुस्सा एलडीएफ का वोट कम कर सकता है। मुनंबम विवाद और चर्च के समर्थन के कारण पिछली बार छिटका ईसाई वोट बैंक वापस यूडीएफ की ओर मुड़ सकता है। इधर भाजपा भी मुनंबम पर आक्रामक रुख अपना रही है और वक्फ संशोधन बिल के जरिए मछुआरा समाज में अपनी पैठ बना रही है। अगर यह मुद्दे तटीय क्षेत्रों में 5 से 10 प्रतिशत वोट भी काटते हैं, तो नुकसान एलडीएफ को होगा।
अन्य वीडियो
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अमर उजाला ने मछुआरा समाज की तमाम बस्तियों में जाकर हकीकत की पड़ताल की। अब मछुआरे केवल मुफ्त राशन या सब्सिडी पर नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तटीय क्षरण और भूमि अधिकारों जैसे ठोस मुद्दों पर मतदान करेंगे। वे साफ कहते हैं कि राजनीतिक दल सामान्य घोषणाओं से आगे बढ़ स्पष्ट नीतियां पेश करें। उनकी मांग है कि तटीय क्षेत्रों से जुड़े नीतिगत फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
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पुनर्गेहम पहल
सरकार ने समुद्र के बढ़ते जलस्तर और कटाव से मछुआरों को राहत देने के लिए पुनर्गेहम नाम की महत्वाकांक्षी पुनर्वास योजना शुरू की है। इसके तहत समुद्र तट से 50 मीटर के दायरे में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर फ्लैट या घर दिए जा रहे हैं। सुनने में यह योजना भले कल्याणकारी लगे, लेकिन कुछ मछुआरे पुनर्वास योजना के तहत नए फ्लैटों को समुद्र से दूर बता रहे हैं और उन्हें यह चिंता है कि इससे उनकी मछली पकड़ने के काम पर असर पड़ सकता है। हालांकि जमीनी शिकायतों के विपरीत सरकार का दावा है कि उसने मछुआरों के लिए रिकॉर्ड मुआवजा दिया है।
विझिंजम बंदरगाह
तिरुवनंतपुरम के विझिंजम में अंतरराष्ट्रीय डीप वॉटर पोर्ट का स्थानीय मछुआरे विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि पोर्ट निर्माण के कारण समुद्री कटाव बढ़ने से तटीय गांवों में घरों और आजीविका पर संकट आया है। इसके अलावा, पुनर्वास, मुआवजा और सुरक्षा उपायों को लेकर भी असंतोष बना हुआ है। उधर सरकार इस परियोजना को राज्य के विकास और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अहम बता रही है। मछुआरों की मांग है कि बंदरगाह से होने वाली आय का एक हिस्सा तटीय समुदायों के विकास और सुरक्षा पर खर्च किया जाए।
मुनंबम भूमि विवाद
एर्नाकुलम के मुनंबम क्षेत्र में रहने वाले करीब 600 मछुआरा परिवार अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। साल 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने मछुआरों की जमीन पर दावा ठोकते हुए इसको बतौर वक्फ संपत्ति पंजीकृत कर लिया। इसके बाद इन परिवारों पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। मछुआरों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन खरीदी थी, जबकि वक्फ बोर्ड का दावा है कि यह दान की गई धार्मिक संपत्ति है जिसे बेचा नहीं जा सकता था। मछुआरे इसे अपनी पुश्तैनी कमाई पर डाका मान रहे हैं। कैथोलिक चर्च और मछुआरा संगठन एकजुट होकर सरकार से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। यह मुद्दा केरल में धार्मिक ध्रुवीकरण और भूमि अधिकार की बहस को जन्म दे रहा है।
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किसे लगेगा झटका?
यह सभी मुद्दे मौजूदा एलडीएफ सरकार के कार्यकाल की नीतियों से जुड़े हैं, लिहाजा सत्ता-विरोधी लहर का सबसे ज्यादा असर वामपंथी गठबंधन पर पड़ सकता है। मछुआरों का पारंपरिक गुस्सा एलडीएफ का वोट कम कर सकता है। मुनंबम विवाद और चर्च के समर्थन के कारण पिछली बार छिटका ईसाई वोट बैंक वापस यूडीएफ की ओर मुड़ सकता है। इधर भाजपा भी मुनंबम पर आक्रामक रुख अपना रही है और वक्फ संशोधन बिल के जरिए मछुआरा समाज में अपनी पैठ बना रही है। अगर यह मुद्दे तटीय क्षेत्रों में 5 से 10 प्रतिशत वोट भी काटते हैं, तो नुकसान एलडीएफ को होगा।
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