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कर्नाटक हाईकोर्ट: मुस्लिम निकाह अनुबंध, हिंदू विवाह की तरह संस्कार नहीं

Thu, 21 Oct 2021 06:11 AM IST
देव कश्यप एजेंसी, बंगलूरू।
एजेंसी, बंगलूरू। Published by: देव कश्यप Updated Thu, 21 Oct 2021 06:11 AM IST
सार

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के जरिये विवाह बंधन टूट जाने के बाद भी पक्षकारों के सभी दायित्व व कर्तव्य पूरी तरह समाप्त नहीं होते।

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Karnataka High Court said Muslim marriage contract not a rite like Hindu marriage
कर्नाटक हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम निकाह एक अनुबंध है, जिसके कई स्वरूप हो सकते हैं। यह हिंदू विवाह की तरह संस्कार नहीं है। अनुबंध भंग करने से जिम्मेदारियां खत्म नहीं होतीं। ऐसे में तलाक के बाद विशेष परिस्थिति में गुजारा भत्ता पाने का पूर्व पत्नी का अधिकार निर्विवाद है।

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक के जरिये विवाह बंधन टूट जाने के बाद भी पक्षकारों के सभी दायित्व व कर्तव्य पूरी तरह समाप्त नहीं होते। इस मामले में बंगलूरू के 52 साल के एजाज उर रहमान ने निकाह के कुछ महीने बाद ही नवंबर 1991 में बीवी सायरा बानो को तीन बार तलाक कहकर छोड़ दिया था। उनका निकाह पांच हजार रुपये मेहर पर हुआ था। तलाक के बाद उसने दूसरा निकाह किया। सायरा ने अगस्त 2002 में परिवार अदालत की शरण लेकर गुजारा भत्ता मांगा। अदालत ने अगस्त 2011 में उसे 3000 रुपये महीना गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। यह भत्ता सायरा या रहमान के जीवित रहने या सायरा के दूसरा निकाह करने तक दिया जाना है। इसके खिलाफ रहमान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिका निरस्त करते हुए जस्टिस कृष्णा एस दीक्षित ने उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
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बेसहारा पत्नी को मदद... मुसलमान का नैतिक और धार्मिक कर्तव्य
जस्टिस दीक्षित ने कुरान के हवाले से कहा कि अपनी बेसहारा पूर्व पत्नी को मदद करना एक पवित्र मुसलमान के लिए उसका नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है।

और मेहर भी अपर्याप्त
हाईकोर्ट ने कहा कि इस्लामी धार्मिक नियम में सामान्यतः मेहर पूर्व पत्नी को दिए जाने वाले प्रतिफल की तरह देखा जाता है। सामान्य रूप से उसे इद्दत के बाद गुजारा भत्ता पाने योग्य भी नहीं माना जाता। लेकिन यह कोई हमेशा माना जाने वाला मानक नियम नहीं है। मेहर की रकम भी अक्सर भ्रामक और नाकाफी आंकड़ा होती है। इसे अक्सर कम रखा जाता है।
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अनुबंध के कई रूप हो सकते हैं
निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक से निकाह भंग तो हो जाता है, लेकिन इससे उपजे कुछ अधिकार और जिम्मेदारियां पूरी तरह खत्म नहीं होते। निकाह में शामिल पक्ष पूर्व अनुबंध-धारक कहे जा सकते हैं। कानून के अनुसार इससे नई जिम्मेदारियां जन्म लेती हैं। तलाक के बाद बेसहारा हुई पूर्व पत्नी को गुजारा भत्ता देना पति का परिस्थितिजन्य कर्तव्य बन जाता है।

शिक्षण संस्थानों में बंदी पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन गंभीर

Karnataka High Court said Muslim marriage contract not a rite like Hindu marriage
केरल उच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई

केरल हाईकोर्ट ने शिक्षण संस्थानों में बंदी को लेकर संबंधित विभागों के अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट और खुद हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करने के लिए कहा है। साथ ही चेताया, ऐसा न करने के मामले को वह बेहद गंभीरता से लेगा। शिक्षण संस्थानों में हड़ताल को लेकर दायर एक याचिका निस्तारित करते हुए हाईकोर्ट ने यह निर्देश दिए।

याचिका में कहा गया था कि विद्यार्थी संगठनों द्वारा शिक्षण संस्थानों में बंदी करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।  2018 में पेरुमकुलम के सरकारी पीवीएचएस स्कूल में हुई हड़ताल से कई दिन स्कूल बंद रहा। इसकी शिकायत पर भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। याचिका पर सरकार ने पक्ष रखा कि शिकायत मिलने पर पुलिस ने संबंधित पक्षों की बैठक करवाई थी। हाईकोर्ट ने सरकार का पक्ष जानने के बाद याचिका को निस्तारित कर दिया।

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