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कर्नाटक : हाईकोर्ट ने बाल संन्यास को वैधानिक करार दिया, 16 वर्षीय वेधवर्धन तीर्थ बने रहेंगे शिरूर मठ के पीठाधिपति
Thu, 30 Sep 2021 02:38 AM IST
Kuldeep Singh
एजेंसी, बंगलूरू
एजेंसी, बंगलूरू
Published by: Kuldeep Singh
Updated Thu, 30 Sep 2021 02:38 AM IST
सार
कर्नाटक हाईकोर्ट पीठ ने बाल संन्यास को वैधानिक करार देते हुए कहा, संन्यास या भिक्षा देने की उम्र को लेकर कोई नियम नहीं है। किसी नाबालिग व्यक्ति के संन्यास पर रोक लगाने का कोई कानूनी प्रावधान भी नहीं है। न्यायमित्र एसएस नागानंद की दलीलें भी स्पष्ट करती हैं कि धर्म 18 साल की उम्र से पहले संन्यासी बनने की अनुमति देता है।
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Karnataka High Court
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
कर्नाटक हाईकोर्ट ने बुधवार को बाल संन्यास को वैधानिक करार दिया। कोर्ट ने उस रिट याचिका को खारिज कर दिया जिसमें 16 वर्षीय स्वामी अनिरुद्ध सरलथया उडुपी की वेधवर्धन तीर्थ स्वामी के रूप में नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा, 18 वर्ष से पहले किसी व्यक्ति के संन्यास धारण करने पर न तो धर्म में कोई पाबंदी है और न ही संविधान में।
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16 वर्षीय वेधवर्धन तीर्थ बने रहेंगे शिरूर मठ के पीठाधिपति
कर्नाटक हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सचिन शंकर मखदूम पीठ ने कहा, संन्यास या भिक्षा देने की उम्र को लेकर कोई नियम नहीं है। किसी नाबालिग व्यक्ति के संन्यास पर रोक लगाने का कोई कानूनी प्रावधान भी नहीं है। पीठ ने कहा, न्यायमित्र एसएस नागानंद की दलीलें भी स्पष्ट करती हैं कि धर्म 18 साल की उम्र से पहले संन्यासी बनने की अनुमति देता है। यही नहीं बौद्ध धर्म में भी कम उम्र के बच्चे भिक्षु बनते रहे हैं।
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शिरूर मठ भक्त समिति (उडुपी) के सचिव एवं प्रबंध न्यासी पीएल आचार्य व अन्य पदाधिकारियों ने याचिका दाखिल कर स्वामी अनिरुद्ध सरलथया उडुपी को वेधवर्धन तीर्थ स्वामी बनाए जाने को चुनौती दी थी। इसमें बाल संन्यास को बाल श्रम बताते हुए दलील दी गई कि नाबालिग को ‘भौतिक जीवन के परित्याग’ के लिए मजबूर किया गया है। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। लिहाजा नाबालिग का मुख्य पुजारी के तौर पर अभिषेक करना उसे वह करने के लिए मजबूर करने के समान जो उसकी उम्र के अनुकूल नहीं है।
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वेधवर्धन तीर्थ स्वामी की उर्म 18 से कम होना महज संयोग
न्यायमित्र नागानंद ने कोर्ट को बताया कि वेधवर्धन तीर्थ स्वामी की उम्र 18 से कम होना महज संयोग है। उन्होंने कहा, बाल संन्यास ग्रहण करने को लेकर उम्र की सीमा नहीं और न यह बच्चे पर संन्यास थोपने जैसा है।
दीक्षा लेने वाला व्यक्ति और उसके माता-पिता की सहमति के बगैर संन्यास की दीक्षा नहीं दी जाती है। इससे पहले पीठ ने शंकराचार्य के 12 साल की उम्र में स्वामी बनने का भी हवाला दिया था। राज्य सरकार के वकील ने भी इस याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं बताते हुए विरोध किया था।