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कर्नाटकः वोट कम, सीटें ज्यादा! कैसे कर पाई बीजेपी, कहां चूकी कांग्रेस

Thu, 17 May 2018 01:03 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Thu, 17 May 2018 01:03 PM IST
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Karnataka Election Result: How did the BJP defeat Congress and win karnataka chunav
कर्नाटक के नतीजे आ चुके हैं। भाजपा को कांग्रेस से कम वोट मिले हैं लेकिन उसके खाते में सीटें ज्यादा हैं। कई लोगों को ये गुत्थी समझ में नहीं आ रही है कि ऐसा कैसे हुआ? ऐसा भी नहीं है कि कर्नाटक में ये पहली बार नहीं हुआ है। इसी कर्नाटक में साल 2008 के विधानसभा चुनावों में भी ऐसा ही हुआ था। उस समय लगभग आज जैसी ही स्थिति थी।
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भाजपा को दो फीसदी कम वोट थे कांग्रेस से, लेकिन 30 सीटें ज्यादा थी और वो सरकार बनाने में कामयाब रही। साल 1983 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उस समय जनता पार्टी को कांग्रेस से कम वोट मिले थे पर सीटें ज्यादा होने की वजह से वो सरकार बनाने में कामयाब रही थी।
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ऐसा कैसे हुआ?

अभी हुए चुनावों में कांग्रेस को 38 फीसदी, भाजपा को 36.2 और जेडीएस को 18.3 फीसदी वोट मिले हैं। ये पूरे राज्य के वोट हैं। यदि क्षेत्र के हिसाब से देखेंगे तो ये वोट छह हिस्सों में बंटा है। कांग्रेस के वोट सभी जगह बिखरे नजर आएंगे।
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भाजपा का वोट दो फीसदी कम जरूर है पर कुछ इलाकों में कंस्ट्रेटेड है। दक्षिण कर्नाटक में जेडीएस मजबूत है और वहां भाजपा को महज 18 फीसदी ही वोट मिले हैं। भाजपा को कोस्टल कर्नाटक क्षेत्र में अच्छी खासी बढ़त मिली है। 21 सीटों वाले इस इलाके में भाजपा को 51 फीसदी वोट मिले हैं और 18 सीटों पर जीत हासिल की है।

मुंबई कर्नाटक में भाजपा बहुत मजबूत तो नहीं हुआ करती थी पहले पर इस इलाके में भी तकरीबन 48 से 50 फीसदी वोट मिले हैं। सेंट्रल कर्नाटक के इलाके में भी भाजपा ने कामयाबी हासिल की। पर हैदराबाद कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी पकड़ बरकरार रखी और ये भाजपा से आगे रहने में कामयाब रही।

दक्षिण कर्नाटक में लड़ाई जेडीएस और कांग्रेस के बीच रही। कुल मिलाकर देखें तो भाजपा को वोट इन इलाकों में कंसंट्रेटेड रही। यही कारण है कि पार्टी कांग्रेस को शिकस्त देने में कामयाब रही।

मोदी के रैली का कितना असर हुआ?

Karnataka Election Result: How did the BJP defeat Congress and win karnataka chunav
आंकड़ों को देखें तो कहा जा सकता है कि मोदी लहर जैसा कर्नाटक में कुछ नहीं था। जैसी लहर उत्तर प्रदेश और गुजरात में देखने को मिली था। लेकिन निश्चित रूप से चुनाव से पहले के सात दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली का असर जरूर रहा।

यही वजह है कि ऐसी जाति और ऐसे समुदाय के वोटर जो भाजपा के साथ नहीं रही कभी, उनका कुछ हिस्सा पार्टी के पक्ष में वोट किया। लेकिन उनकी लोकप्रियता पर अभी भी कोई प्रश्न चिह्न नहीं है। सिद्धारमैया भी लोकप्रिय हैं, पर वो एक मुख्यमंत्री के रूप में है।

लिंगायत कार्ड से कांग्रेस को फायदा हुआ?

बहुत मामूली फायदा हुआ। लिंगायत शुरू से ही भाजपा के कोर सपोर्टर रहे हैं। लेकिन लिंगायत पूरे राज्य में नहीं हैं। वो बिलकुल उत्तरी इलाके में बसे हैं। सर्वे के आधार पर हमने देखा कि 62 फीसदी लिंगायतों ने भाजपा के लिए वोट किया। कांग्रेस को मामूली 20 से 22 फीसदी ही वोट मिले हैं।

भाजपा के उनके वोटों में बहुत ही मामूली गिरावट देखने को मिला है। कांग्रेस ने ये किया कि वो अपने वोटरों को बचाने में कामयाब रही। साल 2013 के चुनावों में कांग्रेस को करीब 36 फीसदी वोट मिले थे। इस बार उन्हें 38 फीसदी वोट मिले हैं। ये स्पष्ट है कि कांग्रेस के कोर वोटरों ने उनका साथ दिया।

मुसलमानों का 65 फीसदी वोट कांग्रेस को मिला है। दलित, आदिवासी ने भी कांग्रेस को वोट किया है। हारने का कारण ये रहा कि पार्टी दूसरे समुदायों के वोट को हासिल करने में कामयाब नहीं रही।

कांग्रेस-जेडीएस अगर पहले साथ आते तो क्या होता?

अगर गठबंधन पहले हुआ होता तो चुनावी नतीजे आज अलग होते। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो दोनों पार्टियों को 150 सीटें मिलती और भाजपा 70 पर ठहर जाती। खेल बदल जाता। अगर 2019 के चुनावों की बात करें तो भाजपा के ख़्लाफ़ उनके विरोधी दलों को साथ आना होगा। सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, देशभर को इस चुनाव से कई संदेश मिलते हैं।

अगर 2019 के चुनावों में भाजपा को टक्कर देनी है तो न तो कांग्रेस अकेले और न ही क्षेत्रीय पार्टियां अकेले दम पर ऐसा कर पाएगी। सभी भाजपा विरोधी दलों को एकसाथ आना ही होगा।

नतीजे से क्या संकेत मिले?

Karnataka Election Result: How did the BJP defeat Congress and win karnataka chunav
पहला संदेश ये मिला है कि कांग्रेस 2019 में भाजपा को अकेले टक्कर नहीं दे पाएगी। इस बात को कांग्रेस को स्वीकार करना होगा। आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन करने के प्रयास करने होंगे। दूसरा संदेश ये मिला कि क्षेत्रीय पार्टियों को भी एक साथ आना होगा।

तीसरा संदेश ये मिला कि नेतृत्व की कहीं न कहीं कमी रही है। जैसे ही दो बड़े नेताओं का मुकाबला होता है तो मोदी आगे निकल जाते हैं। मोदी वनाम राहुल का खेल जब तक रहेगा चुनाव एकतरफा होते जाएंगे। ऐसे में भाजपा विरोधी पार्टियों को नेता खड़ा करना होगा और नीतियों पर चुनाव लड़ना होगा।

भाजपा को कितना फायदा हुआ?

भाजपा के लिए बल्ले-बल्ले वाली स्थिति है। लगातार चुनाव जीत रही है पार्टियां। दक्षिण में भी पार्टी अच्छी खासी सीटें जीती है। भाषा की दिक्कतों के बावजूद यह बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है तो यह भाजपा के लिए उत्साहित करने वाले पल हैं।

इस चुनाव के बाद भाजपा के लिए दक्षिण के द्वार खुल गए हैं। अब देखना होगा कि वो द्वार से कितना आगे बढ़ पाते हैं। तमिलनाडु और तेलंगाना तक भाजपा का जाना अभी भी चुनौती भरा है। आंध्र प्रदेश और केरल में पैर पसारना भी आसान नहीं है।
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