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ये है सिद्धारमैया की कैबिनेट: डीके शिवकुमार के अलावा इन्हें मिली मंत्रिमंडल में मिली जगह, जानें सबकुछ
Sat, 20 May 2023 07:03 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Sat, 20 May 2023 07:03 PM IST
सार
सिद्धारमैया कैबिनेट में तीन दलित, दो अल्पसंख्यकों को शामिल किया गया है। इसके अलावा एक लिंगायत और एक वोक्कलिगा कैटेगरी से भी मंत्री बनाए गए हैं।
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सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कर्नाटक में सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ग्रहण कर ली है। इसके अलावा सिद्धारमैया कैबिनेट के आठ मंत्रियों ने भी शपथ ली। सिद्धारमैया कैबिनेट में भी अहिन्दा फॉर्मूला लागू किया गया है। आठ में से छह विधायक इसी समीकरण के सहारे मंत्री बने हैं। सिद्धारमैया कैबिनेट में तीन दलित, दो अल्पसंख्यकों को शामिल किया गया है। इसके अलावा एक लिंगायत और एक वोक्कलिगा कैटेगरी से भी मंत्री बनाए गए हैं।
कर्नाटक में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद माना जा रहा था कि अधिकांश मंत्री पहली बार में ही शपथ ले लेंगे, लेकिन सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच नामों की सहमति नहीं बन पाई। खैर, आाइए जानते हैं उन आठ मंत्रियों के बारे में जिन्हें सिद्धारमैया की कैबिनेट में जगह मिली है।
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कर्नाटक में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद माना जा रहा था कि अधिकांश मंत्री पहली बार में ही शपथ ले लेंगे, लेकिन सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच नामों की सहमति नहीं बन पाई। खैर, आाइए जानते हैं उन आठ मंत्रियों के बारे में जिन्हें सिद्धारमैया की कैबिनेट में जगह मिली है।
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सिद्धारमैया
- फोटो : अमर उजाला
1. सिद्धारमैया, मुख्यमंत्री : दूसरी बार सीएम का पद संभाला, डिप्टी सीएम भी रह चुके हैं
कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार सिद्धारमैया का जन्म देश की आजादी से ठीक पहले तीन अगस्त 1947 को मैसूर में हुआ था। तब ब्रिटिश का राज हुआ करता था। सिद्धारमैया के पिता सिद्धारमे गौड़ा मैसूर जिले के टी. नरसीपुरा के पास वरुणा होबली में खेती करते थे। मां बोरम्मा गृहणी थीं।
दस साल की उम्र तक उनकी कोई औपचारिक स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी। इसके बाद गांव के ही स्कूल में पढ़े। बाद में उन्होंने बीएससी और फिर एलएलबी की पढ़ाई मैसूर विश्वविद्यालय से की। पांच भाई-बहनों में सिद्धारमैया दूसरे नंबर पर हैं और वह कुरुबा गौड़ा समुदाय से हैं। सिद्धारमैया मैसूर के मशहूर वकील चिक्काबोरैया के अधीन जूनियर थे और बाद में उन्होंने कुछ समय के लिए कानून पढ़ाया।
सिद्धारमैया साल 1983 में पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर कर्नाटक विधानसभा में चुनकर आए। 1994 में जनता दल सरकार में रहते हुए कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री बने। एचडी देवगौड़ा के साथ विवाद होने के बाद जनता दल सेक्युलर का साथ छोड़ा और 2008 में कांग्रेस का हाथ पकड़ा।
वे 2013 से 2018 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे चुके हैं। उन्होंने अब तक 12 चुनाव लड़े हैं जिसमें से नौ में जीत दर्ज की है। मुख्यमंत्री रहते हुए गरीबों के लिए चलाई गई उनकी कई योजनाओं की काफी तारीफ हुई, जिसमें सात किलो चावल देने वाली वालाअन्न भाग्य योजना, स्कूल जाने वाले छात्रों को 150 ग्राम दूध और इंदिरा कैंटीन शामिल थीं।
सिद्धारमैया का नाम विवादों में भी खूब रहा है। उनके कार्यकाल में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की जयंती धूमधाम से मनाई जाती थी। इसके अलावा उन्होंने पीएफआई और एसडीपीआई के कई कार्यकर्ताओं को रिहा करने का भी आदेश दिया था।
कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शुमार सिद्धारमैया का जन्म देश की आजादी से ठीक पहले तीन अगस्त 1947 को मैसूर में हुआ था। तब ब्रिटिश का राज हुआ करता था। सिद्धारमैया के पिता सिद्धारमे गौड़ा मैसूर जिले के टी. नरसीपुरा के पास वरुणा होबली में खेती करते थे। मां बोरम्मा गृहणी थीं।
दस साल की उम्र तक उनकी कोई औपचारिक स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी। इसके बाद गांव के ही स्कूल में पढ़े। बाद में उन्होंने बीएससी और फिर एलएलबी की पढ़ाई मैसूर विश्वविद्यालय से की। पांच भाई-बहनों में सिद्धारमैया दूसरे नंबर पर हैं और वह कुरुबा गौड़ा समुदाय से हैं। सिद्धारमैया मैसूर के मशहूर वकील चिक्काबोरैया के अधीन जूनियर थे और बाद में उन्होंने कुछ समय के लिए कानून पढ़ाया।
सिद्धारमैया साल 1983 में पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर कर्नाटक विधानसभा में चुनकर आए। 1994 में जनता दल सरकार में रहते हुए कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री बने। एचडी देवगौड़ा के साथ विवाद होने के बाद जनता दल सेक्युलर का साथ छोड़ा और 2008 में कांग्रेस का हाथ पकड़ा।
वे 2013 से 2018 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे चुके हैं। उन्होंने अब तक 12 चुनाव लड़े हैं जिसमें से नौ में जीत दर्ज की है। मुख्यमंत्री रहते हुए गरीबों के लिए चलाई गई उनकी कई योजनाओं की काफी तारीफ हुई, जिसमें सात किलो चावल देने वाली वालाअन्न भाग्य योजना, स्कूल जाने वाले छात्रों को 150 ग्राम दूध और इंदिरा कैंटीन शामिल थीं।
सिद्धारमैया का नाम विवादों में भी खूब रहा है। उनके कार्यकाल में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान की जयंती धूमधाम से मनाई जाती थी। इसके अलावा उन्होंने पीएफआई और एसडीपीआई के कई कार्यकर्ताओं को रिहा करने का भी आदेश दिया था।
डीके शिवकुमार
- फोटो : अमर उजाला
2. डीके शिवकुमार, डिप्टी सीएम : कर्नाटक के सबसे अमीर विधायक और मंत्री, अध्यक्ष पद पर भी बने रहेंगे
शिवकुमार का जन्म कर्नाटक के बैंगलोर के पास कनकपुरा में 15 मई 1962 को हुआ था। शिवकुमार के पिता केम्पेगौड़ा और मां गौरम्मा वोक्कालिगा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। छोटा भाई डीके सुरेश भी राजनीति में है। शिवकुमार की शादी 1993 में उषा से हुई। दोनों की दो बेटियां, ऐश्वर्या और आभरण हैं। एक बेटा आकाश है। सबसे बड़ी बेटी की शादी कैफे कॉफी डे के संस्थापक वी जी सिद्धार्थ के बेटे अमर्त्य से हुई है।
डीके शिवकुमार ने 1980 के दशक की शुरुआत में एक छात्र नेता के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। पहली बार 1989 में मैसूरु जिले के सथानूर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए। तब उनकी उम्र 27 साल थी। शिवकुमार शुरू से ही कांग्रेस में रहे हैं। इसके बाद शिवकुमार ने 1994, 1999 और 2004 के विधानसभा चुनावों में उसी निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। 2008, 2013, 2018 और 2023 में कनकपुरा निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। दो जुलाई 2020 को शिवकुमार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। इस बार विधानसभा चुनाव की पूरी जिम्मेदारी भी उन्हीं के सिर पर थी। वह आठ बार कर्नाटक में विधायक चुने जा चुके हैं।
डीके शिवकुमार की कुल संपत्ति 1,413 करोड़ रुपये की है। इनमें कई बैंक खाते, जमीनें, प्लॉट, बॉन्ड्स, सोने-हीरे के गहने आदि शामिल हैं। कई लग्जरी गाड़ियां भी शिवकुमार के काफिले में है। शिवकुमार की नेटवर्थ में पिछले पांच सालों में 68 फीसदी का उछाल देखा गया है। साल 2018 में दी गई जानकारी के मुताबिक शिवकुमार के पास 840 करोड़ रुपये की संपत्ति थी और ये 2013 के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ी थी। चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने बताया है कि उनके पास 12 बैंक अकाउंट हैं जिनमें से कुछ उनके भाई डीके सुरेश द्वारा संयुक्त रूप से प्रबंधित किए जाते हैं। कुल ऐसेट्स 1413 करोड़ रुपये के हैं, साथ ही उनके लोन का अमाउंट 225 करोड़ रुपये का है।
शिवकुमार का जन्म कर्नाटक के बैंगलोर के पास कनकपुरा में 15 मई 1962 को हुआ था। शिवकुमार के पिता केम्पेगौड़ा और मां गौरम्मा वोक्कालिगा समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। छोटा भाई डीके सुरेश भी राजनीति में है। शिवकुमार की शादी 1993 में उषा से हुई। दोनों की दो बेटियां, ऐश्वर्या और आभरण हैं। एक बेटा आकाश है। सबसे बड़ी बेटी की शादी कैफे कॉफी डे के संस्थापक वी जी सिद्धार्थ के बेटे अमर्त्य से हुई है।
डीके शिवकुमार ने 1980 के दशक की शुरुआत में एक छात्र नेता के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। पहली बार 1989 में मैसूरु जिले के सथानूर निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए। तब उनकी उम्र 27 साल थी। शिवकुमार शुरू से ही कांग्रेस में रहे हैं। इसके बाद शिवकुमार ने 1994, 1999 और 2004 के विधानसभा चुनावों में उसी निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। 2008, 2013, 2018 और 2023 में कनकपुरा निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की। दो जुलाई 2020 को शिवकुमार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। इस बार विधानसभा चुनाव की पूरी जिम्मेदारी भी उन्हीं के सिर पर थी। वह आठ बार कर्नाटक में विधायक चुने जा चुके हैं।
डीके शिवकुमार की कुल संपत्ति 1,413 करोड़ रुपये की है। इनमें कई बैंक खाते, जमीनें, प्लॉट, बॉन्ड्स, सोने-हीरे के गहने आदि शामिल हैं। कई लग्जरी गाड़ियां भी शिवकुमार के काफिले में है। शिवकुमार की नेटवर्थ में पिछले पांच सालों में 68 फीसदी का उछाल देखा गया है। साल 2018 में दी गई जानकारी के मुताबिक शिवकुमार के पास 840 करोड़ रुपये की संपत्ति थी और ये 2013 के मुकाबले दोगुनी से भी ज्यादा बढ़ी थी। चुनाव आयोग को दिए हलफनामे में उन्होंने बताया है कि उनके पास 12 बैंक अकाउंट हैं जिनमें से कुछ उनके भाई डीके सुरेश द्वारा संयुक्त रूप से प्रबंधित किए जाते हैं। कुल ऐसेट्स 1413 करोड़ रुपये के हैं, साथ ही उनके लोन का अमाउंट 225 करोड़ रुपये का है।
जी परमेश्वर
- फोटो : अमर उजाला
3. जी परमेश्वर: दलित समुदाय के बड़े नेता, पहले डिप्टी सीएम भी रह चुके हैं
कर्नाटक के पूर्व डिप्टी सीएम और चुनाव में मेनिफेस्टो कमेटी के चेयरमैन रहे जी परमेश्वर को इस बार कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। दलित समुदाय से आने वाले परमेश्वर खुद सीएम पद की दावेदारी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने नाराजगी भी जताई थी। उन्होंने कहा था कि अगर सीएम नहीं बना रहे तो कम से कम डिप्टी सीएम बना दें। परमेश्वर तुमकुरु के कोराटागेरे सीट से इस बार विधायक चुने गए हैं। परमेश्वर के दबदबे वाले तुमकुर में कांग्रेस ने 11 में से सात सीटें इस बार जीती है। परमेश्वर 2010 से 2018 तक कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। सियासी सुर्खियों से दूर रहने वाले जी परमेश्वर कृषि विज्ञान से पीएचडी हैं। परमेश्वर को शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में काम करने का अनुभव है।
परमेश्वर 1989 में पहली बार कर्नाटक विधानसभा के लिए चुने गए। 1992 में वीरप्पा मोइली की सरकार में उन्हें कीट-रेशम विभाग का मंत्री बनाया गया। 1999 में एसएम कृष्णा की सरकार में उनकी पदोन्नति हुई और उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री बनाए गए। 2015 में सिद्धारमैया की सरकार में परमेश्वर को गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला। 2018 में कांग्रेस अकेले दम पर सत्ता में नहीं आ पाई तो जेडीएस के साथ समझौता कर लिया। तब परमेश्वर डिप्टी सीएम बनाए गए।
कर्नाटक के पूर्व डिप्टी सीएम और चुनाव में मेनिफेस्टो कमेटी के चेयरमैन रहे जी परमेश्वर को इस बार कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। दलित समुदाय से आने वाले परमेश्वर खुद सीएम पद की दावेदारी कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने नाराजगी भी जताई थी। उन्होंने कहा था कि अगर सीएम नहीं बना रहे तो कम से कम डिप्टी सीएम बना दें। परमेश्वर तुमकुरु के कोराटागेरे सीट से इस बार विधायक चुने गए हैं। परमेश्वर के दबदबे वाले तुमकुर में कांग्रेस ने 11 में से सात सीटें इस बार जीती है। परमेश्वर 2010 से 2018 तक कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। सियासी सुर्खियों से दूर रहने वाले जी परमेश्वर कृषि विज्ञान से पीएचडी हैं। परमेश्वर को शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में काम करने का अनुभव है।
परमेश्वर 1989 में पहली बार कर्नाटक विधानसभा के लिए चुने गए। 1992 में वीरप्पा मोइली की सरकार में उन्हें कीट-रेशम विभाग का मंत्री बनाया गया। 1999 में एसएम कृष्णा की सरकार में उनकी पदोन्नति हुई और उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री बनाए गए। 2015 में सिद्धारमैया की सरकार में परमेश्वर को गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला। 2018 में कांग्रेस अकेले दम पर सत्ता में नहीं आ पाई तो जेडीएस के साथ समझौता कर लिया। तब परमेश्वर डिप्टी सीएम बनाए गए।
केएच मुनियप्पा
- फोटो : अमर उजाला
4. केएच मुनियप्पा : 10 साल केंद्रीय मंत्री रहे, अब सिद्धारमैया कैबिनेट में जगह मिल गई
यूपीए सरकार के दौरान केंद्र में 10 साल तक कैबिनेट मंत्री रहे केएच मुनियप्पा को भी कर्नाटक में मंत्री बनाया गया है। मुनियप्पा दलित समुदाय से आते हैं। केएच मुनियप्पा कोलार से सात बार लोकसभा का सांसद रह चुके हैं। मुनियप्पा बेंगलुरु ग्रामीण के देवनहल्ली सीट से इस बार विधायक चुने गए हैं। उनके संसदीय सीट कोलार में भी कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए छह में से चार सीटों पर जीत हासिल की है। मुनियप्पा ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1969 में की थी। 1978 में पहली बार कोलार तालुका बोर्ड में वाइस चेयरमैन बने। 1991 में मुनियप्पा लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इसके बाद 2019 तक लगातार छह चुनाव जीते।
यूपीए सरकार के दौरान केंद्र में 10 साल तक कैबिनेट मंत्री रहे केएच मुनियप्पा को भी कर्नाटक में मंत्री बनाया गया है। मुनियप्पा दलित समुदाय से आते हैं। केएच मुनियप्पा कोलार से सात बार लोकसभा का सांसद रह चुके हैं। मुनियप्पा बेंगलुरु ग्रामीण के देवनहल्ली सीट से इस बार विधायक चुने गए हैं। उनके संसदीय सीट कोलार में भी कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए छह में से चार सीटों पर जीत हासिल की है। मुनियप्पा ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1969 में की थी। 1978 में पहली बार कोलार तालुका बोर्ड में वाइस चेयरमैन बने। 1991 में मुनियप्पा लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। इसके बाद 2019 तक लगातार छह चुनाव जीते।
एमबी पाटील
- फोटो : अमर उजाला
5. एमबी पाटील: लिंगायत समुदाय के बड़े नेता, चुनाव कैंपेन कमेटी के प्रमुख भी रहे
कांग्रेस में एमबी पाटील लिंगायत समुदाय के सबसे बड़ा चेहरा हैं। पाटील चुनाव में कैंपेन कमेटी के चेयरमैन भी थे। उनकी रणनीति का कांग्रेस को फायदा भी मिला। चुनाव के बीच में पाटील की बदौलत ही कांग्रेस ने भाजपा के कई दिग्गज नेताओं को तोड़ने में सफलता हासिल की। पाटील ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1991 में की थी। वे 1998 से 1999 तक लोकसभा के सांसद भी रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में पांच बार विधायक रहने वाले पाटील सिद्धारमैया और कुमारस्वामी सरकार में मंत्री रहे हैं। पाटील इसके पहले गृह, जल संसाधन जैसे अहम विभागों के मंत्री रह चुके हैं। उन्हें सिद्धारमैया का करीबी भी माना जाता है। इसी वजह से कुमारस्वामी सरकार में उन्हें गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला था। पाटील ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। उनके पिता बीएम पाटील कर्नाटक के बड़े राजनेता थे। पाटील इस बार विजयपुरा के बाबालेश्वर सीट से विधायक चुने गए हैं।
कांग्रेस में एमबी पाटील लिंगायत समुदाय के सबसे बड़ा चेहरा हैं। पाटील चुनाव में कैंपेन कमेटी के चेयरमैन भी थे। उनकी रणनीति का कांग्रेस को फायदा भी मिला। चुनाव के बीच में पाटील की बदौलत ही कांग्रेस ने भाजपा के कई दिग्गज नेताओं को तोड़ने में सफलता हासिल की। पाटील ने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1991 में की थी। वे 1998 से 1999 तक लोकसभा के सांसद भी रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा में पांच बार विधायक रहने वाले पाटील सिद्धारमैया और कुमारस्वामी सरकार में मंत्री रहे हैं। पाटील इसके पहले गृह, जल संसाधन जैसे अहम विभागों के मंत्री रह चुके हैं। उन्हें सिद्धारमैया का करीबी भी माना जाता है। इसी वजह से कुमारस्वामी सरकार में उन्हें गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग मिला था। पाटील ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। उनके पिता बीएम पाटील कर्नाटक के बड़े राजनेता थे। पाटील इस बार विजयपुरा के बाबालेश्वर सीट से विधायक चुने गए हैं।
सतीश जरकिहोली
- फोटो : अमर उजाला
6. सतीश जरकिहोली : आदिवासी कोटे से मंत्री बने, अपने क्षेत्र में कांग्रेस को बड़ी जीत दिलाई
आदिवासी समुदाय से आने वाले जरकिहोली बेलगावी के येमकानमर्दी सीट से विधायक चुने गए हैं। कर्नाटक में करीब सात फीसदी आदिवासी हैं, जिनके लिए 15 सीटें रिजर्व है। 2019 में जब कांग्रेस के भीतर बगावत हुई तो जरकिहोली ने अपने भाई रमेश के साथ बीजेपी में जाने से इनकार कर दिया। जरकिहोली को सिद्धारमैया का समर्थक माना जाता है। मुख्यमंत्री पद के लिए उन्होंने खुलकर सिद्धारमैया को समर्थन दिया था।
जरकिहोली के भाई रमेश मंत्री भी रह चुके हैं। सतीश पहली बार 1998 में विधानपरिषद के जरिए राजनीति में दाखिल हुए। 2004 में धरम सिंह की सरकार में पहली बार मंत्री बनाए गए थे। 2013 में सिद्धारमैया जब मुख्यमंत्री बने तो सतीश जरकिहोली को आबकारी विभाग की जिम्मेदारी मिली। कुमारस्वामी की सरकार में सतीश वन मंत्री बने थे। बेलगावी में कांग्रेस को 18 में से 11 सीटों पर जीत मिली है। जीत के पीछे सतीश की रणनीति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आदिवासी समुदाय से आने वाले जरकिहोली बेलगावी के येमकानमर्दी सीट से विधायक चुने गए हैं। कर्नाटक में करीब सात फीसदी आदिवासी हैं, जिनके लिए 15 सीटें रिजर्व है। 2019 में जब कांग्रेस के भीतर बगावत हुई तो जरकिहोली ने अपने भाई रमेश के साथ बीजेपी में जाने से इनकार कर दिया। जरकिहोली को सिद्धारमैया का समर्थक माना जाता है। मुख्यमंत्री पद के लिए उन्होंने खुलकर सिद्धारमैया को समर्थन दिया था।
जरकिहोली के भाई रमेश मंत्री भी रह चुके हैं। सतीश पहली बार 1998 में विधानपरिषद के जरिए राजनीति में दाखिल हुए। 2004 में धरम सिंह की सरकार में पहली बार मंत्री बनाए गए थे। 2013 में सिद्धारमैया जब मुख्यमंत्री बने तो सतीश जरकिहोली को आबकारी विभाग की जिम्मेदारी मिली। कुमारस्वामी की सरकार में सतीश वन मंत्री बने थे। बेलगावी में कांग्रेस को 18 में से 11 सीटों पर जीत मिली है। जीत के पीछे सतीश की रणनीति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
के जॉर्ज
- फोटो : अमर उजाला
7. के. जॉर्ज : ईसाई समुदाय से ताल्लुक, पहले भी मंत्री रह चुके हैं
अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय से आने वाले के. जॉर्ज मूल रूप से केरल के रहने वाले हैं। जॉर्ज बेंगलुरु के सर्वज्ञनगर से चौथी बार विधायक चुने गए हैं। कर्नाटक में करीब दो प्रतिशत ईसाई वोटर हैं। 1968 में यूथ कांग्रेस से राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले जॉर्ज वीरेंद्र पाटील, एस बंगरप्पा, सिद्धारमैया और कुमारस्वामी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। जॉर्ज गृह, उद्योग और बेंगलुरु डेवलपमेंट जैसे प्रमुख विभाग के मंत्री रहे हैं। 1985 में पहली बार जॉर्ज विधायक चुने गए थे। 2017 में जॉर्ज पर दो पुलिस अधिकारियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में केस दर्ज हुआ था।
अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय से आने वाले के. जॉर्ज मूल रूप से केरल के रहने वाले हैं। जॉर्ज बेंगलुरु के सर्वज्ञनगर से चौथी बार विधायक चुने गए हैं। कर्नाटक में करीब दो प्रतिशत ईसाई वोटर हैं। 1968 में यूथ कांग्रेस से राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले जॉर्ज वीरेंद्र पाटील, एस बंगरप्पा, सिद्धारमैया और कुमारस्वामी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। जॉर्ज गृह, उद्योग और बेंगलुरु डेवलपमेंट जैसे प्रमुख विभाग के मंत्री रहे हैं। 1985 में पहली बार जॉर्ज विधायक चुने गए थे। 2017 में जॉर्ज पर दो पुलिस अधिकारियों को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में केस दर्ज हुआ था।
जमीर
- फोटो : अमर उजाला
8. जमीर अहमद: इकलौते मुस्लिम मंत्री, जेडीएस छोड़कर कांग्रेस आए थे
कर्नाटक के इकलौते मुस्लिम मंत्री के रूप में जमीर ने शपथ ली है। जमीर बेंगलुरु के चमराजपेट सीट से विधायक चुने गए हैं। जमीर ने अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल सेक्युलर से की थी। 2005 में जमीर की चमराजपेट सीट से जीत ने कर्नाटक में सियासी भूचाल ला दिया था। दरअसल, मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद एसएम कृष्णा को महाराष्ट्र का राज्यपाल बना दिया गया, जिसके बाद कृष्णा को चमराजपेट सीट से इस्तीफा देना पड़ा। एसएम कृष्णा ने इस सीट पर अपने सेनापती आरवी देवराज को मैदान में उतार दिया। जमीर भी जेडीएस के टिकट पर चुनाव में उतरे और कृष्णा के गढ़ को ध्वस्त कर दिया। जमीर को इसके बाद जेडीएस सरकार में वक्फ और हज बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया। 2018 में कुमारस्वामी से कलह के बाद जमीर ने छह विधायकों के साथ कांग्रेस ज्वॉइन कर लिया।
कर्नाटक के इकलौते मुस्लिम मंत्री के रूप में जमीर ने शपथ ली है। जमीर बेंगलुरु के चमराजपेट सीट से विधायक चुने गए हैं। जमीर ने अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत जनता दल सेक्युलर से की थी। 2005 में जमीर की चमराजपेट सीट से जीत ने कर्नाटक में सियासी भूचाल ला दिया था। दरअसल, मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद एसएम कृष्णा को महाराष्ट्र का राज्यपाल बना दिया गया, जिसके बाद कृष्णा को चमराजपेट सीट से इस्तीफा देना पड़ा। एसएम कृष्णा ने इस सीट पर अपने सेनापती आरवी देवराज को मैदान में उतार दिया। जमीर भी जेडीएस के टिकट पर चुनाव में उतरे और कृष्णा के गढ़ को ध्वस्त कर दिया। जमीर को इसके बाद जेडीएस सरकार में वक्फ और हज बोर्ड का चेयरमैन बनाया गया। 2018 में कुमारस्वामी से कलह के बाद जमीर ने छह विधायकों के साथ कांग्रेस ज्वॉइन कर लिया।
प्रियांक खरगे
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9. प्रियांक खरगे: कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे को मिली बड़ी जिम्मेदारी
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे प्रियांक खरगे को भी कर्नाटक सरकार में जगह मिली है। चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रियांक को कम्युनिकेशन विभाग का प्रभार सौंपा था। प्रियांक कलबुर्गी के चित्तपुर से विधायक चुने गए हैं। प्रियांक को राजनीति विरासत में मिली है। पहली बार 2013 में विधायक बने। प्रियांक एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के संगठन में बड़े पदों पर रह चुके हैं। 2016 में सिद्धारमैया ने प्रियांक को अपनी कैबिनेट में शामिल किया था और उन्हें आईटी जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी दी थी। प्रियांक कुमारस्वामी सरकार में सोशल वेलफेयर विभाग के मंत्री बने थे।
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे प्रियांक खरगे को भी कर्नाटक सरकार में जगह मिली है। चुनाव से पहले कांग्रेस ने प्रियांक को कम्युनिकेशन विभाग का प्रभार सौंपा था। प्रियांक कलबुर्गी के चित्तपुर से विधायक चुने गए हैं। प्रियांक को राजनीति विरासत में मिली है। पहली बार 2013 में विधायक बने। प्रियांक एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के संगठन में बड़े पदों पर रह चुके हैं। 2016 में सिद्धारमैया ने प्रियांक को अपनी कैबिनेट में शामिल किया था और उन्हें आईटी जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी दी थी। प्रियांक कुमारस्वामी सरकार में सोशल वेलफेयर विभाग के मंत्री बने थे।
रामालिंगा रेड्डी
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10. रामालिंगा रेड्डी : पार्षद से मंत्री तक का सफर पूरा किया, वोक्कालिगा चेहरा हैं
वोक्कलिगा चेहरा हैं। रेड्डी बेंगलुरु के एमबीटी सीट से विधायक चुने गए हैं। रामालिंगा को शिवकुमार गुट का माना जाता है। उनकी बेटी सौम्या के लिए डीके मतगणना स्थल पर पहुंच गए थे। रेड्डी पहली बार 1989 में विधायक चुने गए थे। रेड्डी मोइली, एसएम कृष्णा, धरम सिंह और सिद्धारमैया की सरकार में पहले मंत्री रह चुके हैं। रेड्डी ने छात्र राजनीति से अपनी करियर की शुरुआत की थी। 1983 में बेंगलुरु नगर निगम में वह पार्षद चुने गए थे।
वोक्कलिगा चेहरा हैं। रेड्डी बेंगलुरु के एमबीटी सीट से विधायक चुने गए हैं। रामालिंगा को शिवकुमार गुट का माना जाता है। उनकी बेटी सौम्या के लिए डीके मतगणना स्थल पर पहुंच गए थे। रेड्डी पहली बार 1989 में विधायक चुने गए थे। रेड्डी मोइली, एसएम कृष्णा, धरम सिंह और सिद्धारमैया की सरकार में पहले मंत्री रह चुके हैं। रेड्डी ने छात्र राजनीति से अपनी करियर की शुरुआत की थी। 1983 में बेंगलुरु नगर निगम में वह पार्षद चुने गए थे।