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Kargil 25 Years: करगिल में मारे गए पाक कैप्टन के दादा ने जब वापस मांगा पोते का शव, भारत ने ऐसे रखा था मान

Tue, 09 Jul 2024 08:03 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Tue, 09 Jul 2024 08:03 PM IST
सार

आपने अमर उजाला की "करगिल के 25 साल" सीरीज में यह पढ़ा होगा कि कैसे टाइगर हिल मोर्चे पर तैनात पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इनफेंट्री के युवा कैप्टन करनाल शेर खान की बहादुरी की भारतीय सेना की 192 माउंटेन ब्रिगेड की कमान संभाल रहे ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा ने तारीफ की थी और उन्होंने न केवल पाकिस्तान सरकार को उसकी बहादुरी के बारे में लिखा, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को ससम्मान पाकिस्तान वापिस भी भेजा था।

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Kargil 25 Years When grandfather of Pakistani captain killed asked for body back how did India respect him
25 Years Of Kargil War - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पूरा देश करगिल विजय दिवस के 25 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच यह युद्ध मई से जुलाई 1999 के दौरान नियंत्रण रेखा के साथ जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र करगिल और उससे सटी बर्फीली चोटियों पर लड़ा गया। यह दुनिया का अकेली ऐसी जंग थी, जो सुपर हाई एल्टीट्यूड क्षेत्र 16000 से 18500 फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई थी। इस ऑपरेशन को भारत ने 'ऑपरेशन विजय' और पाकिस्तान में 'ऑपरेशन कोह-ए-पैमा' यानी 'ऑपरेशन पर्वतारोहण' का नाम दिया गया था। इस जंग में भारतीय सेना ने न केवल अपनी बहादुरी की परिचय दिया, बल्कि ये भी दुनिया को बताया कि इंडियन आर्मी कितनी प्रोफेशनल है और कैसे वह सभी धर्मों का सम्मान करती है। इस जंग में सैकड़ों पाकिस्तानी सैनिकों की मौत हुई। वहीं पाकिस्तान ने अपने ही सैनिकों के शवों को वापस लेने से इनकार कर दिया, जिसके बाद भारतीय सेना ने पूरे सम्मान के उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया। कुछ के शवों को उनके परिजनों के अनुरोध पर इन्हें वापस भी भेजा गया। इनमें से एक थे पाकिस्तान की नॉर्दन लाइट इन्फैंट्री (NLI) के कैप्टन तैमूर मलिक, जिनके शव को भारतीय सेना ने पूरे सम्मान के साथ उनके दादा-दादी के हवाले किया। 

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कैसे कैप्टन करनाल शेर खान के शव की हुई वापसी?
आपने अमर उजाला की "करगिल के 25 साल" सीरीज में यह पढ़ा होगा कि कैसे टाइगर हिल मोर्चे पर तैनात पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इनफेंट्री के युवा कैप्टन करनाल शेर खान की बहादुरी की भारतीय सेना की 192 माउंटेन ब्रिगेड की कमान संभाल रहे ब्रिगेडियर एमपीएस बाजवा ने तारीफ की थी और उन्होंने न केवल पाकिस्तान सरकार को उसकी बहादुरी के बारे में लिखा, बल्कि उनके पार्थिव शरीर को ससम्मान पाकिस्तान वापिस भी भेजा था। जिसके बाद कैप्टन शेर खान को पाकिस्तान के सर्वोच्च सैन्य सम्मान 'निशान-ए-हैदर' से सम्मानित किया गया। शेर खान के परिवार ने भी इसके लिए ब्रिगेडियर बाजवा का शुक्रिया किया था। भारतीय सेना का यह जज्बा दिखाता है कि हमारे सैनिकों की दुश्मनी सिर्फ युद्ध के मैदान तक रहती है और हम मानवीय संवेदनाओं की कद्र करते हैं।
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प्वाइंट 5770 से शुरू होता है सियाचिन
कुछ ऐसा ही हुआ था कैप्टन तैमूर मलिक के साथ। सियाचिन ग्लेशियर की साल्टारो रेंज पर स्थित 5770 मीटर (18,930 फीट है) ऊंची इस चोटी को प्वाइंट 5770 भी कहा जाता है। प्वाइंट 5770 चामुंडा/तुर्तुक सेक्टर में स्थित है, जो एनजे 9842 की सीमा पर है। वह स्थान जहां से तकनीकी रूप से 'ऑपरेशन मेघदूत' यानी सियाचिन का क्षेत्र शुरू होता है। प्वाइंट 5770 पर कब्जा करके पाकिस्तानी सेना इस क्षेत्र के साथ-साथ चुलुंग ला पर भी काबिज हो सकती थी। सुपर हाई एल्टीट्यूड होने की वजह से वहां तक पहुंचना नामुमकिन था। हमारे सैनिकों ने यहां कब्जा करने के कई प्रयास किए। दुर्भाग्य से, मोटी-मोटी बर्फ की परतों और क्रेवास (खाई) होने और पॉइंट 5770 के ठीक नीचे स्थित 'पिंपल' नामक पाकिस्तानी चौकी से गोलीबारी के कारण, भारतीय सेना इस दुर्जेय स्थान को जीतने में असफल हो रही थी। 
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'बिलाल पोस्ट' पर कब्जे की लड़ाई
दूसरी ओर, पाकिस्तान की ओर से प्वाइंट 5770 तक पहुंचना, हालांकि काफी चुनौतीपूर्ण था, लेकिन भारत की तरफ के मुकाबले आसान था। इसका फायदा उठाते हुए, पाकिस्तानी इसके रणनीतिक महत्व को समझते हुए इस पर कब्जा करके बैठे थे। और उन्होंने इसका नाम 'बिलाल पोस्ट' रखा। पाकिस्तानियों को भी यह बात पता थी और प्वाइंट 5770 पर पहुंचने से पहले भारतीय सेना को लगभग एक किलोमीटर लंबी खड़ी चढ़ाई से गुजरना पड़ता था। 27 राजपूत बटालियन के कर्नल (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) कोनसम हिमालय सिंह के कमांडिंग ऑफिसर ने एक जबरदस्त हमले की योजना बनाई। मेजर नवदीप सिंह चीमा और कैप्टन श्यामल सिन्हा के नेतृत्व में आठ प्रशिक्षित सैनिकों की दो चुनी हुई हमलावर टीमों को प्वाइंट 5770 पर कब्जा करने का काम सौंपा गया। इसके लिए सबसे कठिन मार्ग ही चुना गया। भारतीय सेना के 1987 माउंट कंचनजंगा अभियान के सदस्य रहे कर्नल कोनसम ने इस दुर्गम रास्ते की टोह लेने का जिम्मा लिया, जिसमें एक किलोमीटर की खतरनाक चढ़ाई भी शामिल थी। बेहद खराब मौसम और बर्फीले तूफान जैसी परिस्थितियों में लगातार दो रातों तक रस्सी बांधने (रोप फिक्सिंग) की जिम्मेदारी उठाई। 

प्वाइंट 5770 तक पहुंचना था नामुमकिन
27 जून, 1999 को मेजर नवदीप सिंह चीमा और कैप्टन श्यामलाल अपनी टीम के साथ निर्धारित मिशन पर निकल पड़े। इसमें कैप्टन श्यामलाल और हवलदार जोगिंदर सिंह सोनमर्ग और स्थित हाई एल्टीट्यूड वारफेयर स्कूल (HAWS) से जुड़े थे। ऐसे हालात में जहां समुद्र तल पर हवा में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग 30 फीसदी होती है। जो 17,000-18,000 फीट की ऊंचाई पर घटकर केवल 11-12 फीसदी रह जाती है। ऐसे परिस्थितियों में प्वाइंट 5770 तक पहुंचने की तैयारी की गई। हथियारों, गोला-बारूद और राशन के साथ प्रशिक्षित और शारीरिक रूप से फिट टीम को प्वाइंट 5770 तक पहुंचने में सात घंटे लगे। सबसे कठिन मार्ग चुनने का फैसला कारगर साबित हुआ क्योंकि 'बिलाल पोस्ट' पर तैनात पाकिस्तानी इस बात से अनजान थे कि 27 राजपूत की दो हमलावर टीमें उनके ठिकानों तक पहुंच गई हैं। कुछ पाकिस्तानी सैनिक संगर (सुरक्षात्मक पत्थर की दीवार) बनाने में लगे हुए थे, तो दो लोग पत्र लिख रहे थे, और बाकी लोग एक प्रीफैब्रिकेटेड फाइबरग्लास हट में आराम फरमा रहे थे। 

बिलाल पोस्ट का नाम बदलकर 'नवदीप टॉप' हुआ
थके-हारे मेजर नवदीप की टीम ने आराम न करने की ठानी क्योंकि वे जानते थे कि इससे पाकिस्तानी सैनिक चौंकन्ने हो जाएंगे। मेजर नवदीप ने कैप्टन श्यामलाल के साथ अपने हमलावर दल का नेतृत्व किया और मशीन गन पर तैनात पाकिस्तानी संतरी को तुरंत मार गिराया। पाकिस्तानी संतरी की मशीन गन के साथ-साथ अपने हथियारों का इस्तेमाल करते हुए 27 राजपूत ने सभी 11 पाक सैनिकों को मार गिराया। हमला इतना घातक था कि 27 राजपूत को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। पाकिस्तानी सेना के मारे गए 11 सैनिकों में एक 'बिलाल पोस्ट' का कमांडर कैप्टन तैमूर मलिक भी था। पाकिस्तान ने अपने सैनिकों के शवों को लेने से इनकार कर दिया। बिलाल पोस्ट का नाम बदलकर 'नवदीप टॉप' कर दिया गया और मेजर नवदीप को वीर चक्र दिया गया।  



हवलदार जोगिंदर सिंह को मिला वीर चक्र
हवलदार जोगिंदर सिंह मूल रूप से कुमाऊं रेजिमेंट से थे और ऑपरेशन विजय के दौरान 27 राजपूत बटालियन के साथ जुड़े थे। उन्होंने सब-सेक्टर वेस्ट और करचन ग्लेशियर की बर्फीली ऊंचाइयों पर लड़ाई लड़ी, जिसे बाद में कैप्टन हनीफ उद्दीन की याद में सब-सेक्टर हनीफ नाम दिया गया। हवलदार जोगिंदर सिंह ने कठिन हालात में दुश्मन का सामना करते हुए अदम्य साहस और अनुकरणीय लड़ाई की भावना का परिचय दिया और उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। 3 एनएलआई के कैप्टन तैमूर मलिक और अन्य पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को करगिल में लाया गया और उन्हें सौंप दिया गया।  

दादा-दादी ने भारतीय रक्षा अताशे से किया अनुरोध
पूर्व सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) वीपी मलिक बताते हैं कि युद्ध खत्म होने के बाद अगस्त में उन्हें लंदन स्थित रक्षा अताशे (डीए) से एक पत्र मिला, जिसमें करगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए युवा पाकिस्तानी सैनिक कैप्टन तैमूर मलिक के दादा-दादी ने अनुरोध किया था कि उनका शव उन्हें सौंप दिया जाए। कैप्टन तैमूर मलिक के पिता भी पाकिस्तान आर्मी से बतौर कर्नल रिटायर हुए थे। उनके दादा और दादी उन दिनों ब्रिटेन में रह रहे थे। वह बताते हैं कि मैं उनके दादा से कभी नहीं मिला। मुझे केवल डीए के माध्यम से उनका संदेश मिला। 

पाकिस्तान ने दिया तमगा-ए-बसालत अवॉर्ड
जनरल मलिक बताते हैं कि उन्होंने सद्भावना के तौर पर अपने जवानों से जरूरी काम करने को कहा। युवा तैमूर और अन्य शवों को कब्रों से निकाला गया। कैप्टन तैमूर मलिक सहित सभी शवों को 25 अगस्त की शाम को करगिल सेक्टर में पोस्ट 43 पर सैन्य सम्मान के साथ पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को सौंप दिया गया। मुजफ्फराबाद में जन्मे कैप्टन तैमूर मलिक 1996 में कमीशंड हुए थे। जब उनकी मौत हुई, तब वे मात्र 23 साल के थे। कैप्टन तैमूर मलिक को पाकिस्तानी फौज ने तमगा-ए-बसालत (बहादुरी का पदक) दिया और उन्हें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में उनके पैतृक इलाके में फिर से सुपुर्द ए खाक किया गया। उस समय पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस रहे लेफ्टिनेंट जनरल जिया ने सियाचिन के दक्षिण में प्वाइंट 5770 पर मारे गए पांच पाकिस्तानी सैनिकों के शवों को खोदकर वापस लाने के लिए सेना का आभार जताया था। 


लगभग दो महीने चले करगिल संघर्ष में 41 अधिकारियों सहित 696 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। करगिल में सैनिकों ने 249 पाकिस्तानी नियमित सैनिकों के शव बरामद किए, जिनमें से अधिकांश नॉर्दन लाइट इन्फैंट्री के थे। इनमें से 244 को इस्लामी रीति-रिवाज के अनुसार सैन्य सम्मान के साथ दफनाया गया था।

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