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स्मृति शेषः 2014 में कल्याण सिंह ने ही मोदी को बताया था यूपी जीतने का फॉर्मूला, 73 सीटें जीत भाजपा ने रचा था इतिहास

Sun, 22 Aug 2021 08:56 AM IST
Amit Sharma अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Sharma Updated Sun, 22 Aug 2021 08:56 AM IST
सार

कल्याण सिंह के फॉर्मूले पर चलकर ही नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश और बिहार के मतदाताओं को अपने साथ जोड़ा और अद्भुत सफलता हासिल की।

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Kalyan Singh formula to win UP Narendra modi In 2014 loksabha election
kalyan singh with pm modi (फाइल फोटो) - फोटो : ani

विस्तार

वर्ष 2014 के आम चुनाव के समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। इस चुनाव में जब भाजपा ने उन्हें पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश का दिल जीतने की थी। नरेंद्र मोदी जानते थे कि यूपी का किला जीते बिना प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना कठिन काम था। ऐसे समय में नरेंद्र मोदी को कल्याण सिंह की याद आई। उन्होंने लोधी समाज के इस नेता से करीब तीन घंटे तक मुलाकात की और यूपी जीतने का मंत्र लिया। कहा जाता है कि कल्याण सिंह के फॉर्मूले पर चलकर ही अमित शाह ने 'मिशन यूपी' चलाया जिसके बाद भाजपा ने प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया।

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जनता दल (यूनाइटेड) के नेता केसी त्यागी ने अमर उजाला को बताया कि नरेंद्र मोदी और कल्याण सिंह के बीच हुई यह मुलाकात कई मायनों में ऐतिहासिक थी। कल्याण सिंह पिछड़े समुदाय के नेता थे। यूपी की राजनीति में मुलायम सिंह के बाद वे दूसरे नेता थे जो जमीनी राजनीति करते हुए अपने दम पर सत्ता के शिखर तक पहुंचे थे। वे अच्छी तरह जानते थे कि पिछड़े समुदाय को साथ लिए बिना यूपी या देश की सत्ता के शिखर तक कभी नहीं पहुंचा जा सकता। वे इसके पहले राममंदिर आंदोलन में पिछड़े समुदाय को अपने साथ लाने का करिश्मा कर चुके थे।
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पिछड़ी जातियों की राजनीति की नब्ज समझने वाले इस महान नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री) को हिंदी पट्टी की जनता का दिल जीतने का गुण सिखाया। उन्होंने प्रधानमंत्री को यह भी बताया कि पिछड़ी जातियों को साथ लेकर वे कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ सकते हैं। कल्याण सिंह के फॉर्मूले पर चलकर ही भाजपा ने यूपी की 80 में से 73 सीटें (दो सीटें सहयोगी अपना दल के साथ) जीतीं और भारतीय राजनीति का इतिहास बदल गया।
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पिछड़ों को भाजपा से जोड़ा
1991 के पूर्व भी राममंदिर के लिए कई बार आंदोलन चलाया जा चुका था। लेकिन कई कारणों से यह आंदोलन तब भी भाजपा का राजनीतिक अभियान माना जाता था। भाजपा उस समय सवर्णों-बनियों की पार्टी के रूप में जानी जाती थी। उमा भारती जैसे पिछड़े समुदाय के कई नेता उस समय भी भाजपा की राजनीति में शिखर पर थे, लेकिन उनकी यह उपलब्धि भी पिछड़े समुदाय को बड़ी संख्या में भाजपा से जोड़ नहीं पा रही थी।

पार्टी के कुछ वर्गों तक सीमित होने से दोतरफा नुकसान हो रहा था- वोटों की राजनीति में भाजपा एक निश्चित सीमा से आगे नहीं बढ़ पा रही थी, तो दूसरा राममंदिर आंदोलन में भी वह तेजी नहीं आ पा रही थी जिसकी इसे जरूरत थी।

ऐसे समय में पार्टी के केंद्रीय नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कल्याण सिंह पर भरोसा जताया और यूपी की कमान उनके हाथों में सौंप दी। कहा जाता है कि इसके बाद ही कल्याण सिंह ने पिछड़े समुदाय में राममंदिर आंदोलन को लेकर अलख जगाई। पिछड़े समुदाय में यह संदेश गया कि भाजपा की अगुवाई उनके बीच से निकला एक व्यक्ति कर रहा है और धीरे-धीरे यूपी का पिछड़ा समुदाय भाजपा के साथ एकजुट होने लगा जो तब तक ज्यादातर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा रहता था। इसका सकारात्मक असर हुआ और भाजपा का राजनीतिक प्रभाव बढ़ने लगा तो राममंदिर आंदोलन भी ज्यादा आक्रामक होने लगा।

विध्वंस से शिखर तक
कल्याण सिंह 1992 में भाजपा के शीर्ष नेताओं में गिने जाते थे। 6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी ध्वंस की घटना घटी, कल्याण सिंह ने रामभक्तों पर कोई कड़ी कार्रवाई न करने का निर्णय लिया। इसका उन्हें राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा और उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। लेकिन माना जाता है कि सरकार के बर्खास्त होने का भाजपा और कल्याण सिंह दोनों को जबरदस्त लाभ हुआ। कल्याण सिंह भाजपा के स्टार नेताओं में बनकर उभरे और भाजपा ने तेजी से राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाई।


कल्याण सिंह की लगातार बढ़ती छवि के कारण उन्हें भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार के तौर पर भी देखा जाने लगा था। कल्याण सिंह की इस छवि के कारण पार्टी के कुछ नेता असहज महसूस करने लगे थे। आरोप लगाया जाता है कि पार्टी की राजनीति में कल्याण सिंह को जानबूझकर बदनाम किया गया और उन्हें किनारे पर लगा दिया गया। इसके बाद वे भाजपा से बाहर हुए, अपनी राजनीतिक पार्टी भी बनाई तो लोध जाति के वोटों पर उनकी पकड़ को देखते हुए भाजपा ने दुबारा उन्हें पार्टी में वापस लाया। लेकिन अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा में कल्याण सिंह हिंदुओं के बेहद लोकप्रिय नेता बनकर उभरे।

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