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अगर अपनी तकलीफें नहीं सुलझा सकते तो जनता की क्या सुलझाएंगे: जस्टिस सोढ़ी
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 14 Jan 2018 08:07 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट के सभी जज समान होते हैं, चाहे चीफ जस्टिस हो या बाकी दूसरे जज। कानूनी जानकारों की माने तो चीफ जस्टिस को यह तय करने का पूरा अधिकार है कि किसी मामले को किस पीठ केसमक्ष भेजा जाना चाहिए। लिहाजा इसे लेकर वरिष्ठ जजों को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हालांकि कुछ जानकारों का कहना है कि मामले के आवंटन को लेकर एक सिस्टम होना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट केपूर्व न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी के मुताबिक, चीफ जस्टिस को पूरा अधिकार है कि वह मामले को किस जज केभेजे। उन्होंने चार वरिष्ठतम जजों की आपत्ति को बचकाना बताया है। साथ ही उन्होंने कहा कि जनता के बीच उनकेआने से गलत संदेश गया है। आम लोगों में यह संदेश गया है कि जब वे जज होकर भी अपनी तकलीफ नहीं सुलझा सकते तो वे आम जनता को कैसे इंसाफ दिला पाएंगे।
पढ़ें- निवेश के लिए संस्थागत मध्यस्थता प्रणाली की जरूरत: चीफ जस्टिस
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जस्टिस सोढ़ी का कहना है कि चारों जजों की तकलीफ बेबुनियाद है। उन्होंने कहा कि उनका यह कहना कि लोकतंत्र खतरे में है, यह बात बेमानी है। हमारा देश बहुत मजबूत है। इन बातों से लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं हो रहा है तो उन्हें पूरी से खुलकर सामने आना चाहिए।
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दिल्ली हाईकोर्ट केपूर्व न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी के मुताबिक, चीफ जस्टिस को पूरा अधिकार है कि वह मामले को किस जज केभेजे। उन्होंने चार वरिष्ठतम जजों की आपत्ति को बचकाना बताया है। साथ ही उन्होंने कहा कि जनता के बीच उनकेआने से गलत संदेश गया है। आम लोगों में यह संदेश गया है कि जब वे जज होकर भी अपनी तकलीफ नहीं सुलझा सकते तो वे आम जनता को कैसे इंसाफ दिला पाएंगे।
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जस्टिस सोढ़ी का कहना है कि चारों जजों की तकलीफ बेबुनियाद है। उन्होंने कहा कि उनका यह कहना कि लोकतंत्र खतरे में है, यह बात बेमानी है। हमारा देश बहुत मजबूत है। इन बातों से लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उन्हें लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ ठीक नहीं हो रहा है तो उन्हें पूरी से खुलकर सामने आना चाहिए।
जनहित याचिकाओं केबंटवारे में यह ध्यान रखा जाता है
जस्टिस सोढ़ी
वहीं सुप्रीम कोर्ट केवरिष्ठ वकील संजय पारिख का कहना है कि परंपरा रही है कि मामले का आवंटन करते वक्त यह ध्यान में रखा जाता है उस मसले पर किस जज की पकड़ या तजुर्बा बेहतर है। जनहित याचिकाओं केबंटवारे में यह ध्यान रखा जाता है। लेकिन किसी जज केखास नजरिये को देखते हुए मामले को उनकेपास भेजना सही नहीं है। यह सही है कि ऐसे महत्वपूर्ण मामले में जिनका दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना हो, आमतौर पर ऐसे मामलों को चीफ जस्टिस अपने पास रखते हैं। कारण, उसमें सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि चार वरिष्ठतम जजों का यह कहना कि उन्हें नजरअंदाज करते हुए अहम मामलों को जूनियर जजों केपास भेजने पर एतराज जताना सही है। वरिष्ठ जज यह नहीं कह सकते कि उनकी समझ बाकी जजों से अधिक है और वे अधिक बुद्धिमान हैं। महत्वपर्ण व संवेदनशील मामले को ंछोड़कर बाकी में रोटेशन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। मामलों का विभाजन संतुलित होना चाहिए और उसका एक सिस्टम होना चाहिए। महत्वपूर्ण मामलों को कुछ चुनिंदा जजों के पास भेजना सही नहीं है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि चार वरिष्ठतम जजों का यह कहना कि उन्हें नजरअंदाज करते हुए अहम मामलों को जूनियर जजों केपास भेजने पर एतराज जताना सही है। वरिष्ठ जज यह नहीं कह सकते कि उनकी समझ बाकी जजों से अधिक है और वे अधिक बुद्धिमान हैं। महत्वपर्ण व संवेदनशील मामले को ंछोड़कर बाकी में रोटेशन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। मामलों का विभाजन संतुलित होना चाहिए और उसका एक सिस्टम होना चाहिए। महत्वपूर्ण मामलों को कुछ चुनिंदा जजों के पास भेजना सही नहीं है।