जुनैद हत्याकांडः लूडो खेलते-खेलते भाइयों पर टूट पड़े थे हमलावर, किसी ने दाढ़ी खींची तो किसी ने टोपी
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जुनैद और मैं (उसका भाई हाशिम) नए-नए कपडों और जूतों की खरीददारी करके दिल्ली-मथुरा ईएमयू से घर लौट रहे थे, क्योंकि ट्रेन अभी खाली थी इसलिए सदर बाजार से ट्रेन में चढ़ते ही हमें जगह भी मिल गई। हमारे साथ दो दोस्त मोहसिन व मोइन भी थे।
मथुरा-दिल्ली ईएमयू में बृहस्पतिवार रात मारे गए बल्लभगढ़ के युवक जुनैद के भाई हाशिम ने उसे पूरे घटनाक्रम को बयां करते हुए बताया कि कैसे उन तीनों भाइयों के साथ ही दो दोस्तों के साथ भी हमलावरों की भीड़ ने दरिंदगी की।
हाशिम ने बताया कि सफर थोड़ा लंबा था इसलिए हम चारों ने लूडो खेलनी शुरू कर दी। अक्सर हम ट्रेन के सफर पर लूडो खेला करते थे। जैसे-जैसे ट्रेन आगे चली भीड़ बढ़ती रही, जिसके साथ धक्का-मुक्की भी बढ़नी शुरू हो गई। इसी बीच भीड़ में से एक बुजुर्ग आए और भाई (जुनैद) से सीट मांगी। वह तुरंत खड़ा हो गया। उसकी सीट पर बैठे बुजुर्ग ने उसे मुस्करा कर देखा तो हम लोगों के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई। ये शायद उस वाक्ये के बाद की हमारी अंतिम मुस्कुराहट थी।
मुंह खोलते ही लात घूसों से पीटने लगते लोग
सवारियों से खचाखच भरी ईएमयू ओखला स्टेशन पर पहुंची तो 20-25 लोग हमारे डिब्बे में घुस आए और आते ही लोगों से धक्कामुक्की शुरू कर दी। उन्होंने जुनैद को भी धकियाना शुरू कर दिया। आने वाले खतरे से बेखबर मैंने इसका विरोध किया तो वो बदसलूकी पर उतर आए। हमारे सिर पर टोपी और दाढ़ी देख अचानक उनका पारा हाई हो चुका था।
उन्होंने हमसे गाली गलौज करते हुए हंगामा शुरू कर दिया... कोई हमें बीफ खाने वाला कह रहा था तो कोई धर्म को लेकर टिप्पणी कर रहा था। भीड़ से खचाखच भरे डिब्बे के बीच हम चारों अचानक अकेले और असहाय चुके थे..... लगा मानों पूरी भीड़ हमसे कोई दुश्मनी निकालना चाहती है। कुछ हिम्मत जुटाकर हमने इसका प्रतिरोध किया तो भीड़ के बीच से कुछ लोग बेकाबू हो गए और हाथापाई शुरू कर दी।
हमारी टोपी उतार दी गई और दाढ़ी खींचने का भी प्रयास किया गया। इससे पहले की हम कुछ सोच पाते यह देखकर अचंभे में रह गए कि जिस बुजुर्ग के लिए जुनैद ने सीट छोड़ी थी उसने सबसे पहले भाई पर हाथ छोड़ा। भीड़ में से 10-15 लोग ऐसे थे जो हमें लगातार गालियां देकर पीटे जा रहे थे। हम जैसे ही मुंह खोलने की कोशिश करते वो लात-घूसों से पीटकर हमारी जुबान चुप करा देते।
इसी बीच जुनैद ने बड़े भाई शाकिर को फोन करके बल्लभगढ़ स्टेशन पर आने के लिए कहा ताकि वह हमें बचा सके। बल्लभगढ़ स्टेशन पहुंचने तक हमलावरों का कहर जारी रहा, कभी मुझे पीटा जाता तो कभी जुनैद को।
बड़ा भाई बचाने आया तो उसे भी ट्रेन में खींच लिया
इसी बीच बल्लभगढ़ स्टेशन आया तो बाहर खड़े शाकिर को देख जुनैद ने आवाज लगाई। हम लोगों ने जैसे-तैसे डिब्बे से बाहर निकलने का प्रयास किया लेकिन हमलावरों ने हमें बाहर जाने ही नहीं दिया, यह देख शाकिर हमें लेने के लिए डिब्बे में घुसा तो उसे भी अंदर खींच लिया गया। हमलावरों को डर था कि शाकिर कुछ लोगों को अपने साथ लेकर आया है।
इसी बीच ट्रेन चल पड़ी और हम पांचों भीड़ के बीच फंस गए। इतने में हमलावरों के बीच से ही एक युवक ने चाकू निकालकर हम पर दनादन वार शुरू कर दिए। वो एक चाकू मुझे मारते तो एक जुनैद को। चाकू के हमले से जुनैद के पूरे शरीर से खून निकलने लगा था .....वह हाथ जोड़कर उनसे छोड़ने की गुहार करता रहा लेकिन उनमें से किसी का भी दिल नहीं पिघला।
कुछ देर में ही जुनैद का शरीर बेजान हो गया। तब तक शायद हमलावरों का गुस्सा भी निकल चुका था। दुख इस बात का था कि घटना के वक्त डिब्बे में से 100-150 लोग मौजूद थे लेकिन उनमें से कोई हमारी मदद के लिए नहीं आया। कुछ तो मारो-मारो कहकर हमलावरों का समर्थन कर रहे थे।
इससे उत्साहित हमलावरों ने हम तीनों भाइयों पर चाकू से खूब वार किए, हमारे बाकी दो साथियों को भी पीटा गया। असावटी स्टेशन आने पर हमलावरों ने हमें बाहर फेंक दिया और फरार हो गए। ....भाई चला गया वो शायद कभी वापस नहीं आएगा लेकिन ये दर्द भी कभी दूर नहीं होगा कि हमें बिना किसी कसूर के ऐसी खौफनाक सजा दी गई।
पुलिस ने रमेश नाम के उस हमलावर को गिरफ्तार कर लिया है जिसने मेरी सिर से टोपी उतारकर फेंक दी और दाढ़ी खींची थी। लेकिन चाकूओं से हमला करने वाला अभी भी पुलिस की गिरफ्त से दूर है।