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AI: 'इंसानों की समझ बढ़ाने में हो एआई का इस्तेमाल, पर उनकी जगह न ले...', बोले SC के जज जस्टिस सूर्यकांत

Sun, 09 Nov 2025 08:48 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 09 Nov 2025 08:48 PM IST
सार

AI: भारत के अगले चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने अनुसंधान, ट्रांसक्रिप्शन और डेटा विश्लेषण के लिए एआई आधारित उपकरणों का इस्तेमाल शुरू किया है। उन्होंने कहा कि तकनीक को हमेशा इंसान की समझ बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि उसे बदलने के लिए।

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Judiciary exploring AI-based tools but tech must augment not replace human mind: Justice Surya Kant
जस्टिस सूर्यकांत, सुप्रीम कोर्ट के जज - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्य कांत ने रविवार को कहा कि भारत में न्यायपालिका ने अनुसंधान, प्रतिलेखन (ट्रांसक्रिप्शन) और डाटा विश्लेषण के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित उपकरणों का उपयोग शुरू कर दिया है। लेकिन इसे हमेशा इस सिद्धांत के तहत होना चाहिए कि तकनीक केवल इंसान की समझ बढ़ाए, उसकी जगह न लेने की कोशिश न करे। जस्टिस कांत वाणिज्य न्यायालयों के स्थायी अंतरराष्ट्रीय मंच की छठी पूर्ण बैठक के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। 
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जस्टिस कांत ने जोर देकर कहा कि कानून का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तकनीक को बिना उस मानवीयता को खोए जो न्याय को उसका नैतिक आधार देती है, एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने आगे कहा कि एएआई न्याय सेवा में पहुंच, दक्षता और सटीक विश्लेषण में अत्यंत संभावनाएं रखता है। उन्होंने कहा कि एआई का जिम्मेदार इस्तेमाल कैसे किया जाए, इसका एक ठोस ढांचा बनाना व्यापारिक भी है और जरूरी भी है। 
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उन्होंने दोहराया, भारत में न्यायपालिका ने अनुसंधान, ट्रांसक्रिप्शन और डाटा के विश्लेषण के लिए एआई आधारित उपकरणों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। लेकिन यह हमेशा इस सिद्धांत के अनुसार होना चाहिए कि तकनीक केवल इंसान की समझ बढ़ाए, उसे बदलने की कोशिश न करे। जस्टिस कांत ने आगे कहा कि चुनौती यह तय करने की है कि किन सीमाओं का पालन किया जाए जो इंसानों के फैसले, नैतिक सोच और जवाबदेही को सुरक्षित रखे। 

 
भारत के अगले सीजेआई ने कहा, कानून आखिरकार केवल एक एल्गोरिदम नहीं है। यह मानव अंतरात्मा का प्रतिबिंब है, जिसे सहानुभूति, नैतिक सोच और संदर्भ की समझ आकार देती है, जिसे मशीनें दोहरा नहीं सकतीं। 

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उन्होंने जोर देकर कहा, क्या अपूर्ण डाटा पर प्रशिक्षित एल्गोरिदम वास्तव में निष्पक्ष न्याय प्रदान कर सकता है? जब स्वचालित (ऑटोमैटिक) प्रणाली गलती करती हैं या प्रणालीगत पूर्वाग्रह को बढ़ाती हैं तो किसे जिम्मेदारी लेनी चाहिए? जैसे-जैसे हम एआई को कानूनी प्रक्रियाओं में शामिल कर रहे हैं, हमें रुककर पूछना चाहिए- क्या हम न्याय को आगे बढ़ा रहे हैं या धीरे-धीरे इसे आउटसोर्स कर रहे हैं? कानून का भविष्य इस बात पर तय करता है कि क्या हम तकनीक का उपयोग  बिना उस मानवता को खोए एक उपकरण के रूप में कर सकते हैं, जो न्यायको उसका नैतिक आधार देता है।  

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