हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण में होगा विपक्षी एकता का सूत्रपात, एनआरसी और एनआरपी पर मिलेगा साथ
बता दें कि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों को यूपीए के तहत लाने के भरसक प्रयास हुए थे। कोलकाता की रैली में ममता बनर्जी के मंच पर करीब 22 पार्टियों के नेता मौजूद थे, लेकिन वे सभी दल चुनाव में एकजुटता नहीं दिखा सके। केंद्र में दूसरी बार मोदी सरकार बनने के बाद कुछ विपक्षी दलों ने अनुच्छेद 370 को लेकर एकता दिखाने का प्रयास किया था। उस वक्त भी सभी विपक्षी पार्टियां एक साथ नहीं आई। यहां तक कि कांग्रेस पार्टी के भीतर भी अनुच्छेद 370 को लेकर विरोधी स्वर सुनाई दिए थे।
मोदी सरकार ने संसद में जिस तरह एक के बाद एक बिल पास कराए, उससे विपक्षी एकता में बिखराव नजर आने लगा। खासतौर पर, ट्रिपल तलाक, सीएबी, अनुच्छेद 370 खत्म करना, एनआईए संशोधन एक्ट 2019, गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) विधेयक और आर्म्स अमेंडमेंट बिल सहित दर्जनों बिल पास करा लिए। लोकसभा में तो भाजपा ने आसानी से सारे बिलों को पास करा लिया। कई अहम बिलों पर जब राज्यसभा में वोटिंग हुई, तो वहां भी आसानी से वे बिल पास हो गए।
नागरिकता (संशोधन) कानून के बाद विपक्षी पार्टियों ने देश के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन यहां भी सभी विपक्षी दल एकजुट नहीं हो सके। दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय में हुई पुलिसिया कार्रवाई के बाद जब विपक्षी नेताओं ने कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में प्रेसवार्ता की तो वहां छह-सात दलों के नेता मौजूद थे। यहां पर भी विपक्ष एक साथ खड़ा नजर नहीं आया।
रांची से होगी शुरुआत
एनआरसी, सीएए और एनआरपी के खिलाफ जिस तरह से विपक्षी दल एकजुटता दिखा रहे हैं, उसकी बानगी रांची में देखने को मिलेगी। इस बार यहां पर ममता बनर्जी और उनके कई वरिष्ठ नेता भी पहुंच रहे हैं। पश्चिम बंगाल में सीएए के मुद्दे पर जहां भाजपा विशेष रणनीति बना रही है, वहीं ममता चाहती हैं कि इस मसले पर कांग्रेस एवं दूसरे दलों का साथ उन्हें मिल जाए। ममता जानती हैं कि सीएए और एनपीआर जैसे मुद्दों पर अगर वे अकेले भाजपा के खिलाफ मैदान में उतरती हैं, तो वह ज्यादा मजबूती से विरोध नहीं कर सकेंगी। यही वजह है कि वे विपक्ष को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती हैं।