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झारखंड के चुनाव नतीजे से कांग्रेस के नेता गदगद, क्या सोनिया गांधी के पास कोई जादू है?

Mon, 23 Dec 2019 08:15 PM IST
संदीप भट्ट शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Mon, 23 Dec 2019 08:15 PM IST
सार

  • महाराष्ट्र में सरकार, सोनिया के सूझबूझ की देन
  • पार्टी के भीतर एक सुर लाने में सफ
  • राहुल बनाम सोनिया की बहस ते

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jharkhand election results is it impact of sonia gandhi magic

विस्तार

झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे ने कांग्रेस नेताओं को न केवल उम्मीद से भर दिया है, बल्कि उनकी छाती फूलने लगी है। राज्य में गठबंधन की सरकार और 25 सीटों के आस-पास सिमटती भाजपा ने कांग्रेस के भीतर सोनिया गांधी बनाम राहुल गांधी की बहस छेड़ दी है। पार्टी के एक पुराने महासचिव का कहना है कि मौजूदा दौर में बस एक बदलाव आया है। आप पार्टी के किसी निर्णय से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह से गलत नहीं ठहरा सकते। सूत्र का कहना है कि जब से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा है, इसी मानदंड को बनाए रखा है। उनके हर निर्णय का थोड़ा कमजोर ही सही लेकिन तार्कि क कारण होता है, क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष बिना व्यापक होमवर्क के कोई निर्णय नहीं लेती।
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महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार

महाराष्ट्र के एक पूर्व मुख्यमंत्री की सुनिए। सूत्र का कहना है कि राज्य में चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी को कोई खास उम्मीद नहीं थी। हमारे अपने ही नेता कांग्रेस पार्टी को गिरते मनोबल के कारण छोड़ रहे थे, लेकिन अब वह बात नहीं है। माहौल बदल गया है। महाराष्ट्र चुनाव के बाद सरकार बनने की कोई भी उम्मीद नहीं थी, लेकिन महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री हैं और कांग्रेस राज्य में साझीदार तीसरा दल है। सूत्र का कहना है कि महाराष्ट्र में यदि शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस की सरकार सत्ता में है तो इसका एक बड़ा श्रेय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा लिए गए कुछ निर्णय हैं।
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मैडम से युवा निराश नहीं, लेकिन राहुल गांधी वाला उत्साह भी नहीं

राहुल गांधी के टीम की महिला सदस्य हैं। फायर ब्रांड कांग्रेस नेता हैं। मुद्दों की जोरदार समझ रखती हैं। सूत्र का कहना है कि मैडम(सोनिया गांधी) से कांग्रेस के युवा नेता निराश नहीं हैं। वह पार्टी के साथ बने हैं, लेकिन उनके भीतर राहुल गांधी के अध्यक्ष रहने के दौरान वाला उत्साह नहीं है। सूत्र का कहना है कि राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को युवा बनाने में लगातार लगे हुए थे। वह एनएसयूआई और युवक कांग्रेस से तथा तमाम क्षेत्र से युवा नेताओं को पार्टी में लाए थे। उन्हें लगातार कुछ करते रहने के लिए प्रेरित करते थे। यही वजह है कि राहुल गांधी के हर दौरे में युवा नेता बड़ी संख्या में हिस्सा लेते हैं। महिला नेता और पूर्व सांसद का कहना है कि अभी भी राहुल गांधी युवा नेताओं के लगातार संपर्क में रहते हैं, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का पद होने के कारण अलग बात थी।

क्या सोनिया गांधी के पास जादू है?

कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी में फर्क है। यह आगे भी रहेगा। सोनिया गांधी ने राजनीति में ही कई बसंत देखे हैं, इसलिए वह पूरी परिपक्वता दिखाती हैं। राहुल गांधी युवा है, उनमें जोश दिखाई देता है। यह फर्क दोनों के बयान, वक्तव्य में भी साफ दिखाई देता है। पार्टी की कोर कमेटी के सदस्य रहे एक अन्य नेता का कहना है कि सोनिया गांधी बिना अच्छे होमवर्क के निर्णय नहीं लेती। उन्हें बात पूरी तरह से समझ में आनी चाहिए। सूत्र का कहना है कि राहुल गांधी के मामले में वह ज्यादा कुछ नहीं जानते। इसलिए नहीं कह सकते। पार्टी के राजस्थान के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कई महीने तक जिद पर अड़े रहे और अंतत: अध्यक्ष पद को नहीं स्वीकार किया। इसका निश्चित रूप से राहुल गांधी की छवि और पार्टी के लिए नुकसान हुआ। पिछले कई साल तक कांग्रेस अध्यक्ष के साथ काम करने के बाद कह सकता हूं कि सोनिया गांधी इस तरह का निर्णय नहीं ले सकती। बस यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी अपने परंपरागत तरीके से आगे बढ़ रही है।

कोई भ्रम नहीं : युवा और वरिष्ठ का टंटा खत्म

उ.प्र. से कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता हैं। सूत्र का कहना है कि आने वाले समय में राहुल गांधी ही पार्टी की कमान संभालेंगे। उम्मीद है कि उन्होंने इस दौरान बहुत कुछ सीखा है। सूत्र का कहना है कि राहुल गांधी उनकी कोटरी के कुछ नेतओं ने केवल युवा कांग्रेस का नेता बना दिया था। पार्टी का राजनीति को समझने वाला वरिष्ठ नेता खुद को हाशिए पर समझ रहा था। जबकि यहां पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष को समन्वय बिठाना चाहिए था। पार्टी के रणनीतिकारों में रहे सूत्र का कहना है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यदि यह समन्वय बिठाने में सफल रहे होते तो आज देश की राजनीति का मानचित्र काफी बदला होता। फिलहाल देर आए, दुरुस्त आए। अब उस बदलाव का असर साफ दिखाई दे रहा है।

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