{"_id":"681e89353e39d8b679001d13","slug":"it-is-not-the-court-s-job-to-ask-the-media-to-remove-news-supreme-court-news-in-hindi-2025-05-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Supreme Court: 'मीडिया को खबर हटाने को कहना कोर्ट का काम नहीं', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Supreme Court: 'मीडिया को खबर हटाने को कहना कोर्ट का काम नहीं', सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
Sat, 10 May 2025 04:31 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Sat, 10 May 2025 04:31 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने एएनआई मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि अदालतें मीडिया से उसकी खबरें हटाने को नहीं कह सकतीं। अदालतें जनता के लिए खुली होती हैं और न्यायिक कार्यवाही पर बहस हो सकती है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : PTI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मीडिया को उसकी सामग्री या खबर हटाने के लिए कहना अदालतों का काम नहीं है। शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ न्यूज एजेंसी एएनआई के मामले से जुड़े विकिपीडिया पेज को हटाने का निर्देश देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। मामले में जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने इस सिद्धांत को दोहराया कि अदालतें जनता के लिए खुली संस्थाएं हैं। न्यायिक कार्यवाही के बारे में मीडिया रिपोर्टिंग पर हल्के ढंग से अंकुश नहीं लगाया जा सकता।
पीठ ने कहा कि एक सार्वजनिक संस्था के रूप में अदालतों को हमेशा जनता के लिए खुला रहना चाहिए और जो मुद्दे विचाराधीन हैं, उन पर जनता और प्रेस में बहस की जा सकती है। न्यायालय का यह कर्तव्य नहीं है कि वह मीडिया को कहे कि इसे हटाओ और उसे हटाओ। एएनएआई ने विकिपीडिया के स्वामित्व वाली विकिमीडिया फाउंडेशन पर आरोप लगाया था कि उसके पेज न्यूज एजेंसी के एक मामले के संदर्भ में दी गई जानकारी अपमानजनक है और अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप के समान है।
ये भी पढ़ें:- India-Pakistan Tension: 'आतंक फंडिंग में हो सकता है इस्तेमाल', पाकिस्तान को कर्ज देने पर भारत ने IMF को चेताया
विज्ञापन
न्यायपालिका मीडिया दोनों लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभ
जस्टिस भुइयां ने कहा, न्यायपालिका और मीडिया दोनों ही लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभ हैं, जो संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। उदार लोकतंत्र के लिए, दोनों को एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए। किसी भी व्यवस्था में सुधार के लिए, जिसमें जिम्मेदार भी शामिल है, आत्मनिरीक्षण महत्वपूर्ण है। यह तब हो सकता है जब न्यायालय के मौजूदा विद्वानों पर भी बहस हो।
ये भी पढ़ें:- Tension: पाकिस्तान का नापाक प्लान, अभी तक नहीं बंद किया हवाई क्षेत्र; लाहौर के पास देखे गए दो नागरिक विमान
जज आलोचनाओं का जवाब नहीं दे सकते
इसके साथ ही पीठ ने कहा, हालांकि आलोचना करने वालों को याद रखना चाहिए कि जज ऐसी आलोचना का जवाब नहीं दे सकते। लेकिन अगर कोई प्रकाशन न्यायालय या जजों बदनाम करता है और अगर अवमानना का मामला बनता है, तो निश्चित रूप से अदालत को कार्रवाई करनी चाहिए।
विज्ञापन
पीठ ने कहा कि एक सार्वजनिक संस्था के रूप में अदालतों को हमेशा जनता के लिए खुला रहना चाहिए और जो मुद्दे विचाराधीन हैं, उन पर जनता और प्रेस में बहस की जा सकती है। न्यायालय का यह कर्तव्य नहीं है कि वह मीडिया को कहे कि इसे हटाओ और उसे हटाओ। एएनएआई ने विकिपीडिया के स्वामित्व वाली विकिमीडिया फाउंडेशन पर आरोप लगाया था कि उसके पेज न्यूज एजेंसी के एक मामले के संदर्भ में दी गई जानकारी अपमानजनक है और अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप के समान है।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें:- India-Pakistan Tension: 'आतंक फंडिंग में हो सकता है इस्तेमाल', पाकिस्तान को कर्ज देने पर भारत ने IMF को चेताया
विज्ञापन
न्यायपालिका मीडिया दोनों लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभ
जस्टिस भुइयां ने कहा, न्यायपालिका और मीडिया दोनों ही लोकतंत्र के आधारभूत स्तंभ हैं, जो संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। उदार लोकतंत्र के लिए, दोनों को एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए। किसी भी व्यवस्था में सुधार के लिए, जिसमें जिम्मेदार भी शामिल है, आत्मनिरीक्षण महत्वपूर्ण है। यह तब हो सकता है जब न्यायालय के मौजूदा विद्वानों पर भी बहस हो।
ये भी पढ़ें:- Tension: पाकिस्तान का नापाक प्लान, अभी तक नहीं बंद किया हवाई क्षेत्र; लाहौर के पास देखे गए दो नागरिक विमान
जज आलोचनाओं का जवाब नहीं दे सकते
इसके साथ ही पीठ ने कहा, हालांकि आलोचना करने वालों को याद रखना चाहिए कि जज ऐसी आलोचना का जवाब नहीं दे सकते। लेकिन अगर कोई प्रकाशन न्यायालय या जजों बदनाम करता है और अगर अवमानना का मामला बनता है, तो निश्चित रूप से अदालत को कार्रवाई करनी चाहिए।