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इसरो का स्पष्टीकरण: न होगा निजीकरण, न घटेगी अहमियत; निजी कंपनियों की बढ़ेगी भागीदारी, क्या है इसका उद्देश्य?
Sun, 06 Sep 2026 11:35 PM IST
पवन पांडेय
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Sun, 06 Sep 2026 11:35 PM IST
सार
इसरो ने साफ किया है कि उसका न तो निजीकरण होगा और न ही उसकी अहमियत कम की जाएगी। निजी कंपनियों को परिपक्व और नियमित रूप से बनने वाली तकनीकों, लॉन्च व्हीकल और उपग्रहों के उत्पादन में ज्यादा भूमिका दी जाएगी, जबकि इसरो अपना ध्यान अत्याधुनिक रिसर्च, मानव अंतरिक्ष मिशन, चंद्रमा और ग्रहों की खोज, नई पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम और रणनीतिक क्षमताओं पर लगाएगा।
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इसरो का स्पष्टीकरण
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रविवार को साफ किया कि उसका न तो निजीकरण किया जाएगा और न ही अंतरिक्ष क्षेत्र में उसकी भूमिका या अहमियत कम की जाएगी। इसरो ने कहा कि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने का उद्देश्य संगठन की भूमिका को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे भविष्य की अत्याधुनिक अंतरिक्ष तकनीकों और बड़े मिशनों पर ज्यादा ध्यान देने का मौका देना है। इसरो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि निजी कंपनियों के अंतरिक्ष क्षेत्र में आने से इसरो अपना ध्यान भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की अगली पीढ़ी की तकनीकों पर केंद्रित कर सकेगा। वहीं, निजी उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां पहले से विकसित और नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाली तकनीकों का बड़े स्तर पर उत्पादन कर सकेंगी। यह स्पष्टीकरण इसरो के कर्मचारियों से जुड़े नौ संगठनों की ओर से उठाई गई चिंताओं के बाद आया है। इन संगठनों ने 4 सितंबर को इसरो के चेयरमैन वी. नारायणन को पत्र लिखकर संगठन के निर्माण और संचालन से जुड़े काम निजी कंपनियों को सौंपे जाने की खबरों पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट करने की मांग की थी।
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निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने पर उठे सवाल
कर्मचारी संगठनों ने IN-SPACe के चेयरपर्सन पवन गोयनका के 21 अगस्त को दिए गए बयान का हवाला दिया था। गोयनका ने कहा था कि भविष्य में इसरो लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां करेंगी। इस बयान के बाद इसरो के कर्मचारियों के बीच यह चिंता पैदा हुई कि क्या संगठन के मौजूदा निर्माण और संचालन से जुड़े काम धीरे-धीरे निजी कंपनियों को सौंपे जाएंगे। कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में कहा कि उन्हें इस बारे में सरकार या अंतरिक्ष विभाग की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि इसरो द्वारा विकसित तकनीक देश की राष्ट्रीय संपत्ति है। इसलिए ऐसी तकनीक का निजी क्षेत्र को हस्तांतरण पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से होना चाहिए। साथ ही, इसके कर्मचारियों और भविष्य में होने वाली सरकारी भर्तियों पर पड़ने वाले असर को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यह भी पढ़ें- '13-14 करोड़ नाम हटाना स्कैम': एसआईआर पर पूर्व सीईसी कुरैशी का बड़ा दावा, और क्या-क्या कहा?
इसरो का फोकस अब अत्याधुनिक तकनीकों पर होगा
इसरो ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि उसकी भूमिका भविष्य में उन क्षेत्रों में और मजबूत होगी, जहां उसकी वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञता सबसे ज्यादा जरूरी है। इनमें फ्रंटियर रिसर्च एंड डेवलपमेंट, अत्याधुनिक तकनीक, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम, डीप-स्पेस और ग्रहों से जुड़े मिशन तथा देश की रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताएं शामिल हैं। इसरो ने कहा कि वह संचार, नेविगेशन और पृथ्वी की निगरानी के लिए अत्याधुनिक पेलोड, सेंसर, प्रणोदन प्रणाली और दूसरी महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास जारी रखेगा। वहीं, जो तकनीक पूरी तरह विकसित हो चुकी है और जिसका नियमित उत्पादन किया जाता है, उसे बड़े स्तर पर बनाने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को दी जा सकती है। इसमें लॉन्च व्हीकल, नियमित उपग्रह और अन्य स्थापित अंतरिक्ष प्रणालियों का उत्पादन शामिल है। यह काम उचित और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा।
इससे इसरो को क्या फायदा होगा?
इसरो का कहना है कि नियमित उत्पादन का काम उद्योग को मिलने से संगठन के वैज्ञानिकों और संसाधनों का इस्तेमाल भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों और मिशनों पर किया जा सकेगा। इनमें 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस) स्थापित करना, 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने का लक्ष्य, नई पीढ़ी के और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले लॉन्च सिस्टम विकसित करना तथा चंद्रमा और दूसरे ग्रहों की लगातार खोज जैसे बड़े लक्ष्य शामिल हैं। इसरो का लक्ष्य भारत को दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों में शामिल करना भी है।
पवन गोयनका ने भी दी सफाई
IN-SPACe के चेयरपर्सन पवन गोयनका ने रविवार को एक्स पर कई पोस्ट के जरिए स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि इसरो की अहमियत किसी भी तरह कम नहीं हो रही है और वह भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की बुनियाद बना रहेगा। गोयनका ने कहा कि 2020 के बाद किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों का उद्देश्य भारत के पूरे स्पेस इकोसिस्टम को मजबूत करना है। इसके तहत निजी कंपनियों को धीरे-धीरे विकसित और परिपक्व तकनीकों वाले लॉन्च व्हीकल, उपग्रह और दूसरी प्रणालियों का उत्पादन बड़े स्तर पर करने का अवसर दिया जाएगा। उनके मुताबिक इसरो का मुख्य ध्यान उन्नत रिसर्च, वैज्ञानिक मिशन, रणनीतिक मिशन, नई तकनीकों और ऐसी जटिल बुनियादी सुविधाओं पर रहेगा, जिन्हें निजी क्षेत्र अपने दम पर विकसित करने में सक्षम नहीं है। गोयनका ने यह भी कहा कि 2030 तक भारत को हर साल 50 लॉन्च के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए इसरो और निजी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। उनके अनुसार इतना बड़ा लक्ष्य अकेली किसी एक संस्था के दम पर हासिल नहीं किया जा सकता।
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Clarification regarding media reports on concerns relating to Space Sector Reforms and the role of ISRO
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ISRO’s Next Chapter: Leading India’s National Space Ecosystem
There has been considerable reporting in parts of the media around the future role of ISRO including speculations…— ISRO (@isro) September 6, 2026
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निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने पर उठे सवाल
कर्मचारी संगठनों ने IN-SPACe के चेयरपर्सन पवन गोयनका के 21 अगस्त को दिए गए बयान का हवाला दिया था। गोयनका ने कहा था कि भविष्य में इसरो लॉन्च व्हीकल का निर्माण नहीं करेगा और यह काम निजी क्षेत्र या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां करेंगी। इस बयान के बाद इसरो के कर्मचारियों के बीच यह चिंता पैदा हुई कि क्या संगठन के मौजूदा निर्माण और संचालन से जुड़े काम धीरे-धीरे निजी कंपनियों को सौंपे जाएंगे। कर्मचारी संगठनों ने अपने पत्र में कहा कि उन्हें इस बारे में सरकार या अंतरिक्ष विभाग की ओर से कोई स्पष्ट आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि इसरो द्वारा विकसित तकनीक देश की राष्ट्रीय संपत्ति है। इसलिए ऐसी तकनीक का निजी क्षेत्र को हस्तांतरण पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से होना चाहिए। साथ ही, इसके कर्मचारियों और भविष्य में होने वाली सरकारी भर्तियों पर पड़ने वाले असर को भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
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इसरो का फोकस अब अत्याधुनिक तकनीकों पर होगा
इसरो ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि उसकी भूमिका भविष्य में उन क्षेत्रों में और मजबूत होगी, जहां उसकी वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञता सबसे ज्यादा जरूरी है। इनमें फ्रंटियर रिसर्च एंड डेवलपमेंट, अत्याधुनिक तकनीक, मानव अंतरिक्ष उड़ान, अगली पीढ़ी के लॉन्च सिस्टम, डीप-स्पेस और ग्रहों से जुड़े मिशन तथा देश की रणनीतिक अंतरिक्ष क्षमताएं शामिल हैं। इसरो ने कहा कि वह संचार, नेविगेशन और पृथ्वी की निगरानी के लिए अत्याधुनिक पेलोड, सेंसर, प्रणोदन प्रणाली और दूसरी महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास जारी रखेगा। वहीं, जो तकनीक पूरी तरह विकसित हो चुकी है और जिसका नियमित उत्पादन किया जाता है, उसे बड़े स्तर पर बनाने की जिम्मेदारी धीरे-धीरे उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को दी जा सकती है। इसमें लॉन्च व्हीकल, नियमित उपग्रह और अन्य स्थापित अंतरिक्ष प्रणालियों का उत्पादन शामिल है। यह काम उचित और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा।
इससे इसरो को क्या फायदा होगा?
इसरो का कहना है कि नियमित उत्पादन का काम उद्योग को मिलने से संगठन के वैज्ञानिकों और संसाधनों का इस्तेमाल भविष्य की महत्वपूर्ण तकनीकों और मिशनों पर किया जा सकेगा। इनमें 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस) स्थापित करना, 2040 तक भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने का लक्ष्य, नई पीढ़ी के और दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले लॉन्च सिस्टम विकसित करना तथा चंद्रमा और दूसरे ग्रहों की लगातार खोज जैसे बड़े लक्ष्य शामिल हैं। इसरो का लक्ष्य भारत को दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों में शामिल करना भी है।
पवन गोयनका ने भी दी सफाई
IN-SPACe के चेयरपर्सन पवन गोयनका ने रविवार को एक्स पर कई पोस्ट के जरिए स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि इसरो की अहमियत किसी भी तरह कम नहीं हो रही है और वह भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की बुनियाद बना रहेगा। गोयनका ने कहा कि 2020 के बाद किए गए अंतरिक्ष क्षेत्र के सुधारों का उद्देश्य भारत के पूरे स्पेस इकोसिस्टम को मजबूत करना है। इसके तहत निजी कंपनियों को धीरे-धीरे विकसित और परिपक्व तकनीकों वाले लॉन्च व्हीकल, उपग्रह और दूसरी प्रणालियों का उत्पादन बड़े स्तर पर करने का अवसर दिया जाएगा। उनके मुताबिक इसरो का मुख्य ध्यान उन्नत रिसर्च, वैज्ञानिक मिशन, रणनीतिक मिशन, नई तकनीकों और ऐसी जटिल बुनियादी सुविधाओं पर रहेगा, जिन्हें निजी क्षेत्र अपने दम पर विकसित करने में सक्षम नहीं है। गोयनका ने यह भी कहा कि 2030 तक भारत को हर साल 50 लॉन्च के लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए इसरो और निजी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। उनके अनुसार इतना बड़ा लक्ष्य अकेली किसी एक संस्था के दम पर हासिल नहीं किया जा सकता।