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अध्ययन: फोलिक एसिड से भरपूर जल पालक लिवर के लिए भी फायदेमंद, दावा- अवसाद, स्ट्रोक को कम करने में भी कारगर
Thu, 12 Sep 2024 05:37 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Thu, 12 Sep 2024 05:37 AM IST
सार
ताइवान स्थित शोध संगठन वर्ल्ड वेजिटेबल सेंटर के अनुसार फोलिक एसिड इस सब्जी में मौजूद कई पोषक तत्वों में से सिर्फ एक है। इस पौधे में बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, विटामिन ई और आयरन का मध्यम स्तर और एस्कॉर्बिक एसिड का मध्यम से उच्च स्तर भी होता है।
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लिवर
- फोटो : istock
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विस्तार
एक रक्त परीक्षण में पाया गया कि फोलिक एसिड का स्तर बढ़ाने के लिए जल पालक (इपोमोआ एक्वाटिका) बेहद फायदेमंद है। यह एक हरी पत्तेदार सब्जी है जो कॉन्वोल्वुलेसी परिवार से संबंधित है। इसे इसके तुरही के आकार के फूलों से पहचाना जाता है। उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला यह अर्ध-जलीय बारहमासी पौधा है। इसे सबसे पहले दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया गया था।
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ताइवान स्थित शोध संगठन वर्ल्ड वेजिटेबल सेंटर के अनुसार फोलिक एसिड इस सब्जी में मौजूद कई पोषक तत्वों में से सिर्फ एक है। इस पौधे में बीटा कैरोटीन, कैल्शियम, विटामिन ई और आयरन का मध्यम स्तर और एस्कॉर्बिक एसिड का मध्यम से उच्च स्तर भी होता है। हालांकि पत्तेदार सब्जियां, भिंडी, बीन्स, खमीर, मशरूम, संतरे का रस, टमाटर का रस, जानवरों का जिगर और गुर्दे प्राकृतिक रूप से फोलिक एसिड से भरपूर होते हैं जो विटामिन बी9 का एक रूप है। लेकिन जल पालक इन सबसे एक कदम आगे है। वर्ल्ड वेजिटेबल सेंटर के अनुसार मलेशिया, चीन, हांगकांग, सिंगापुर और इंडोनेशिया जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में यह पौधा ज्यादातर व्यावसायिक रूप से उगाया जाता है। जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत में यह जंगली घास के रूप में उगता है। भारत में यह धान के खेतों, तालाबों और नदियों के किनारे उगता है। जुलाई से सितंबर तक मानसून के मौसम में आसानी से उपलब्ध होता है।
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इसे पश्चिम बंगाल में कलमी साग, उत्तर प्रदेश में नारी का साग, मराठी में नलिची-भाजी और तमिल में सरकारीवली के नाम से जाना जाता है। इस पौधे को उगाना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि इसे बहुत कम देखभाल की आवश्यकता होती है और यह जलमार्गों में स्वाभाविक रूप से पनपता है।
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गर्भवती महिलाओं के लिए उपयोगी
गर्भवती महिलाओं में यह सुनिश्चित करने के लिए फोलिक एसिड निर्धारित किया जाता है कि अजन्मे बच्चे को स्पाइना बिफिडा जैसे न्यूरल ट्यूब दोष से मुक्त रखा जाए। इसका उपयोग अवसाद, स्ट्रोक, याददाश्त और संज्ञानात्मक कौशल में गिरावट जैसे लक्षणों को कम करने के लिए भी किया जाता है। कई देशों में इस विटामिन को अनाज, आटा, ब्रेड, पास्ता, बेकरी आइटम और कुकीज जैसे खाद्य पदार्थों में मिलाया जाता है।
दिल की बीमारियों से करता है बचाव
फूड एंड केमिकल टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि इसकी पत्ती का अर्क एक रसायनिक दवा होने के कारण दिल और लिवर को बाहरी बीमारियों से बचा सकता है। यही कारण है कि एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करने के कारण आयुर्वेदिक चिकित्सक पीलिया के रोगियों को इस पौधे को खाने की सलाह देते हैं।
आयुष चिकित्सा से नियंत्रित कर सकते हैं एनीमिया
आयुष चिकित्सा के जरिए एनीमिया की रोकथाम संभव है। सिद्धा चिकित्सा पद्धति की दो दवाओं के मिश्रण से बालिकाओं में हीमोग्लोबिन के स्तर में सुधार लाया जा सकता है। केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अधीन नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ सिद्धा के अलावा जेवियर रिसर्च फाउंडेशन और वेलुमैलु सिद्धा मेडिकल व हॉस्पिटल के शोधकर्ताओं का संयुक्त अध्ययन इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में 2,648 बालिकाओं को शामिल किया। इनमें से 2,300 बालिकाओं को एपेपेटिसेन्टुरम, बावन कतुक्कय, मातुसाई मणप्पाकु और नेल्लिक्कय लेकियम नामक दवाओं का मिश्रण दिया गया। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ सिद्धा की निदेशक डॉ. आर. मीनाकुमारी ने बताया कि जांच में देखा गया कि निर्धारित 45 दिन का उपचार लेने वाली लड़कियों के हीमोग्लोबिन के स्तर में तेजी से बदलाव आया।
थकावट, सिरदर्द में भी हुआ फायदा
शोधकर्ताओं ने पाया कि मिश्रित दवाओं के उपचार से बालिकाओं में एनीमिया के क्लीनिकल फीचर्स जैसे थकावट, बालों का झड़ना, सिरदर्द, रुचि की कमी और मासिक धर्म की अनियमितता में काफी हद कमी आई है और सभी एनीमिक किशोर बालिकाओं में हीमोग्लोबिन, पीसीवी, एमसीवी, और एमसीएच के स्तर में सुधार हुआ है।