सीमा पर चौकसी की बजाय अफसरों के घरों में हाजिरी लगा रहे हैं बीएसएफ जवान, दिल्ली में ले रहे हैं हार्डशिप अलाउंस!
बीएसएफ के सूत्रों का कहना है कि बल में करीब 4,500 अफसर हैं। कमांडेंट से लेकर डीजी तक के अधिकांश अफसर कम से कम तीन और ज्यादा से ज्यादा 7-8 सिपाही अपने पास रखते हैं...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
इससे सरकार को आर्थिक नुकसान हो रहा है। खास बात है कि सातवें वित्त आयोग की सिफारिशों में सिपाही को अफसरों के घर या उनके निजी कार्यों में लगाने पर बैन लगाया गया है। इसके बाद सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के महानिदेशकों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को लिखित में यह आश्वासन दिया था कि वे सरकारी आवासों पर बल की कार्य क्षमता का दुरुपयोग नहीं करेंगे। लेकिन मैनपावर के दुरुपयोग की कॉपी अमर उजाला डॉट कॉम के पास है।
बीएसएफ के सूत्रों का कहना है कि बल में करीब 4,500 अफसर हैं। कमांडेंट से लेकर डीजी तक के अधिकांश अफसर कम से कम तीन और ज्यादा से ज्यादा 7-8 सिपाही अपने पास रखते हैं। कई बटालियन में ऐसे आला अफसर भी हैं, जिनके परिवार दिल्ली या किसी दूसरे शहर में रह रहे हैं।
ऐसे में वे खुद अपने लिए दो-तीन सिपाही रखते हैं और बाकी दो सिपाही परिवार की सेवा के लिए भेज देते हैं। इन्हें स्पेशल ड्यूटी पर दिखाकर रवाना कर दिया जाता है। कोई पूछताछ करने वाला नहीं होता। सूत्रों के अनुसार, उत्तर-पूर्व, जम्मू, पंजाब, राजस्थान, गुजरात एवं पश्चिम बंगाल स्थित बटालियनों में से अनेक सिपाही स्पेशल ड्यूटी के नाम पर किसी दूसरी जगह अटैच कर दिए गए हैं।
वहां से ये जवान उस अफसर के घर पहुंच जाते हैं। पिछले दिनों दिल्ली में रह रहे बीएसएफ से रिटायर एक डीजी के घर इस बल के चार कर्मी तैनात थे। यह भेद तब खुला, जब उन कर्मियों को कोरोना संक्रमण के चलते क्वारंटीन सेंटर भेजा गया था। उसके बाद मालूम हुआ कि दिल्ली में ऐसे अनेक मौजूदा व पूर्व अफसर हैं, जिनके आवास पर ऐसे कई सिपाही काम कर रहे है।
उत्तर-पूर्व में तैनात एक डीआईजी व दूसरे कुछ अधिकारी, जिनके परिवार दिल्ली के एंड्रयूज गंज और दूसरे इलाकों में रहते हैं, उन्होंने उत्तर-पूर्व से सिपाहियों को अपने परिवार की देखभाल के लिए भेज रखा है।
इस तरह हो रहा है सरकार को आर्थिक नुकसान
उत्तर-पूर्व या कश्मीर जैसे इलाकों में तैनात कर्मियों को स्पेशल एवं हार्डशिप अलाउंस मिलता है। वहां तैनात अधिकारी इन सिपाहियों को दिल्ली या दूसरे उस शहर में भेज देते हैं, जहां पर उनका परिवार रहता है। जैसे उत्तर-पूर्व से किसी सिपाही को दिल्ली मुख्यालय या वहां की दूसरी किसी यूनिट के साथ अटैच कर स्पेशल ड्यूटी में दिखा दिया जाता है।
चूंकि दिल्ली में एचआरए दूसरे इलाकों के मुकाबले ज्यादा मिलता है, ऐसे में उन्हें दोहरा फायदा मिल जाता है। वे हार्डशिप अलाउंस भी लेते हैं और दिल्ली का एचआरए भी उनके खाते में जाता है। यह अलग बात है कि उनका हार्डशिप ड्यूटी से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं होता, लेकिन अफसर की मेहरबानी से यह संभव हो जाता है।
दिल्ली में तैनात बीएसएफ के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ये खेल लंबे समय से चल रहा है। सीमा पर हार्ड ड्यूटी देने वालों को पूरा आराम तक नहीं मिल पा रहा है और दूसरी तरफ कुछ अफसरों ने फोर्स का मजाक बना रखा है। दिल्ली में तो कई अफसरों ने बल की गाड़ियां और ड्राइवर तक अपने परिवार के लिए उपलब्ध करा रखे हैं, जबकि वे खुद किसी दूसरे इलाके में तैनात हैं।
नॉर्थ-ईस्ट की 43वीं बटालियन से ही 60-65 कर्मी दूसरी जगह पर तैनात किए गए हैं। इनमें से कई कर्मी तो दिल्ली में हैं। दिल्ली के आरके पुरम सेक्टर-10 में रह रहे एक सीएमओ के परिवार को भी बीएसएफ के जवान बतौर सेवादार मुहैया कराए गए हैं।
ऐसी ड्यूटी देकर जवानों को रिलीव करा दिया जाता है
बल के अफसर अपने परिवार के लिए जब इन सिपाहियों को उनकी यूनिट से बाहर लाते हैं, तो उन्हें किसी नई यूनिट में या दूसरी स्पेशल ड्यूटी के लिए कहीं अटैच दिखाना पड़ता है। सिपाहियों को एमटी पूल फॉर ट्रायल बेसिस, एडम ड्यूटी, कार्यालय सहायक, सिक्योरिटी सहायक, चतुर्थ श्रेणी कर्मी है, तो उसे इलेक्ट्रिक कार्य के लिए तैनात दिखा दिया जाता है।
वेटर ड्यूटी, एक्सचेंज ड्यूटी, ट्रेड ड्यूटी, गार्ड ड्यूटी, सीएमओ का आवास, वाहन गार्ड और अन्य कई तरह की दूसरी ड्यूटी होती हैं, जिनके नाम पर सिपाहियों को उनकी मूल पोस्टिंग से हटाकर अफसरों की कोठियों पर लगा दिया जाता है। इस पर बीएसएफ के पीआरओ कृष्णा राव कहते हैं कि हमें चेक करना होगा। ऐसे मामलों में नियमों का ही अनुपालन किया जाता है। फिर भी मैं देखकर ही कुछ बता सकता हूं।