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भारत में बेहतर फसल के लिए जीन एडिटिंग का सुझाव, गाइडलाइंस पर अभी भी फैसला लेना बाकी

Mon, 02 Nov 2020 12:02 PM IST
Tanuja Yadav न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Tanuja Yadav Updated Mon, 02 Nov 2020 12:02 PM IST
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indian scientist are looking for gene editing method for improved crop final decision on guidelines yet to taken
प्रतिकात्मक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला।

देश की खेती में इस्तेमाल होने वाली तकनीकी में इतने सालों बाद अब सुधार के संकेत मिल रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिक जीन एडिटिंग की सहायता से विटामिन ए से भरपूर केला और चावल, दाल, टमाटर, बाजरा की उन्नत किस्में पैदा करेगा। 

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इस तकनीकी को व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए बिना नियामक नीति के भी इस्तेमाल किया जा सकता है। बायोटेक्नोलॉजी विभाग जीन एडिटिंग के इस्तेमाल पर विस्तृत गाइडलाइंस तैयार कर ली हैं लेकिन नियामक संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेसल कमिटी (जीईएसी) जेनेटिकली मोडिफाइड तकनीकी से यह तकनीक कितनी अलग है, इस पर मंथन कर रही है।
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इमैनुएल कारपेंटियर और जैनिफर डूडना को नोबल पुरस्करा मिला है, जिसके बाद जीन एडिटिंग प्रक्रिया फोकस में आई है। इन दोनों वैज्ञानिकों ने जीनोम एडिटिंग के लिए एक प्रणाली तैयार की थी। 
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जेनेटिकली मोडिफाइड तरीके (ट्रांसजेनिक) में विदेशी डीएन (दूसरी प्रजाति से प्रवेश) बनाया जाता है, जबकि जीन एडिटिंग में मौजूदा जीन को उचित तरीके से संशोधित किया जाता है। लेकिन जीन एडिटिंग में भी दूसरी प्रजाति से जीन प्रवेश की थोड़ी संभावना है, इसलिए नियामक संस्था को गाइडलाइंस पर आखिरी फैसला देने में समय लगेगा।

इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) के पूर्व महानिदेशक आर एस परोडा का कहना है कि कई लोग जीन एडिटिंग और जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) एडिटिंग में भ्रमित हो जाते हैं। लेकिन हमें अंतर करना सीखना होगा। उन्होंने कहा कि जीन एडिटिंग के साथ ट्रांसजेनिक की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए। इसलिए इसे जीएम खेती के नियामक के तहत नहीं लाना चाहिए।

जीन एडिटिंग की तमाम प्रणालियों के बीच, इमैनुएल कारपेंटियर और जैनिफर डूडना के द्वारा विकसित किए गए CRISPR-Cas9 सिस्टम को उचित और तेज तरीका माना गया है।

अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, चीन और ब्राजील के वैज्ञानिक CRISPR-Cas9 सिस्टम को अपनाते हैं। इससे ठीक तरीके से किसी दूसरी वेरायटी पर असर डाले बिना वांछित बदलाव प्राप्त किए जा सकते हैं।


परोडा का कहना है कि इससे नई वेरायटी जल्दी पैदा होती हैं और लागत, समय और मजदूरी भी बचती है। मोहाली में बायोटेक्नोलॉजी विभाग का राष्ट्रीय एग्री फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टिट्यूट CRISPR-Cas9 प्रणाली का केला में बदलाव लाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

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