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भारतीय वैज्ञानिकों ने तलाशा कांच के क्रिस्टल में बदलने का रहस्य

Sun, 18 Oct 2020 03:38 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Sun, 18 Oct 2020 03:38 AM IST
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Indian researchers find the secret to transformation of a glass into a crystal
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay

भारतीय वैज्ञानिकों ने कांच के क्रिस्टल में बदलने की प्रक्रिया का रहस्य जानने में सफलता हासिल कर ली है। उन्होंने पहली बार कांच से क्रिस्टल में बदलाव की पूरी प्रक्रिया की परिकल्पना की है।

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उनका कहना है कि इस खोज से तरल परमाणु कचरे के सुरक्षित निस्तारण में मदद मिल सकती है, जो हमारे पर्यावरण के लिए तेजी से बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। साथ ही दवा उद्योग में भी इस खोज से बेहद मदद मिलेगी।
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दरअसल भारतीय शोधकर्ताओं के एक दल ने इस साल भौतिक विज्ञान श्रेणी में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार विजेता प्रो. राजेश गणपति के नेतृत्व में कांच के क्रिस्टल में बदलने प्रक्रिया का अध्ययन किया है, जिसे ‘डिविट्रिफिकेशन’ कहा जाता है।
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इस टीम में केंद्रीय विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस साइंटिफिक रिसर्च के प्रो. गणपति के अलावा भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के प्रो. अजय सूद और उनकी स्नातक छात्रा दिव्या गणपति शामिल थे।

इन सभी ने मिलकर कोलाइडल कणों से बने कांच की गतिशीलता का कई दिन तक विश्लेषण किया। इस दौरान उन्होंने कांच में छिपी सूक्ष्म संरचनात्मक विशेषताओं का निर्धारण करने वाले एक पैरामीटर की पहचान की। ‘सॉफ्टनेस’ कहे गया यह पैरामीटर ही विचलन यानी डिविट्रिफिकेशन की सीमा तय करता है।

यह शोध रिपोर्ट ‘नेचर फिजिक्स’ साइंस जर्नल में प्रकाशित हो चुकी है। इसमें पाया गया कि  कांच के जिस हिस्से में सॉफ्टनेस पैरामीटर ज्यादा हावी होता है, वह हिस्सा क्रिस्टल में बदल जाता है।

दरअसल कांच एक गैर क्रिस्टलीय पदार्थ होता है, जो अक्सर पारदर्शी और बिना किसी आकार के ठोस रूप में होता है। इसके अणु क्रिस्टल की तरह एक समान ढांचे में व्यवस्थित नहीं होते। लेकिन कुछ खास हालात में पिघला हुआ कांच अपनी बनावट में आते समय डिविट्रिफिकेशन के कारण क्रिस्टल में बदल सकता है।

वैज्ञानिकों के मुताबिकख् डिविट्रिफिकेशन की इस प्रक्रिया को अब तक सही तरह समझा नहीं जा सका था, क्याेंकि इसकी रफ्तार बेहद धीमी होती है और इसे पूरा होने में कई दशक भी लग सकते हैं। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों के प्रयोग के बाद इस प्रक्रिया को समझने में बेहद मदद मिली है।


इसलिए अहम है यह शोध
डिविट्रिफिकेशन की प्रक्रिया को समझने के कारण दवा क्षेत्र में बेहद मदद मिल सकती है, जहां कई दवाओं को अक्रिस्टलीय बनाने के प्रयास जारी हैं। ऐसा होने पर दवा तेजी से शरीर में घुलेगी और जल्द असर दिखाएगी।

साथ ही तरल परमाणु कचरे को भी ठोस कांच में बदलकर जमीन में दफन किया जा सकता है, जिससे इसके रिसाव से पर्यावरण को होने वाले नुकसान का खतरा खत्म हो जाएगा।


 

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