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भारतीय सेना: बॉर्डर पर खुफिया जानकारी एकत्र करने के लिए विदेशी भाषा सीखेंगे जवान, ट्रेनिंग सेंटरों पर 709 करोड़ में से केवल 152 करोड़ हुए खर्च
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भारतीय सेना (फाइल फोटो)
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
बॉर्डर एरिया में भारतीय सेना द्वारा खुफिया जानकारी एकत्र करने और बेहतर संचार कौशल के लिए सैनिकों को विदेशी एवं स्थानीय भाषा में एक्सपर्ट बनाया जाएगा। मौजूदा समय में भारतीय सेना की निश्चित श्रेणी 'ए' प्रशिक्षण स्थापनाओं में प्रशिक्षकों या संकाय की कमी रही है। ट्रेनिंग के पाठ्यक्रम में विदेशी भाषाएं भी शामिल थी, लेकिन निर्धारित संकाय की कमी या अनुपस्थिति के कारण वे कोर्स पूरे नहीं किए जा सके। इसका असर सेना के जमीनी संचालन, सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहतर संचार और खुफिया जानकारी एकत्र करने पर पड़ा है।
भारतीय थल सेना के अधिकारियों को हाईटेक ट्रेनिंग की कुछ बातों से दूर होना पड़ा, क्योंकि युद्ध प्रयोगशालाओं एवं प्रशिक्षण अवसंरचनाओं (एमओएलटीआई) योजना के आधुनिकीकरण पर पर्याप्त धन राशि खर्च नहीं की गई। 12वीं सेना योजना (2012-17) के अंतर्गत प्रशिक्षण संस्थानों के आधुनिकीकरण के लिए 709.96 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे, लेकिन व्यवहार में केवल 152.70 करोड़ रुपये (22 प्रतिशत) ही प्रशिक्षण संस्थानों पर खर्च किए जा सके।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक द्वारा पिछले दिनों भारतीय थल सेना में अधिकारियों के चयन एवं प्रशिक्षण की निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट संसद में पेश की गई थी। उसमें यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में लिखा है, सेना में विदेशी भाषा पाठ्यक्रमों को चलाने के लिए अपेक्षित संकाय की तैनाती की जानी चाहिए। सैन्य अधिकारियों के जमीनी संचालन, सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहतर संचार और खुफिया जानकारी एकत्र करने के लिए विशेषत: सैनिकों के भाषाई कौशल को बढ़ाने की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
भारतीय थल सेना के अधिकारियों का प्रशिक्षण युद्ध लड़ने की अधिकतम तैयारी को प्राप्त करने एवं युद्ध प्रयोगशालाओं व प्रशिक्षण अवसंरचनाओं (एमओएलटीआई) योजना के आधुनिकीकरण पर महज 22 प्रतिशत राशि ही खर्च की जा सकी। रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया है कि आधुनिक युद्ध के मद्देनजर अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए तैयार रखने की महत्ता को ध्यान में रखते हुए परियोजना के समयबद्ध कार्यान्वयन की उच्चतम स्तर पर निगरानी होनी चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, सेना के महत्वपूर्ण उपकरणों एवं बुनियादी ढ़ांचे में कमी विभिन्न प्रतिष्ठानों में दिए जाने वाले प्रशिक्षण को प्रभावित करती है। इसमें बैफेल रेंज, क्लोस क्वार्टर बैटल रेंज, वर्टीकल विंड टनल, हेलीकॉप्टर्स, काम्बैट फ्री फाल पैराशूटस, मल्टी शॉट ग्रेनेड लॉचर (एमजीएलएस), अंडर बैरल ग्रेनेड लॉन्चर (यूबीजीएलएस), फ्लेम थ्रोवर्स, लेजर रेंज फाइन्डर (एलआरएफएस) स्पॉटर स्कोप, थर्मल इमेजिंग डिवाइसेस, इमेज इंटेसीफायर्स, हैंड हेल्ड थर्मल इमेजर (एचएचटीआईएस), फायरिंग रेंज ऑटमैटिक स्कोरिंग सिस्टम (एफआरएएसएस), टोटल कंटेनमेंट वैसल (टीसीवी)/रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (आरओवी), सिम्युलेटर्स, सुपर डिमोना एच के-36 टी सी एयरक्रॉफ्ट, विस्फोटक मुक्त (एफएफई) गोलाबारूद से संबंधित दृष्टांत शामिल हैं। प्रशिक्षण एवं प्रशिक्षण अवसंरचना के निर्माण के लिए उपकरण व अस्त्र-शस्त्रों की अधिप्राप्ति शीघ्र पूरी कर ली जानी चाहिए, ताकि अधिकारी जहां तक संभव हो, यर्थाथवादी परिस्थितियों में प्रशिक्षण ले सकें। अधिकारी उस वातावरण और परिस्थितियों में रहने के करीब आ सकें, जिनका वे युद्ध में सामना करेंगे।
सैन्य अधिकारियों की बेहतरी के साथ-साथ उनके सीखने के अनुभव को बढाने के लिए निश्चित प्रशिक्षण संस्थानों में उपयुक्त आवास के प्रावधान पर तत्काल कदम उठाए जाने की भी आवश्यकता थी। मंत्रालय को प्राथमिकता के आधार पर महत्वपूर्ण संस्थाओं में रिक्तियां भरने के लिए एक समयबद्ध कार्य योजना तैयार करने की आवश्यकता है।अधिकारी प्रशिक्षण अकादमी (ओटीए), 'गया' को एसएससी अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण क्षमता के वर्धन के उद्देश्य से 750 की निर्धारित क्षमता के साथ जुलाई 2011 में खोला गया था। तथापि, एसएससी अधिकारियों को ओटीए 'गया' में इसकी स्थापना के बाद से प्रशिक्षण नहीं दिया गया था। 10+2 तकनीकी प्रवेश योजना (टीईएस) एवं विशेष कमीशन अधिकारी (एससीओ) कैडेटों को जो शॉर्ट सर्विस कमीशन की श्रेणी में नहीं थे, उन्हें प्रशिक्षण प्रदान किया गया था।
लेखापरीक्षा ने आगे उल्लेख किया कि ओटीए 'गया' का उपयोग अभीष्ट उद्देश्य के लिए नहीं किया गया। साथ ही 2014-19 की अवधि में टीईएस (लगभग 34 प्रतिशत) एवं एससीओ पाठ्यक्रमों (लगभग 71 प्रतिशत) के संदर्भ में समग्र रूप से न्यून उपयोगिता भी थी। एक वर्षीय पूर्व-कमीशन प्रशिक्षण के लिए आईएमए में प्रवेश पाने से पहले सेवारत अभ्यर्थी थल सेना कैडेट कॉलेज (एसीसी) स्कंध में छः अर्धवार्षिक पाठ्यक्रमों के अंतर्गत तीन-वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में भाग लेते हैं। लेखापरीक्षा ने देखा कि कुल 505 कैडेटों में से, जो वर्ष 2014-15 से 2018-19 के दौरान एसीसी स्कंध में शामिल हुए थे, 96 कैडेट (19 प्रतिशत) पहले से ही स्नातक थे।
इस प्रकार, पहले से ही स्नातक डिग्री रखने वाले लगभग एक/पांचवें कैडेट ने सेना कैडेट कॉलेज में प्रशिक्षण अवधि के दौरान पुन स्नातक पाठ्यक्रम प्राप्त किया था। एसीसी के कैडेटों की पुनः स्नातकता निष्फल थी। इससे कैडेटों एवं प्रशिक्षण संस्थान दोनों के प्रयास एवं समय नष्ट हुए। सेना कैडेट कॉलेज के स्नातक सेवा कैडेटों को फिर से स्नातक पाठ्यक्रम उत्तीर्ण करने की आवश्यकता से छूट दी जा सकती है। उनके प्रशिक्षण मॉडयूल को तदनुसार संशोधित किया जा सकता है। भारतीय सेना के प्रशिक्षण की प्रभावशीलता में वृद्धि के लिए इकाइयों/संरचनाओं से फीडबैक को शामिल करके प्रशिक्षण प्रभावशीलता सूचकांक के उचित कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।
प्रशिक्षण स्थापनाओं की आवश्यक क्षमताओं के अनुरूप जनशक्ति और संसाधनों के प्राधिकरण की जरुरत महसूस की गई है। तथापि, विभिन्न संस्थानों के शांति स्थापना (पीई) के संशोधन में बहुत देरी हो गई थी। इसका प्रशिक्षण की समग्र गुणवत्ता पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। प्रशिक्षण संस्थानों के संबंध में शांति स्थापना (पीई) के पुनरीक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। रक्षा मंत्रालय को इस संबंध में लंबित कार्य से बचने के लिए पीई के अनुमोदन की खातिर एक समय-सीमा तय करनी होगी। यह बात सबसे महत्वपूर्ण है कि उपर्युक्त मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाए। उच्चतम स्तर पर निगरानी की जाए, ताकि भारतीय थल सेना ताकत और महत्वाकांक्षाओं से उभरते खतरों व संभावित दुश्मनों का सामना करने के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो।