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IAF: वायु सेना के सबसे बुजुर्ग फाइटर पायलट दलीप सिंह मजीठिया का निधन, 103 वर्ष की उम्र में ली आखिरी सांस

Tue, 16 Apr 2024 02:23 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र चौधरी
Updated Tue, 16 Apr 2024 02:23 PM IST
सार

दलीप सिंह मजीठिया अपने चाचा सुरजीत सिंह मजीठिया (बिक्रमजीत सिंह मजीठिया के दादा) से काफी प्रभावित थे, जो उम्र में उनसे आठ साल बड़े थे। उनके नक्शे कदम पर चलते हुए 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेने के लिए भारतीय वायुसेना में बतौर स्वयंसेवक शामिल हुए।

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Indian Air Force oldest fighter pilot Dalip Singh Majithia passes away breathed his last at the age of 103
Dalip Singh Majithia - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

भारतीय वायु सेना के सबसे बुजुर्ग फाइटर पायलट स्क्वाड्रन लीडर दलीप सिंह मजीठिया का सोमवार रात को 103 वर्ष की आयु में उत्तराखंड में निधन हो गया। 27 जुलाई 1920 को जन्मे दलीप सिंह मजीठिया का भारतीय वायु सेना ने 2020 में 100वां जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया था। अकाली दल के नेता हरसिमरत कौर और बिक्रम सिंह मजीठिया के चाचा दलीप सिंह मजीठिया का जन्म शिमला के स्किपलिन विला में हुआ था। दस साल की उम्र में, दलीप सिंह ने अमृतसर के खालसा कॉलेज में दाखिला लिया और लाहौर में कला स्नातक की पढ़ाई की। यूके में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त करने गए दलीप सिंह को घुड़सवारी का शौक था, जिसने उन्हें कैवेलरी में सेना में करियर बनाने का मौका दिया। 
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दलीप सिंह मजीठिया अपने चाचा सुरजीत सिंह मजीठिया (बिक्रमजीत सिंह मजीठिया के दादा) से काफी प्रभावित थे, जो उम्र में उनसे आठ साल बड़े थे। उनके नक्शे कदम पर चलते हुए 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लेने के लिए भारतीय वायुसेना में बतौर स्वयंसेवक शामिल हुए। उनके पिता कृपाल सिंह मजीठिया पंजाब में ब्रिटिश शासन के दौरान काफी नामीगिरामी थे। उनके दादा दादा सुंदर सिंह मजीठिया मुख्य खालसा दीवान से जुड़े थे और खालसा कॉलेज अमृतसर के संस्थापकों में से एक थे। 
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सर्वश्रेष्ठ पायलट ट्रॉफी से हुए सम्मानित
दलीप सिंह मजीठिया ने कराची फ्लाइंग क्लब में जिप्सी मोथ विमान पर उड़ान भरने की बुनियादी बारीकियां सीखीं। अगस्त 1940 में लाहौर के वाल्टन में इनिशियल ट्रेनिंग स्कूल (आईटीए) में चौथे पायलट कोर्स में शामिल हुए और तीन महीने बाद उन्हें सर्वश्रेष्ठ पायलट ट्रॉफी से सम्मानित किया गया और उन्हें आगे का प्रशिक्षण जारी रखने के लिए अंबाला के नंबर 1 फ्लाइंग ट्रेनिंग स्कूल में तैनात किया गया। हालांकि एयरफोर्स में उनका करियर मात्र साल साल का ही रहा, और अगस्त 1947 में भारत की आजादी के साथ ही रिटायर हो गए। लेकिन उनका उड़ान के प्रति जुनून 19 जनवरी 1979 तक जारी रहा और 13 अलग-अलग हवाई जहाजों पर 1100 घंटे का फ्लाइंग रिकॉर्ड दर्ज कराया। 
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काठमांडू में पहला जहाज लैंड किया
मार्च 1943 में, दलीप, 'बाबा' मेहर सिंह की कमान में नंबर 6 स्क्वाड्रन में फ्लाइंग ऑफिसर बने। उनकी नई बनी स्क्वाड्रन लगातार नई-नई जगहों पर जाती रहती थी और नवंबर 1943 में वह आज के बांग्लादेश में कॉक्स बाजार पहुंची। यहां, उन्होंने कई टोही मिशनों को अंजाम दिया, जिसके बाद उन्हें '14वीं सेना की आंख' के नाम से बुलाया जाने लगे। इस दौरान, मजीठिया ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बतौर लड़ाकू पायलट बर्मा मोर्चे पर प्रसिद्ध हॉकर हुरिकेन को उड़ाया। 23 अप्रैल 1949 को काठमांडू घाटी में विमान उतारने वाले पहले व्यक्ति बने। उन्होंने कोहाट में कई उड़ानें भरीं, जहां एयर मार्शल असगर खान, जो बाद में पाकिस्तान वायु सेना के प्रमुख बने, उनके स्क्वाड्रन साथियों में से एक थे। एयर मार्शल रणधीर सिंह, जिन्हें बाद में 1948 में वीर चक्र से सम्मानित किया गया, उन्होंने भी उस समय उसी स्क्वाड्रन में काम किया था। उन्होंने उसी दौरान फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के साथ भी काम करने का सौभाग्य मिला, जो बाद में भारतीय सेना के प्रमुख बने। 
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