अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो जाएगा देश
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पीएम मोदी का स्वप्निल स्वच्छ भारत अभियान अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बढ़ रहा है। सरकार ने अभियान की रफ्तार पर अपनी संतुष्टि जताई है। तो देश-विदेश के नामी संस्थानों ने भी अभियान के जमीनी असर का आंकलन कर उसकी महिमा बढ़ाई है। विश्व संगठन यूनीसेफ और मिलिंडा गेटस फाउंडेशन ने स्वच्छ भारत अभियान के प्रभाव और असर को सही दिशा में करार दिया है।
स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) का लेखा-जोखा पेश करते हुए पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के सचिव परमेश्वरन अय्यर ने अभियान के रफ्तार पर संतुष्टि जताई है। उन्होंने कहा है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत देश को खुले में शौच की समस्या से मुक्त करने का प्रयास निर्धारित समय यानि अक्टूबर 2019 तक पूरा हो जाएगा।
अभियान की रफ्तार ठीक दिशा में है। अय्यर के अनुसार देश के 3 लाख गांव और 300 से ज्यादा जिले खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो गए हैं। 2 अक्टूबर 2014 को अभियान की शुरूआत के बाद देश के ग्रामीण इलाकों में अब तक 6 करोड़ से ज्यादा शौचालय बनाए गए हैं। अब सरकार ने इसके दूसरे चरण की शुरूआत कर दी है। जिसके तहत शौचालयों की उपयोगिता बरकरार रखने के प्रयास होंगे।
8 राज्य और 2 केंद्र शासित प्रदेश हुए खुले में शौच से मुक्त
पेयजल एवं स्वच्छत्ता सचिव अय्यर के अनुसार सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, केरल, हरियाणा, उत्तराखंड, गुजरात, अरूणाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य पूरी तरह से खुले में शौच की समस्या से मुक्त घोषित हो चूके हैं। इनके अलावा चंड़ीगढ़ और दमन एवं द्वीव सरीखे केंद्र शासित प्रदेश भी इस श्रेणी में शूमार हो गए हैं। अय्यर के अनुसार मार्च तक खुले में शौच की समस्या से मुक्त राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या बढ़कर 15 हो जाएगी।
अभियान के वजह से आई बाल मृत्यु दर में कमी
अय्यर ने यूनीसेफ और मिलिंदा गेटस फाउंडेशन के अध्ययनों की रिपोर्ट को पेश करते हुए बताया कि स्वच्छ भारत अभियान का स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर पड़ा है। यूनीसेफ के अध्य्यन के अनुसार अभियान के शुरूआत के बाद बाल मृत्यु दर में गिरावट आई है। तो बिल एवं मिलिंदा गेटस फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार खुले में शौच से मुक्त हुए गांव के लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है। उनके स्वास्थ्य सूचकांक में सुधार देखने को मिला है। यूनीसेफ के एक दूसरे शोध के अनुसार खुले में शौच की समस्या से मुक्त गांवों में हर घर को करीब प्रतिवर्ष 50 हजार रूपए की बचत हुई है।