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मोदी इफेक्ट: ओमान के इस बंदरगाह से चीन पर नजर रखेगा भारत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Wed, 14 Feb 2018 11:34 AM IST
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हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन खाड़ी देशों की यात्रा की है। अब उसका प्रभाव भी दिखना शुरू हो गया है। कहा जा सकता है कि भारत की रणनीति और कूटनीति का असर अब दिखने लगा है। इस यात्रा में पीएम मोदी ने ओमान, फलस्तीन और जॉर्डन का दौरा किया था। यहां उन्होंने कई रणनीतिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसा ही एक समझौता भारतीय नौसेना को ओमान के दुक्म बंदरगाह तक पहुंचाने की अनुमति से संबंधित था।
हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में भारत की रणनीतिक पहुंच के लिए यह समझौता बहुत अहम माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इसके काफी दूरगामी परिणाम होंगे। बता दें कि इस साल मार्च में पर्शिया की खाड़ी में भारत और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा संयुक्त सैन्य अभ्यास किया जाएगा।
जिस तरह से चीन, पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है, उसे देखते हुए दुक्म में भारत की मौजूदगी रणनीतिक तौर पर काफी अहम हो जाएगी। इस समझौते के बाद भारत, चीन को ओमान की खाड़ी में रोकने में सक्षम हो जाएगा।
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यह भी पढ़ें: ओमान में PM मोदी बोले- मैं चायवाला, चाय से भी कम कीमत पर दिया हेल्थ इंश्योरेंस
बता दें कि ग्वादर पर ओमानी सुल्तान का हक था और उन्होंने 1950 के दशक में भारत को इससे जुड़ने की गुजारिश की थी। लेकिन उस समय भारत ने उस गुजारिश को इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि भारत जानता था कि वह इसे पाकिस्तान से नहीं बचा पाएगा।
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हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में भारत की रणनीतिक पहुंच के लिए यह समझौता बहुत अहम माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इसके काफी दूरगामी परिणाम होंगे। बता दें कि इस साल मार्च में पर्शिया की खाड़ी में भारत और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा संयुक्त सैन्य अभ्यास किया जाएगा।
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जिस तरह से चीन, पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को विकसित कर रहा है, उसे देखते हुए दुक्म में भारत की मौजूदगी रणनीतिक तौर पर काफी अहम हो जाएगी। इस समझौते के बाद भारत, चीन को ओमान की खाड़ी में रोकने में सक्षम हो जाएगा।
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बता दें कि ग्वादर पर ओमानी सुल्तान का हक था और उन्होंने 1950 के दशक में भारत को इससे जुड़ने की गुजारिश की थी। लेकिन उस समय भारत ने उस गुजारिश को इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि भारत जानता था कि वह इसे पाकिस्तान से नहीं बचा पाएगा।
भारत और ओमान करीबी राजनीतिक रिश्ते रहे हैं
नरेंद्र मोदी
पिछले दिनों भारत और ओमान के बीच हुए समझौते के बाद साफ हो गया है कि भारत खाड़ी देशों में धीरे-धीरे ही सही लेकिन अपनी मौजूदगी और अपने प्रभाव को बढ़ा रहा है। उल्लेखनीय है कि सेशल्स में पिछले दिनों से चले आ रहे घरेलू राजनीतिक विरोध के बाद भी उसने भारत के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है, इसके बाद भारत को इस देश में 'मिलिटरी इन्फ्रास्ट्रक्चर' तैयार करने की इजाजत भी मिल गई है।
उल्लेखनीय है कि हिंद महासागर में 'दुक्म' की अहमियत को अमेरिका पहले से जानता था तभी उसने 2013-14 में ही अपनी स्थिति यहां मजबूत बना ली थी। दुक्म की अहमियत को समझते हुए अब भारत भी धीरे-धीरे वहां अपनी स्थिति मजबूत बनाने की ओर कदम बढ़ा रहा है। इससे पहले ब्रिटेन भी ओमान से समझौता कर चुका है जबकि चीन ने तो यहां निवेश तक किया है।
भारत और ओमान के लंबे समय से करीबी राजनीतिक रिश्ते रहे हैं। ओमान भारत के लिए पहले से ही काफी अहम माना जाता रहा है। इस समझौते के बाद बात चाहें रणनीतिक हो या फिर हिंद महासागर में अपनी पहुंच मजबूत करने की हर मामले में ओमान के भारत से संबंध अहम साबित होंगे। क्योंकि ओमान एक गुट निरपेक्ष देश है।
हालांकि दुक्म का मामला थोड़ा अलग है। यह कोई प्राकृतिक बंदरगाह नहीं है, यह कृत्रिम है, जिसे विशुद्धरूप से आर्थिक और रणनीतिक उद्देश्य से बनाया गया है।
उल्लेखनीय है कि हिंद महासागर में 'दुक्म' की अहमियत को अमेरिका पहले से जानता था तभी उसने 2013-14 में ही अपनी स्थिति यहां मजबूत बना ली थी। दुक्म की अहमियत को समझते हुए अब भारत भी धीरे-धीरे वहां अपनी स्थिति मजबूत बनाने की ओर कदम बढ़ा रहा है। इससे पहले ब्रिटेन भी ओमान से समझौता कर चुका है जबकि चीन ने तो यहां निवेश तक किया है।
भारत और ओमान के लंबे समय से करीबी राजनीतिक रिश्ते रहे हैं। ओमान भारत के लिए पहले से ही काफी अहम माना जाता रहा है। इस समझौते के बाद बात चाहें रणनीतिक हो या फिर हिंद महासागर में अपनी पहुंच मजबूत करने की हर मामले में ओमान के भारत से संबंध अहम साबित होंगे। क्योंकि ओमान एक गुट निरपेक्ष देश है।
हालांकि दुक्म का मामला थोड़ा अलग है। यह कोई प्राकृतिक बंदरगाह नहीं है, यह कृत्रिम है, जिसे विशुद्धरूप से आर्थिक और रणनीतिक उद्देश्य से बनाया गया है।