{"_id":"66918b3bfcb40979af0ff4e3","slug":"india-needs-niti-aayog-like-permanent-commission-to-tackle-climate-change-sc-judge-2024-07-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"SC: ‘जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीति आयोग जैसी ईकाई की जरूरत’, सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा- यह गंभीर खतरा","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
SC: ‘जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीति आयोग जैसी ईकाई की जरूरत’, सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा- यह गंभीर खतरा
Sat, 13 Jul 2024 01:30 AM IST
विशांत श्रीवास्तव
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, नई दिल्ली
अमर उजाला, न्यूज डेस्क, नई दिल्ली
Published by: विशांत श्रीवास्तव
Updated Sat, 13 Jul 2024 01:30 AM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट के जज केवी विश्वनाथन ने जलवायु परिवर्तन को अस्तित्व के लिए खतरा बताया है। उन्होंने कहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नीति आयोग की तर्ज पर एक आयोग बनाया जाना चाहिए।
विज्ञापन
जलवायु परिवर्तन के कारण 80 फीसदी किसान प्रभावित
- फोटो : ani
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन ने शुक्रवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन एक गंभीर खतरा है और इस समस्या का व्यापक समाधान खोजने के लिए नीति आयोग के की तरह ही भारत में एक स्थायी आयोग की स्थापना होनी चाहिए।
वकील जतिंदर (जय) चीमा की "क्लाइमेट चेंज: द पॉलिसी, लॉ एंड प्रैक्टिस" नामक पुस्तक के लॉन्च होने के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है। उन्होंने आगे कहा कि चीमा ने अपनी किताब में जलवायु परिवर्तन के लिए आयोग की स्थापना की बात कही है। किताब में चीमा ने बताया है कि नीति आयोग की तर्ज पर एक स्थायी निकाय बने ताकि समय- समय पर सभी जलवायु परिवर्त से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि विशेषज्ञों के बीच जलवायु परिवर्तन को लेकर व्यापक कानून की रूपरेखा को लेकर भी तीखी बहस चल रही है जिसे भारत को अपनाना चाहिए।
विज्ञापन
2025 तक आधी आबादी पानी की कमी से जूझेगी
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया का जलचक्र भी प्रभावित हो रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनियाभर में जल संकट कितना गंभीर हो चुका है इसका अंदाजा संयुक्त राष्ट्र की ओर जारी आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक दुनिया में चार करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिन्हें साल में कम से कम एक महीने पानी की कमी से जूझना पड़ता है।
2025 तक दुनिया की आधी आबादी उन क्षेत्रों में रह रही होगी जहां पानी की कमी है। इतना ही नहीं 2030 तक करीब 70 करोड़ लोग पानी की भारी कमी के चलते अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों ने अध्ययन में जानकारी दी है कि अगले 26 वर्षों में जलापूर्ति पर पड़ने वाले दबाव की वजह से पानी पर करीब 30 फीसदी अतिरिक्त समय देना होगा। सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं और बच्चियों पर पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन दबे पांव लोगों के जीवन में कर रहा है घुसपैठ
अध्ययन से जुड़े पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट के प्रमुख शोधकर्ता रॉबर्ट कैर का कहना है कि जलवायु में आ रहा बदलाव, बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर रहा है। नतीजन पानी की उपलब्धता भी प्रभवित हो रही है। 2050 तक उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में महिलाएं को पानी भरने में लगने वाला यह समय 30 फीसदी बढ़ सकता है।
विज्ञापन
वकील जतिंदर (जय) चीमा की "क्लाइमेट चेंज: द पॉलिसी, लॉ एंड प्रैक्टिस" नामक पुस्तक के लॉन्च होने के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अस्तित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा है। उन्होंने आगे कहा कि चीमा ने अपनी किताब में जलवायु परिवर्तन के लिए आयोग की स्थापना की बात कही है। किताब में चीमा ने बताया है कि नीति आयोग की तर्ज पर एक स्थायी निकाय बने ताकि समय- समय पर सभी जलवायु परिवर्त से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सके।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति विश्वनाथन ने कहा कि विशेषज्ञों के बीच जलवायु परिवर्तन को लेकर व्यापक कानून की रूपरेखा को लेकर भी तीखी बहस चल रही है जिसे भारत को अपनाना चाहिए।
विज्ञापन
2025 तक आधी आबादी पानी की कमी से जूझेगी
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया का जलचक्र भी प्रभावित हो रहा है। शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनियाभर में जल संकट कितना गंभीर हो चुका है इसका अंदाजा संयुक्त राष्ट्र की ओर जारी आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक दुनिया में चार करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिन्हें साल में कम से कम एक महीने पानी की कमी से जूझना पड़ता है।
2025 तक दुनिया की आधी आबादी उन क्षेत्रों में रह रही होगी जहां पानी की कमी है। इतना ही नहीं 2030 तक करीब 70 करोड़ लोग पानी की भारी कमी के चलते अपने घरों को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च से जुड़े वैज्ञानिकों ने अध्ययन में जानकारी दी है कि अगले 26 वर्षों में जलापूर्ति पर पड़ने वाले दबाव की वजह से पानी पर करीब 30 फीसदी अतिरिक्त समय देना होगा। सबसे ज्यादा बोझ महिलाओं और बच्चियों पर पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन दबे पांव लोगों के जीवन में कर रहा है घुसपैठ
अध्ययन से जुड़े पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट के प्रमुख शोधकर्ता रॉबर्ट कैर का कहना है कि जलवायु में आ रहा बदलाव, बारिश के पैटर्न को प्रभावित कर रहा है। नतीजन पानी की उपलब्धता भी प्रभवित हो रही है। 2050 तक उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में महिलाएं को पानी भरने में लगने वाला यह समय 30 फीसदी बढ़ सकता है।