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एथेनॉल मिश्रण में रुचि नहीं दिखा रहीं पेट्रोल कंपनियां, इस कारण नहीं सुधर पा रही गन्ना किसानों की किस्मत

Mon, 22 Feb 2021 07:49 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 22 Feb 2021 07:49 PM IST
सार

  • पेट्रोल में एथेनॉल की ब्लेंडिंग 5.09 फीसदी तक पहुंची, उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे राज्यों में 8.5 से 9.8 फीसदी तक हो रही ब्लेंडिंग
  • 2025 तक पेट्रोल में 20 फीसदी तक एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य, लेकिन वर्तमान गति लक्ष्य से बहुत ज्यादा दूर

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India has reduced the time limit for achieving the target of adding 20 percent ethanol to petrol by five years to 2025
Petrol pump Meter - फोटो : Amar Ujala (File)

विस्तार

महंगे पेट्रोल को सस्ता करने के एक उपाय के रूप में पेट्रोल में एथेनॉल को मिलाने का विकल्प सुझाया गया था। इसे चीनी मिलों द्वारा गन्ना किसानों को समय पर भुगतान न करने की समस्या को खत्म करने के लिए भी कारगर बताया गया था। लेकिन खबर है कि महंगी तकनीक और उचित इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में पेट्रोल कंपनियां एथेनॉल ब्लेंडिंग में पर्याप्त रुचि नहीं दिखा रही हैं। इस कारण 2025 तक पेट्रोल में 20 फीसदी फीसदी तक एथेनॉल ब्लेंड करने के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी समस्या आ सकती है। फिलहाल, वर्तमान समय में राष्ट्रीय स्तर पर एथेनॉल ब्लेंडिंग पांच फीसदी से कुछ ऊपर बना हुआ है जो लक्ष्य से काफी दूर है।

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केंद्र सरकार ने लक्ष्य तय किया था कि 2022 तक देश के कुल पेट्रोल में 10 फीसदी तक एथेनॉल की ब्लेंडिंग की जाएगी। इसे 2025 तक 20 फीसदी तक ले जाने का लक्ष्य था। लेकिन यह लक्ष्य अपेक्षित गति से आगे नहीं चल रहा है। वर्ष 2015 तक यह कुल पेट्रोल खपत का लगभग एक फीसदी ही था।

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बढ़ रहा एथेनॉल का उपयोग

वर्ष 2011 में देश में एथेनॉल की खपत 171.5 करोड़ लीटर थी, जो 2012 में 195.5 करोड़ लीटर और 2013 में 193.2 करोड़ लीटर हो गई। वर्ष 2014 में एथेनॉल की खपत पहली बार 200 करोड़ लीटर पहुंच गई। 2018 में यह तीन सौ करोड़ लीटर की सीमा पार करते हुए 312 करोड़ लीटर तक पहुंच गई। 2019 में यह 337 करोड़ लीटर होकर वर्ष 2020 में 362 करोड़ लीटर तक पहुंच चुकी है।

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इस वृद्धि के बाद भी विशेषज्ञ एथेनॉल के उपयोग में वृद्धि को बहुत कम और प्रतीकात्मक ही मानते हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि अगर एथेनॉल के उपयोग को बढ़ाया जा सके तो इससे पेट्रोल आयात में लग रही भारी धनराशि को कम करने में मदद मिल सकती है, साथ ही देश के किसानों को भी अच्छी आर्थिक सहायता पहुंचाई जा सकती है। इतना ही नहीं, एथेनॉल ब्लेंडिंग से कार्बन उत्सर्जन भी काफी कम होता है और इस कारण ब्लेंडिंग से पर्यावरण को भी मदद मिल सकती है।

देश में ब्लेंडिंग का औसत पांच फीसदी पर बना हुआ है। लेकिन देश के अलग-अलग राज्यों में ब्लेंडिंग का स्तर अलग-अलग है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और कर्नाटक में यह 8.5 फीसदी से लेकर 9.8 फीसदी तक हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे बढ़ाकर 15 फीसदी तक किया जा सकता है। अगर राष्ट्रीय स्तर पर इतना ब्लेंडिंग हो जाती है, तो इससे देश को विदेशी मुद्रा के बचत में भारी मदद मिलेगी।

एथेनॉल के लिए बी-मोलासिस और गन्ने के जूस के उपयोग के कारण देश में चीनी के उत्पादन को कम करने में मदद मिली है। अनुमानतया गत वर्ष एथेनॉल में गन्ने के जूस के उपयोग के कारण आठ लाख टन चीनी का उत्पादन कम हुआ। चीनी का ज्यादा उत्पादन भी चीनी मिलों और गन्ना किसानों के लिए समस्या बनकर उभरा है। एथेनॉल में गन्ने की खपत दोनों को ही इस समस्या से मुक्ति दिला सकती है।

लेकिन यहां भी नहीं हो रहा भुगतान

चीनी मिलों के द्वारा गन्ना किसानों को समय पर भुगतान न करने का मुद्दा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। जानकारी के मुताबिक इस मामले में सबसे आश्चर्यजनक बात यह सामने आई है कि जिन चीनी कंपनियों के द्वारा गन्ने के जूस का एथेनॉल उत्पादन में उपयोग किया जा रहा था, उनके द्वारा भी किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया गया। यानी जिस एथेनॉल को गन्ना किसानों को समय से भुगतान करने के लिए इलाज समझा जा रहा था, वह भी उनकी समस्या को कम करने में समर्थ नहीं हो सका है।

विशेषज्ञ के मुताबिक एथेनॉल ब्लेंडिंग जटिल प्रक्रिया

वायु प्रदूषण विशेषज्ञ शांभवी शुक्ला ने अमर उजाला को बताया कि पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग एक जटिल तकनीकी प्रक्रिया है। ब्लेंडिंग करने में भारी निवेश के साथ-साथ उच्च स्तर की तकनीकी का उपयोग भी होता है। इसके लिए बहुत भारी क्षमता की स्टोरेज टंकियों की भी आवश्यकता होती है। लेकिन पर्याप्त निवेश के न होने के कारण एथेनॉल स्टोरेज की यह क्षमता अभी तक विकसित नहीं की जा सकी है। निवेश के लिए अनिच्छुक रहने के कारण पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं हो पा रहा है जिससे एथेनॉल ब्लेंडिंग का काम अपेक्षित गति से नहीं पूरा हो पा रहा है।

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