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चीन को दोहरा झटका, रेलवे और टेलिकॉम से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर सकता है भारत
Fri, 19 Jun 2020 09:27 PM IST
Jeet Kumar
बीबीसी हिंदी
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Published by: Jeet Kumar
Updated Fri, 19 Jun 2020 09:27 PM IST
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भारतीय रेल
- फोटो : Indian Railway
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'बहुत करीब', लेकिन फिर भी बहुत दूर' भारत और चीन के आर्थिक और राजनीतिक रिश्तों के लिए अक्सर ये बात कही जाती है। दोनों के आर्थिक हित जुड़े हैं, लेकिन मन-मुटाव भी होते रहते है। सामान के मामले में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। हालांकि चीन भारत को सामान बेचता ज्यादा है और खरीदता कम है। यानी चीन की भारत से कमाई ज्यादा होती है।
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फिलहाल सीमा पर तनाव की जो स्थिति बनी है, माना जा रहा है कि उसका असर आर्थिक रिश्तों पर भी पड़ता सकता है। ये असर किन सेक्टरों पर पड़ सकता है, इसमें सबसे पहले रेलवे और टेलिकॉम का नाम आ रहा है। गुरुवार को भारतीय मीडिया में सूत्रों के हवाले से खबरे छापी गई कि भारत ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर चीन को कारोबारी झटका देने का मन बना लिया है।
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खबरों में कहा गया कि चीन की एक बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी के हाथ से भारतीय रेलवे का अहम कॉन्ट्रैक्ट निकल सकता है। वहीं भारतीय दूरसंचार विभाग ने बीएसएनएल को कहा है कि वो अपने 4जी अपग्रेडेशन के लिए चीन में बने उपकरणों का इस्तेमाल ना करें।
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रेलवे ने रद्द किया कॉन्ट्रैक्ट
इसके बाद गुरुवार को ही रेलवे ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि चीन को दिया 471 करोड़ रुपए का एक बड़ा कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया है।
ये कॉन्ट्रैक्ट जून 2016 में बीजिंग नेशनल रेलवे रिसर्च एंड डिज़ाइन इंस्टिट्यूट ऑफ सिग्नल एंड कम्यूनिकेशन ग्रूप को.लिमि. को दिया गया था। इसके तहत 417 किलोमीटर लंबे कानपुर-दीन दयाल उपाध्याय (डीडीयू) सेक्शन में सिग्नलिंग और टेलिकम्यूनिकेशन का काम किया जाना था।
भारतीय रेलवे के डेडिकेटेड फ्रेट कोरीडोर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL) ने ये कहते हुए इस कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया है कि चीनी संस्था ने बीते चार साल में अबतक सिर्फ 20 प्रतिशत ही काम पूरा किया है और उसके काम के तरीके में बहुत सारी खामियां हैं। हालांकि इसके बाद एक रेलवे अधिकारी ने कहा कि ये कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का फैसला अप्रैल में ही ले लिया गया था।
चीन के पास भारतीय रेल के कई कॉन्ट्रैक्ट
लेकिन फिलहाल चीन के साथ किया सिर्फ ये एक कॉन्ट्रैक्ट रद्द किया गया है, कहा जा रहा है कि ऐसे और भी कई कॉन्ट्रैक्ट टूट सकते हैं। अगर भारतीय रेलवे की ही बात करें तो कई बड़े कॉन्ट्रैक्ट चीनी कंपनियों को दिए जाते रहे हैं।
मेट्रो कोच और पुर्जे- इनवेस्ट इंडिया की सरकारी वेबसाइट के मुताबिक रेल ट्रांसिट इक्विपमेंट सप्लाई करने वाली चीनी कंपनी सीआरआरसी को भारत में मेट्रो कोच और पुर्जे सप्लाई करने के सात से ज्यादा ऑर्डर मिले हुए हैं। कोलकाता, नोएडा और नागपुर मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए कंपनी को 112, 76, 69 मेट्रो कोच सप्लाई करने का ऑर्डर मिला था।
ट्रैक के रखरखाव के लिए मशीनें- इसी कंपनी के साथ मई 2019 में रेलवे ट्रैक के काम में इस्तेमाल होने वाली मशीन के 129 उपकरण खरीदने को लेकर 487,300 अमरीकी डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट 29 प्वाइंट्स क्रॉसिंग एंड टैम्पिंग मशीन खरीदने के लिए करीब पांच करोड़ डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट, ट्रैक के लिए 19 मल्टी परपस टैम्पर खरीदने का एक अरब डॉलर से ज्यादा का कॉन्ट्रैक्ट हुआ था।
वहीं अप्रैल 2019 में रेलवे ट्रैक के लिए इस्तेमाल होने वाली प्वाइंट्स क्रॉसिंग एंड टैम्पिंग मशीन की खरीददारी का कॉन्ट्रेक्ट चीन की जेमैक इंजीनियरिंग मशीनरी कंपनी को दिया था। ये कॉन्ट्रैक्ट एक करोड़ डॉलर से ज्यादा का था। वहीं रेलवे ट्रैक की मरम्मत और ट्रैक की गिट्टी को सेट करने का काम करने वाली ब्लास्ट रेगुलेटिंग मशीन का कॉन्ट्रैक्ट हेवी ड्यूटी मशीनरी कंपनी हुबेई को दिया हुआ है, जो करीब छह लाख डॉलर की कीमत का है।
यात्री ट्रेनों के टायर- इसके अलावा यात्री ट्रेनों के टायर भी चीन की कंपनियों से खरीदे जाते हैं। जैसे 2017 में पैसेंजर ट्रेन के करीब साढ़े 27 हजार टायर खरीदने के लिए चीन की ताइयुआन हेवी इंडस्ट्री रेलवे ट्रांसिट इक्विपमेंट को. लिमि. के साथ करीब 96 लाख डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट हुआ था।
टेलिकॉम सेक्टर
भारतीय टेलिकॉम सेक्टर की बात करें तो ख्वावे, जेडटीई और जेडटीटी जैसी चीनी कंपनियां भारतीय टेलिकॉम इंडस्ट्री के लिए बड़े पैमाने पर उपकरण सप्लाई करती हैं। उनके लिए भारत बड़ा बाजार है, क्योंकि भारत की टेलिकॉम इंडस्ट्री 1.2 अरब सब्सक्राइबर बेस के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी टेलिकॉम इंडस्ट्री है।
हाल में खबर आई है कि भारत जेडटीई जैसी चीनी कंपनियों से टेलिकॉम सप्लाई लेना बंद कर सकता है। भारतीय मीडिया में सूत्रों के हवाले से खबर चलाई गई कि दूरसंचार विभाग सरकारी टेलिकॉम बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए चीनी कंपनियों से टेलिकॉम सप्लाई पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा सकता है।
इकॉनोमिक टाइम्स के मुताबिक विभाग से जुड़े एक शख्स ने बताया, "बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए शुरू होने वाले 4जी यानी फोर्थ जनरेशन नेटवर्क के लिए चीनी कंपनियों से उपकरण, पार्ट और पुर्जे नहीं लेने का फैसला लिया जा रहा है।"
भारत चीन के मौजूदा तनाव का असर शेन्झेन स्थित जेडटीई के भारत में कारोबार पर पड़ सकता है। भारत का स्टेट-रन टेलिकॉम इस चीनी कंपनी का सबसे बड़ा ग्राहक है और वो भारत में इसके छह सर्कल का रखरखाव करती है।
इकॉनोमिक टाइम्स के मुताबिक, बीएसएलएल बोर्ड ने 49,300 2जी और 3जी साइट्स को 4जी तकनीक में बदलने के लिए चीनी जेडटीई और फिनिश नोकिया को मंजूरी दे दी थी, लेकिन दूरसंचार विभाग ने इसपर मुहर नहीं लगाई।
वहीं बीएसएनएल मार्च में नया टेंडर निकाला था, जिसकी डेडलाइन अब जून 24 तक बढ़ा दी गई है, जो पहले 25 मई थी। इसमें एमटीएनएल के लिए दिल्ली और मुंबई की सात हजार नई साइट को भी शामिल किया गया है।
इंडस्ट्री का अनुमान है कि मौजूदा वक्त में भारतीय दूरसंचार के लिए उपकरणों का सालाना बाजार लगभग 12,000 करोड़ रुपये है। जिसमें चीनी कंपनियों की करीब एक चौथाई हिस्सेदारी है। बाकी का मार्केट स्वीडन की एरिक्सन, फिनलैंड की नोकिया और कोरिया की सैमसंग के हाथ में है। कहा जा रहा है कि प्राइवेट मोबाइल ऑपरेटर को भी ख्वावे और जेडटीई से पुर्जे लेने से रोका जा सकता है।
सीमा पर ताजा तनाव के बाद चीनी सामान के बहिष्कार की मुहीम छिड़ी हुई है। आम लोग भी लगातार इस मुहीम से जुड़कर चीन को आर्थिक झटका देने के पक्ष में हैं। इसके अलावा लोकल से वोकल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे के साथ ये माँग भी उठ रही है कि अब देश में बने सामान को ही ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल में लाया जाए।