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उपलब्धि: हथियारों में आत्मनिर्भर बना भारत, दस साल में 34% घटा रक्षा आयात; तो 700% तक बढ़ा निर्यात
Tue, 08 Jul 2025 06:31 AM IST
शुभम कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शुभम कुमार
Updated Tue, 08 Jul 2025 06:31 AM IST
सार
सिप्री की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2024 तक भारत ने रक्षा आयात में 34% की कमी और निर्यात में 700% से अधिक बढ़ोतरी दर्ज की है। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के चलते भारत अब रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनकर उभरता वैश्विक खिलाड़ी बन गया है। HAL, BEL और BDL ने बड़ी भूमिका निभाई।
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निर्यात
- फोटो : Istock
विस्तार
भारत अब रक्षा उपकरणों में आत्मनिर्भर बनने के साथ ही उन्हें निर्यात करने वाला एक उभरता वैश्विक खिलाड़ी बन चुका है। 2014 से 2024 तक भारत के रक्षा आयात में 34% की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जबकि रक्षा निर्यात में 700% से अधिक की अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। भारत हथियारों के मामले में बहुत तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। यह जानकारी स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) की ताजा रिपोर्ट में दी गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा आयातक था, वहीं अब यह स्थान कतर और सऊदी अरब ने ले लिया है। इसके पीछे सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत पहल की अहम भूमिका रही, जिसमें घरेलू रक्षा उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है। भारत का रक्षा निर्यात 2013-14 में सिर्फ 686 करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 21,083 करोड़ रुपये हो गया। यानी 10 वर्षों में इसमें लगभग 30 गुना बढ़ोतरी हुई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लि. (एचएएल), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लि. (बीईएल), भारत डायनेमिक्स लि. (बीडीएल) और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने इस बढ़त में अहम योगदान दिया।
एचएएल मुख्य रूप से लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, इंजन और एवियोनिक्स बनाता है। बीईएल रक्षा संचार उपकरण, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली आदि बनाता है। इसी तरह बीडीएल मिसाइल और टॉरपीडो जैसे सामरिक हथियारों के निर्माण का विशेषज्ञ है। ये तीनों कंपनियां भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति की रीढ़ मानी जाती हैं।
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यहां से खरीदे अत्याधुनिक हथियार
भारत ने रक्षा आयात में कमी की है, लेकिन कुछ अत्याधुनिक हथियारों के लिए वह कुछ देशों पर निर्भर है। 2019 से 2023 के बीच भारत ने सबसे अधिक हथियार लगभग 36% रूस से खरीदे। पहले यह आंकड़ा 60% से अधिक था। राफेल जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों को मिलाकर भारत ने फ्रांस से 30% हथियार खरीदे।
सिप्री के अनुसार अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 11% रही, जो अपाचे और चिनूक हेलिकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म्स की आपूर्ति के लिए अहम रहा। इन वर्षों में भारत ने इस्राइल, दक्षिण कोरिया और इटली जैसे देशों से भी विशेष सैन्य उपकरण खरीदे, लेकिन उनका प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। यह रुझान भारत की बहु-स्रोत रक्षा नीति और तकनीकी विविधीकरण की दिशा में बढ़ते झुकाव को दर्शाता है।
ये भी पढ़ें:- घोटाला: पीएसयू एचआईएल ने स्वास्थ्य मंत्रालय को 52 की मच्छरदानी 237 रुपये में बेची, सीबीआई ने दर्ज किया केस
सरकार की योजनाएं और लक्ष्य
भारत सरकार ने 2025 तक रक्षा निर्यात को 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत 411 रक्षा उपकरणों को निगेटिव आयात लिस्ट में डाला गया है, यानी इन्हें अब देश में ही बनाया जाएगा। इसके अलावा स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस, युद्धपोत आईएनएस विक्रांत, और अग्नि-प्रणालियों का विकास,ड्रोन, साइबर और एआईआर आधारित हथियार प्रणालियों में स्टार्टअप्स की बढ़ती भागीदारी रक्षा क्षेत्र में भारत की प्रगति के सूचक हैं।भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत पिछले एक दशक में सैन्य निर्माण, तकनीकी नवाचार और रक्षा निर्यात के मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है, लेकिन पूरी आत्मनिर्भरता अभी भी एक दीर्घकालिक लक्ष्य है।
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रिपोर्ट के मुताबिक पहले भारत दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा आयातक था, वहीं अब यह स्थान कतर और सऊदी अरब ने ले लिया है। इसके पीछे सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत पहल की अहम भूमिका रही, जिसमें घरेलू रक्षा उत्पादन को प्राथमिकता दी गई है। भारत का रक्षा निर्यात 2013-14 में सिर्फ 686 करोड़ रुपये था, जो 2023-24 में बढ़कर 21,083 करोड़ रुपये हो गया। यानी 10 वर्षों में इसमें लगभग 30 गुना बढ़ोतरी हुई है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लि. (एचएएल), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लि. (बीईएल), भारत डायनेमिक्स लि. (बीडीएल) और टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स जैसी कंपनियों ने इस बढ़त में अहम योगदान दिया।
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एचएएल मुख्य रूप से लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, इंजन और एवियोनिक्स बनाता है। बीईएल रक्षा संचार उपकरण, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली आदि बनाता है। इसी तरह बीडीएल मिसाइल और टॉरपीडो जैसे सामरिक हथियारों के निर्माण का विशेषज्ञ है। ये तीनों कंपनियां भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति की रीढ़ मानी जाती हैं।
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यहां से खरीदे अत्याधुनिक हथियार
भारत ने रक्षा आयात में कमी की है, लेकिन कुछ अत्याधुनिक हथियारों के लिए वह कुछ देशों पर निर्भर है। 2019 से 2023 के बीच भारत ने सबसे अधिक हथियार लगभग 36% रूस से खरीदे। पहले यह आंकड़ा 60% से अधिक था। राफेल जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों को मिलाकर भारत ने फ्रांस से 30% हथियार खरीदे।
सिप्री के अनुसार अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 11% रही, जो अपाचे और चिनूक हेलिकॉप्टर जैसे प्लेटफॉर्म्स की आपूर्ति के लिए अहम रहा। इन वर्षों में भारत ने इस्राइल, दक्षिण कोरिया और इटली जैसे देशों से भी विशेष सैन्य उपकरण खरीदे, लेकिन उनका प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। यह रुझान भारत की बहु-स्रोत रक्षा नीति और तकनीकी विविधीकरण की दिशा में बढ़ते झुकाव को दर्शाता है।
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सरकार की योजनाएं और लक्ष्य
भारत सरकार ने 2025 तक रक्षा निर्यात को 35,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत 411 रक्षा उपकरणों को निगेटिव आयात लिस्ट में डाला गया है, यानी इन्हें अब देश में ही बनाया जाएगा। इसके अलावा स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस, युद्धपोत आईएनएस विक्रांत, और अग्नि-प्रणालियों का विकास,ड्रोन, साइबर और एआईआर आधारित हथियार प्रणालियों में स्टार्टअप्स की बढ़ती भागीदारी रक्षा क्षेत्र में भारत की प्रगति के सूचक हैं।भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि भारत पिछले एक दशक में सैन्य निर्माण, तकनीकी नवाचार और रक्षा निर्यात के मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है, लेकिन पूरी आत्मनिर्भरता अभी भी एक दीर्घकालिक लक्ष्य है।