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Independence day 2021: कौन हैं राष्ट्रगान जन-गण-मन के संगीत के जनक, विलक्षण योगदान के बावजूद नहीं है उनका कोई स्मारक

Sun, 15 Aug 2021 07:07 AM IST
Jeet Kumar राजेंद्र राजन, नई दिल्ली
राजेंद्र राजन, नई दिल्ली Published by: Jeet Kumar Updated Sun, 15 Aug 2021 07:07 AM IST
सार

आईएनए के बैंडमास्टर और स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन राम सिंह के विलक्षण योगदान के बावजूद आज तक उनका कोई स्मारक नहीं है

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Independence day 2021, Who is the father of music of national anthem Jana Gana Mana
राष्ट्रगान जन-गण-मन - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

राष्ट्रगान जन-गण-मन के संगीत के जनक इंडियन नेशनल आर्मी  (आईएनए) के बैंड मास्टर व स्वतंत्रता सेनानी कैप्टन रामसिंह ठाकुर से मेरी भेंट मई 1999 में धर्मशाला में हुई थी।

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रामसिंह ने बताया था, सिंगापुर में 21 अक्तूबर, 1943 को उन्होंने आईएनए हुकूमत के लिए 'कौमी तराना' का संगीत तैयार किया था, जिसके बोल थे, 'शुभ सुख चैन की बरखा बरसे भारत भाग है जागा'।
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टैगौर के इस गीत का रूपांतरण मुमताज हुसैन और सिंगापुर में आजाद हिंद फौज रेडियो के लेखक आबिद हसन सफरानी ने किया था तथा शब्द रचना को सरल बनाया था। 'कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाये जा, ये जिंदगी है कौम की, तू कौम पर लुटाए जा, गीत की रचना, गायन व संगीत भी रामसिंह ने ही तैयार किया था।
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16 अगस्त, 1947  को प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहरा कर भाषण दिया था। (जी हां, 16 अगस्त, 1947 को ही पहली बार नेहरू ने लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया था, उसके अगले वर्ष 15 अगस्त से यह रस्म निभाई जाती है) इसी समारोह में रामसिंह को मसूरी से आर्मी बैंड के साथ वायलिन पर राष्ट्रगान धुन प्रस्तुत करने के लिए निमंत्रित किया गया था।

राष्ट्रगान की धुन और संगीत को मिलिट्री बैंड तथा आर्केस्ट्रा पर किसने तैयार किया था, इसके बारे में समूचा देश कमोबेश अनभिज्ञ-सा है। एक गोरखा सिपाही को बहुमूल्य योगदान के लिए जो सर्वोच्च मान-सम्मान मिलना चाहिए था, उससे उन्हें आजादी के बाद की सरकारों ने वंचित रखा।

सर्वविदित है कि कांग्रेस के नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधारा से मतभेद थे और उन्हें कतई गंवारा नहीं था कि देश की आजादी का श्रेय आईएनए को भी मिले।

विरोधाभास यह रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने आईएनए के तिरंगे व जन-गण-मन के संगीत को तो देश का गौरव बना दिया, पर आईएनए के जननायकों से दूरी बनाए रखी। आईएनए में बतौर बैंड मास्टर और आजादी के बाद पीएसी लखनऊ में सेवारत रहते रामसिंह ने राष्ट्रभक्ति से भरपूर 71 गीतों को संगीतबद्ध किया था, जिनमें से अधिकांश गीत स्वयं लिखे थे।



नेहरू मेमोरियल म्यूजियम व लाइब्रेरी के अनुसंधान अधिकारी डॉ. हरिदेव शर्मा द्वारा 1971 में रिकॉर्ड मौखिक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, '1946 में हम दिल्ली में काबुल लाइन कैन्टोनमेंट में बंदी थे। सायं सात बजे तैयार होने का हुक्म हुआ। बैरक के सामने दो-तीन कारें रुकीं। पहली कार पर आर्मी जनरल का झंडा था। बापू जी जनरल की कार से उतरे। सरदार पटेल भी थे। हम कतार में खड़े थे।

बापू जी ने कहा, 'अंग्रेज सरकार की कृपा है कि उसने आपसे मिलने का मौका दिया।' फिर बापू जी ने हर जवान का नाम व गांव पूछा। आईएनए के जनरल भौंसले ने सरदार पटेल से कहा, बापू जी को जवान कौमी तराना सुनाना चाहते हैं। बापू जी ने अंग्रेज आर्मी जनरल से आज्ञा ली, वे तुरंत राजी हो गए। राष्ट्रगान सुनकर बापू प्रसन्न हुए।'

25 अगस्त, 1948 को नेहरू ने संविधान सभा में कहा था, 'यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया कि राष्ट्रगान की धुन क्या हो, बैंड व आर्केस्ट्रा पर कैसे बजाई जाए? यह रक्षा सेवा व सेनाओं, विधायिका व दूतावासों के लिए भी अहम था। भारत सरकार ने कैप्टन रामसिंह द्वारा तैयार जन-गण-मन की धुन व लगातार अभ्यास व मामूली फेरबदल के बाद इसे सर्वश्रेष्ठ पाया।'

संविधान सभा की आमराय थी कि टैगोर के गीत की तुलना में आईएनए द्वारा तैयार संगीत, अधिक महत्वपूर्ण है। जिस धुन को 1950 में भारत सरकार ने राष्ट्रगान के लिए अपना लिया, वह आजादी से पहले भारत ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रियता के शिखर छू चुकी थी। 15 अगस्त, 1914 को धर्मशाला के समी खनियारा गांव में जन्मे कैप्टन रामसिंह का निधन 87 वर्ष की आयु में 15 अप्रैल, 2002 को लखनऊ में हुआ।


खेदजनक है कि इस महान व्यक्तित्व की याद में एक अदद स्मारक नहीं है। न तो हिमाचल के धर्मशाला में, न ही लखनऊ और न ही देश के किसी अन्य कोने में। धर्मशाला में उनका पैतृक मकान ज्यों का त्यों है। उसका सरकार अधिग्रहण कर संग्रहालय बना सकती है। लेकिन 75 साल में किसी की निगाह इस महान स्वतंत्रता सेनानी और देश की आजादी के लिए उनके विलक्षण योगदान की ओर नहीं जा सकी।

राष्ट्रवाद के मुद्दे पर 'अति उत्साही' भाजपा सरकार से देश को अपेक्षा है कि देर-सवेर वह आईएनए के नायकों को वह मान-सम्मान देगी, जिसके वे हकदार हैं। मरणोपरांत कम से कम भारत रत्न या पद्म विभूषण से तो नवाजा ही जाना चाहिए।

-भारतीय ज्ञानपीठ से शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'अनसंग कम्पोजर ऑफ आईएनए-कैप्टन राम सिंह ठाकुर -'जन-गण-मन' धुन के जनक पर आधारित

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